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  संघ और सरकार का मिलाजुला खेल है आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

सुधार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कही ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे है । तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक दूसरे को इसका एहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाये फिर एक दूसरे को देख लेंगे। यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरुरत नहीं है। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका एहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरीकोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आईएमएफ की सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके। तो धुआंधार तरीके सरकार और संघ ने उस रास्ते को पकड़ लिया है जो दोनों को विस्तार दे। और टकराव के हालात आने तक दोनों ही मान कर चले कि सत्ता हाथ में रहेगी तो रोक लेगें या सत्ता की डोर खिच लेंगे। आने वाले वक्त में होगा क्या इसे ताड़ना तो अभी दूर की गोटी ही होगी लेकिन इस दौर के दो संकेत साफ हैं। पहला, आरएसएस धर्म को धारण करने की सोच से कही आगे ले जाना चाहती है और दूसरा सरकार खेती और खनिज संपदा

को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की घरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा इससे इंकार नही किया जा सकता है। और इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता।

पहली बार कोयला खादान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिये की है क्योकि उन्हे निजी हाथो में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हडताल इसलिये करना चाह रहे हैं क्योंकि वेतन में इजाफा किये बगैर सरकार के सारे घतकर्म को बैंक के जरीये ही पूरा करने की नीति अपनायी जा रही है। बड़े बड़े हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो कोई नहीं जानता। जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे कोई संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुये चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरीये ही अपने होने का एहसास तेजी से जाग रहा है। राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है। देश में विपन्न तबके की ताकत सत्ता से इसलिये टकराने से कतराती रही है क्योंकि सत्ता की नीतियो से इतर खेती एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के तहत पेट भरती रही है और धर्म की आस्था का पाठ संयम से जुडा रहा है। लेकिन यह दोनों हालात सत्ता की निगाहों

में चढ़ जाये या सत्ता ही दोनो को प्रबावित करने लगे तो रास्ता क्या निकलेगा। इसकी संवेदनशीलता कौन कितना समढ रही है यह अपने आप में सवाल है। क्योंकि मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड रहा है ।जो आक्रमक हो चला है। दूसरी तरफ विकास की थ्योरी भी आक्रामक है। राष्ट्र विकास की थ्योरी तले पूंजी को ज्यादा महत्व दे रहा है। जिस खेती पर टिका देश का साठ फिसदी दुनिया की मंदी से प्रभावित हुये बगैर भी बाकी चालीस फिसदी को भी संकट से उबार लेता है और मनमोहन सिंह सरीखे सुधारवादी अर्थशास्त्री भी यह कहने से नहीं चुकते कि भारत की इकनॉमी दुनिया की मंदी से प्रभावित नहीं हुई। उसी खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियारे का जमीन सुधार शुरु होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है। ना तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और ना ही छत्तीसगढ या बंगाल सरीखे राज्यो की खेती अर्थव्यवस्था। औघोगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिये हथियारो

के उघोग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामिण क्षेत्रो में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जायेगा। लेकिन इसकी एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढे या विपन्न लोगों को रोजगार मिले। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भूसंपदा कारपोरेट घरानो को सौपी गयी। जो रियल इस्टेट में खपा। अकूत मुनाफाखोरी हुई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालाधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा। योजना आयोग की घिसी पिटी लकीरों को मिटाकर नयी लकीर खिंचने के लिये बने नीति आयोग की नयी भर्ती से भी समझा जा सकता है। याद कीजिये तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविन्द पानागढिया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनो के लिये खुला बाजार खासा मायने रखता है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में काम करते हुये दोनों ने ही आर्थिक सुधार को ना सिर्फ खासा महत्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिये दोनो के लिये विकास की रेखा कंजूमर की बढती तादाद से तय होती है। दोनों ही डब्ल्यूटीओ की उन नीतियों का विरोध कभी ना कर सके जो बारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रही। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहे मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे। फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत में जितनी असमानता है और बिहार, यूपी,झारखंड सरीखे बीमारु राज्य की तुलना में महाराष्ट्र ,कर्नाटक जैसे विकसित राज्य के बीच कभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी विकास को हर तबके तक पहुंचाने के लिये रि-डिस्ट्रूबेशन आफ डेवपेलपेंट की थ्योरी रखी । और जिस वक्त नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिये लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविन्द पनगारिया ने भी बकायदा भारत में विकास की असमानता  को लकेर कई लेखों में कई सवाल उठाये।

फिर विश्व बैंक और आईएमएफ का नजरिया भारत को लेकर इन दोनो अर्थशास्त्रियों के काम करने के दौरान ही कितना जन विरोधी रहा है, यह मनमोहन सिंह के दौर में बीजेपी ने ही कई मौको पर उठाये। और तो और संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच दोनो ने ही हमेशा विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है । अब यहा नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिये सरकार की नीतियां। एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देशी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिये बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं और उन्हें बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार की राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे है। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतर्विरोध । या फिर सहमति और अंतर्विरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। क्योंकि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधरराव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक। जो वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में उसी विदेसी निवेश और पूंजी पर टिके उसी विकास के खिलाफ थे जो रोजगार दे नहीं पा रही थी और पूंजीवालों को हर सुविधाओं से लैस कर रही थी। मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने ४० फिसदी मजदूरों के रोजगार छीने और ७० फिसदी स्वरोजगार में सेंध लगायी। २००५-२०१० के दौर में देश में कुल २७० लाख रोजगार हुये । लेकिन इसी दौर में करीब ढाई लाख स्वरोजगार बेरोजगार हो गये। इसी दौर में उघोगों को टैक्स सब्सिडी हर बरस पांच लाख करोड तक दी गयी। और इन सब के हिमायत विश्व बैक और आईएसएफ से लेकर डब्लुटीओ तक ने तो की है, जहां से निकले अर्थशास्त्री एब नीति आयोग को संभाल रहे है बल्कि मनमोहन सरकार के दौर में आर्थिक सलाह देने वाले डा विवेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविन्द पानागढ़िया का ही नहीं बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री डॉक्टर बिबेक देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में हम सुझाव देते आये है और इन अहम सुझावों को कभी बीजेपी ने सही नहीं माना। या कहें कई मौकों पर खुलआम विरोध किया । और डा देवराय इससे पहले की सरकार में  विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियो का चलन यहा भी जारी रहेगा  तो सवाल है बदलेगा क्या । वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरो के लिये केन्द्र सरकार की नीतियो से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है । जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्व दिया जा रहा है और मजदूरो को मालिको के हवाले कर हक के सवाल को हाशिये पर ढकेला जा रहा है उससे संघ के ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है ।

सवाल यह भी है कि खुद नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद संसद के सेन्जट्रल हाल में अपने पहले भाषण में ही जिन सवालो को उठाया और उसके बाद जिसतरह हाशिये पर पडे तबको का जिक्र बार बार यह कहकर किया कि वह तो छोटे छोटे लोगो के लिये बड़े बड़े काम करेंगे तो क्या नयी आर्थिक नीतियां वाकई बडे बडे काम छोटे छोटे लोगों के लिये कर रही है या फिर बडे बडे लोगों के लिये। क्योंंकि  देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और कारोबारियों के हाथ में सिमट रहा है और पहले ना मनमोहन सिंह कुछ बोले और ना ही अब कोई बोल रहा है। गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतिया कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही है । ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-ये किसके लिये कितना बड़ा यह तो वक्त बतायेगा लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है और देश को इसमें उलझाया जा रहा है मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में धर्म के नाम पर कही औवेसी तो कही आरएसएस का नाम लेकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का खुला खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियो की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुणा तेज है। और यह लगने लगा है कि निजी सेक्टर चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चले है ।

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