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नौकरशाही का मायाजाल

मोदी सरकार को बने सात माह से ज्यादा हो गए लेकिन अभी तक देश में कोई खास बदलाव नहीं आया। सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में बलात्कार की घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हो गई। नेता लोग जरुर थोड़े डर गए हैं लेकिन जहां तक सरकारी कर्मचारियों का सवाल है, रिश्वत का हाल ज्यों का त्यों हैं। बिना नोटों की गड्डी थामे कोई कागज आगे बढ़ाने को तैयार नहीं है। सरकारी अस्पतालों में लापरवाही और गंदगी का जो आलम दस साल पहले था, वह अब भी है। निजी अस्पतालों की सेवाएं अच्छी होती हैं, लेकिन वे जैसी लूट मचाते हैं, उसे देखकर बड़े-बड़े डाकू शरमा जाएं। जिन लोगों के वोटों से यह सरकार बनी है, उनमें से ज्यादातर इन अस्पतालों में कदम भी नहीं रख सकते। वे अपना इलाज इनमें करवाने के बजाय मरने पर मजबूर हो जाते हैं।

यही हाल शिक्षा का है। करोड़ों बच्चे सरकारी पाठशालाओं में जाकर अपना बचपन नष्ट करते हैं। न उन्हें पढ़ने-लिखने की सुविधा होती है न खेलने-कूदने की। स्कूल हैं तो अध्यापक नहीं हैं और अध्यापक हैं तो स्कूल नहीं हैं। छठी कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा के गणित के सवाल हल नहीं कर सकते। प्राथमिक शाला से ही बच्चों पर अंग्रेजी लाद दी जाती है। बच्चे सबसे ज्यादा मेहनत अंग्रेजी का घोटा लगाने पर करते हैं और सबसे ज्यादा इसी में अनुत्तीर्ण होते हैं। शिक्षा में रत्ती भर भी सुधार दिखाई नहीं देता।

यही हाल रोजगार और मंहगाई का है। अभी तक कोई ऐसी योजना राष्ट्रीय पैमाने पर सामने नहीं आई है, जो लाखों बेरोजगार नौजवानों को कुछ आशा बंधाए। ‘मेक इन इंडिया’ सिर्फ एक अटपटा नारा बनकर रह गया है। यदि विदेशी कंपनियां भारत में आकर अपना माल बनाएंगी तो वे भारत के फायदे के लिए क्यों बनाएंगी? वे अपने फायदे के लिए ही बनाएंगी। वे हमारे नौजवानों को नौकरियां देने की जिम्मेदारी क्यों लेंगी? वे मशीनीकरण करके बेरोजगारी क्यों नहीं बढ़ाएंगी? जहां तक मंहगाई का सवाल है, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल के दाम आधे हो जाने के कारण सरकार की जेबें काफी गर्म हो गई हैं और बड़े कारखानों और कार-मालिकों को भी फायदा पहुंचा है लेकिन आम आदमी की हालत तो खस्ता ही है। रोटी, कपड़ा और मकान तो उसके लिए उतना मंहगा आज भी है जितना कि वह पहले भी था।

ऐसे में लुभावने नारों और चटपटे भाषणों से जनता को कब तक बांधे रखा जा सकता है? सबसे चिंता का विषय है कि जिन पार्टी-कार्यकर्ताओं के परिश्रम से यह सरकार बनी है, अब प्रशासन में उनकी कोई भूमिका नहीं है। हमेशा की तरह सरकार नौकरशाही के भरोसे चल रही है। नेता बदलते रहते हैं लेकिन नौकरशाही अपनी जगह अमर है। इसीलिए जो ढर्रा पहले से चला आ रहा है, वही अब भी चल रहा है। नौकरशाही ने देश के शीर्ष नेतृत्व को सम्मोहित करके अपने माया जाल में फंसा लिया है। उसका अब भगवान ही मालिक है।

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