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भाजपा के खिलाफ बने गुपकार गठबंधन में फूट पड़ी, चुनाव अकेले लड़ेगी अब्दुल्लाह की पार्टी

ग़ुलाम नबी आज़ाद द्वारा कांग्रेस छोड़ते ही जम्मू-कश्मीर में सियासत के सारे आंकड़े ही बदल गए। जिस जोश के साथ भाजपा विरोधियों ने गुपकार गठबंधन बनाया था, आज़ाद ने उस गुब्बारे की हवा निकाल दी। अब देखना यह है कि गठबंधन के टूटने से भाजपा कितना फायदा होगा, भविष्य के गर्भ में छिपा है।  
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद इसे दोबारा से सक्रिय कराने के लिए बने गुपकार गठबंधन में ही फूट पड़ गई है। गुपकार के लिए जिन नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला के घर पर पहली रणनीति बनी थी, उन्होंने ही गुपकार से नाता तोड़कर जम्मू-कश्मीर में जब विधानसभा चुनाव होंगे, तो सभी 90 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसको बीजेपी की रणनीतिक जीत माना जा रहा है, क्योंकि गुपकार के माध्यम से अनुच्छेद 370 दोबारा सक्रिय कराने के दावे जम्मू-कश्मीर के विभिन्न संगठनों द्वारा किये जा रहे थे। इसके साथ ही कश्मीर में इस अनुच्छेद के खत्म होने से आतंकी घटनाओं पर नियंत्रण और कश्मीर में फिर से पर्यटकों की वापसी के लिए शांति प्रयासों में तेजी आई है। दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद के बाद छह और नेताओं के कांग्रेस से इस्तीफा देने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उथल-पुथल और तेज हो गई है।

मोदी सरकार ने चाक-चौबंद तरीके से तीन साल पहले किया था अनुच्छेद 370 का खात्मा
बीजेपी ने अपने सबसे बड़े मुद्दों में से एक जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म कर जता दिया कि वो अन्य दलों के तरह सिर्फ खोखले वादे नहीं करती, बल्कि मुश्किल से मुश्किल काम को देश हित में पूरा करके ही दम लेती है। इसी के तहत पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय किया गया। इस बड़े निर्णय के बाद लगा था कि कश्मीर में असमाजिक और आतंकी तत्व माहौल खराब कर सकते हैं। लेकिन केन्द्र सरकार की सुनियोजित प्लानिंग, कश्मीर के बड़े नेताओं की नजरबंदी, इंटेलिजेंस और सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और इंटरनेट पर पाबंदी के चलते कोई बड़ी अनहोनी घटना नहीं हुई। बल्कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के तीन साल बाद की अवधि के दौरान घाटी में अमन-चैन में तेजी और पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है।

क्या है गुपकार गठबंधन…जिन अब्दुल्ला के घर गुपकार की नींव रखी, अब वही हुए अलग
एक ओर मोदी सरकार अनुच्छेद 370 को खत्म करने जा रहे थे, दूसरी ओर कश्मीर के कुछ दल अलग ही खिचड़ी पका रहे थे। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का आवास श्रीनगर में 01, गुपकार रोड पर है। यहीं पर 4 अगस्त 2019 को कश्मीर के 8 दलों ने एक साथ बैठक रखी गई। इसमें इन दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ नया गठबंधन बनाने का फैसला लिया। इसी को गुपकार ग्रुप या गुपकार गठबंधन कहा गया। हालांकि तब तक केंद्र सरकार ने राज्य से अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35ए की वापसी पर कदम एक दिन बाद उठाया था, लेकिन राज्य में सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ा दी गई। सभी पर्यटकों को तुरंत राज्य छोड़ने के लिए कहा गया। एक साल बाद ये दल फिर फारूक अब्दुल्ला के निवास पर मिले और विधिवत गुपकार गठबंधन बनाने की घोषणा की।

कश्मीर में अनुच्छेद 370 को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों को बड़ा झटका
जिन फारुख अब्दुल्ला के घर गुपकार गठबंधन की नींव रखी गई थी, अब वही इससे अलग हो गए हैं। इससे जम्मू- कश्मीर में अनुच्छेद को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों को बहुत बड़ा झटका लगा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने घोषणा करके गुपकार समूह से खुद के अलग होने का स्पष्ट संकेत दे दिया। गौरतलब है कि इस गुपकार समूह ने जिला विकास परिषद के चुनाव एक साथ लड़े थे, जिसमें शुरुआत में सज्जाद गनी लोन की अध्यक्षता वाले पीपुल्स कॉन्फ्रेंस भी एक घटक थी। लेकिन गुपकार गठबंधन को ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई थी।

नेशनल कांफ्रेंस का जम्मू-कश्मीर की सभी 90 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) ने एक साथ कई ट्वीट कर पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (PAGD) के कुछ घटकों द्वारा पार्टी के खिलाफ दिए भाषणों पर निराशा जताई। पार्टी के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि PAGD के कुछ सदस्यों द्वारा बयानबाजी, ऑडियो और भाषण से उन्हें ठेस पहुंची है। नेशनल कांफ्रेंस के एक अन्य ट्वीट के अनुसार, ”प्रोविंसियल कमेटी के सदस्यों ने सर्वसम्मति से पारित किया कि JKNC को तैयारी करनी चाहिए और सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। इसके सीधे से मायने हैं कि जम्मू-कश्मीर में जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, नेशनल कांफ्रेंस गुपकार ग्रुप के साथ नहीं, बल्कि सारी सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेगी।

उधर आजाद के इस्तीफे से कांग्रेस में भूचाल, कश्मीर के छह और नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी
इस बीच जम्मू-कश्मीर के राजनीति में कांग्रेस के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे से भी बड़ा भूचाल आया है। आजाद ने अपने इस्तीफे में राहुल गांधी को खूब खरी-खोटी सुनाई है। आजाद के इस्तीफे के चलते प्रदेश कांग्रेस से अब तक छह बड़े नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। ऐसे में आजाद के इस्तीफे को कांग्रेस के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी से पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री जीएम सरूरी, पूर्व विधायक हाजिद अब्दुल राशिद, पूर्व विधायक मोहम्मद अमीन भट, पूर्व विधायक गुलजार अहमद वानी, पूर्व विधायक चौधरी मोहम्मद अकरम और पूर्व कैबिनेट मंत्री आरएस चिब ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।

पूर्व कैबिनेट मंत्री जुगल किशोर शर्मा भी सोनिया गांधी को देंगे इस्तीफा
इसके अलावा रियासी विधानसभा के पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री जुगल किशोर शर्मा ने भी इस्तीफा देने की घोषणा की है। वर्ष 2002 से 2008 के दौरान कांग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार में मंत्री रहे जुगल किशोर शर्मा ने कहा कि वह शनिवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपना इस्तीफा देंगे। जुगल किशोर शर्मा पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार में जल शक्ति, लोक निर्माण विभाग, पर्यटन विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे हैं। बताया जाता है कि रियासी को जिला का दर्जा दिलवाने में जुगल किशोर शर्मा की अहम भूमिका रही है।

आजाद के चिट्ठी बम से कांग्रेस में ही सियासत, गहलोत ने गुलाम को संजय का चापलूस बताया
इधर गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के लेटर में राहुल गांधी पर चापलूसों से घिरे रहने के आरोप के बाद कांग्रेस में ही सियासत तेज हो गई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुलाम नबी आजाद को ही राजीव गांधी के भाई संजय गांधी का चापलूस बता दिया है। गहलोत ने शुक्रवार को जयपुर में मीडिया से कहा-संजय गांधी के वक्त में ये सब चापलूस ही माने जाते थे। गुलाम नबी आजाद समेत जो लोग भी संजय गांधी के साथ थे। वे चापलूस ही माने जाते थे। साइकोफेंट माने जाते थे। संजय गांधी ने परवाह नहीं की। उस वक्त संजय गांधी अगर दबाव में आकर हटा देते तो आज गुलाम नबी आजाद का नाम देश के लोग नहीं जानते।

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