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जनसंख्या बढ़ाओ अभियान के निहितार्थ

निर्मल रानी 

– केंद्र में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की बहुमत की सरकार बनने के बाद कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों व इनके नेताओं द्वारा हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के उद्देश्य से जहां कई प्रकार के नए राग छेड़े गए हैं उनमें हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ाने का भी एक नया राग बड़े ही ज़ोर-शोर से अलापा जाने लगा है। पार्टी के अन्य नेताओं की तो बात ही क्या करनी संसद के कई सदस्यों द्वारा भी हिंदू समुदाय के लोगों का इस बात के लिए आह्वान किया जा रहा है कि वे 4 अथवा 5 बच्चे पैदा करें। अपनी बातों को लोकप्रिय बनाने के लिए तथा मात्र यह दर्शाने के लिए कि वे हिंदू धर्म के तथा राष्ट्र के कितने बड़े शुभचिंतक हैं कई भोंडी दलीलें दी जा रही हैं। कहा जा रहा है कि अपने पांच बच्चों में से एक बच्चे को देश की सेना में भर्ती कराएं तथा एक बच्चे को साधू-संत बनाएं। शेष बच्चे माता-पिता की सेवा करें। हास्यास्पद बात तो यह है कि इस फार्मूले का अमल न तो स्वयं ऐसी सलाह देने वाले नेताओं द्वारा अपने निजी जीवन में किया गया है न ही इनके शीर्ष नेता द्वारा पांच बच्चे पैदा कर तथा उनमें किसी एक को फौज में भेजकर व एक बच्चे को साधू-संत बनाकर आम हिंदू को दी जाने वाली  सलाह का अनुसरण करते देखा गया है।

हेडगेवार गोलवरकर,दीन दयाल उपाध्याय,श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी,मोहन भागवत,लाल कृष्ण अडवाणी यहां तक कि स्वयं प्रवीण तोगडिय़ा,साक्षी महाराज अथवा साध्वी प्राची जैसे किसी भी नेता का नाम ले लें इनमें से न तो किसी के चार-पांच भाई हैं न ही इनमें से किसी नेता की कोई संतान फौज में है, न ही किसी नेता ने अपनी संतान को संत समाज को समर्पित किया है। और तो और आम हिंदुओं को पांच बच्चे पैदा करने की सीख देने वाले राष्ट्रीय स्वयं संघ परिवार द्वारा अपने स्वयं सेवकों को कुंआरा ही रहकर देश सेवा करने की सीख दी जाती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं हैं जिन्होंने विवाहित होने के बावजूद मात्र संघ की सेवा के लिए अपनी पत्नी को अपना हमसफर बनाकर रखना मुनासिब नहीं समझा। सवाल यह है कि ऐसी परिस्थितियों में जबकि देश बढ़ती हुई जनसंख्या को लेकर चिंतित है, आम देशवासियों को बिजली,पानी,स्वास्थ सेवाएं,रोज़गार, रिहाईशी मकान,तन ढकने के लिए कपड़े जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए जाने में तरह-तरह की मुश्किलें आ रही हों और पांच दशकों से सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण हेतु लोगों को जागरूक करने के लिए तरह-तरह के राष्ट्रव्यापी अभियान चलाए जा रहे हों,संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसंख्या विस्फोट के विषय पर चिंता जताई जा रही हो,देश में कंडोम तथा गर्भनिरोधक गोलियां नि:शुल्क उपलब्ध करवाए जाने जैसी सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हों,आम लोगों को जागरूक करने के लिए तरह-तरह की डाक्यूमेंट्री फ़िल्में इसी विषय पर बनाई जाती हों,पोस्टर,पंपलेंट तथा विज्ञापन आदि पर जनसंख्या नियंत्रण हेतु अरबों रुपये खर्च किए जाते हों वहां देश के सांसदों द्वारा तथा सत्तारुढ़ दल के लोगों द्वारा देश के बहुसंख्य हिंदू धर्म के लोगों को जनसंख्या वृद्धि के लिए उकसाना आखिर कितना उचित है? क्या देश के सांसदों को नैतिक रूप से सरकार की योजनाओं के विरुद्ध इस प्रकार का अनर्गल प्रचार करना चाहिए? क्या इस प्रकार का दुष्प्रचार करने वाले लोग धर्म अथवा देश के हितैषी कहे जा सकते हैंं?

आखिर क्या मकसद है इनके ऐसे दुष्प्रचार का और केवल हिंदुओं का ही आह्वान जनसंख्या बढ़ाने हेतु इनके द्वारा क्यों किया जा रहा है? जनसंख्या बढ़ाओ अभियान के पैरोकारों द्वारा मुख्य रूप से दो तर्क दिए जा रहे हैं। एक तो यह कि मुसलमानों द्वारा चार शादियां कर चालीस बच्चे पैदा किए जाते हैं। इसलिए उनकी बढ़ती आबादी भविष्य में भारत में बहुसंख्य हो जाएगी। और हिंदू अल्पसंख्यक होकर रह जाएगा। इसलिए हिंदू धर्म का शुभचिंतक बताते हुए यह लाग ऐसी सलाह दे रहे हैं। दूसरा खतरा इन्हें उस ईसाई मिशनरीज़ से है जिनपर नियोजित तरीके से धर्म परिवर्तन कराए जाने का आरोप लगता रहता है। क्या इनके द्वारा मुसलमानों व ईसाईयों के विषय में बताए जा रहे आंकड़े व इल्ज़ाम सही हैं? और यदि हैं तो ऐसा क्यों है? इन आरोपों में कितना दम है और इस प्रकार का प्रचार करने के पीछे क्या कारण निहित हैं यह जानना बहुत ज़रूरी है।

आम हिंदुओं की भावनाओं को भडक़ाने के लिए तथा उन्हें डराने के लिए भले ही यह कह देते हों कि मुसलमान चार बीवियां रखते हैं तथा चालीस बच्चे पैदा करते हैं। परंतु उनकी इस लफ़्फ़ाज़ी का वास्तविकता से दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। इस तर्क में सच्चाई केवल इतनी ही है कि मुस्लिम शरिया में कोई व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकता पडऩे पर चार पत्नियां रख सकता है। परंतु इस पर अमल भले ही छठी शताब्दी में होता रहा हो परंतु आज के दौर में यह प्रावधान केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ तक ही सिमट कर रह गया है। इस कानून का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। और यदि है तो इन दक्षिणपंथियों को देश के किसी ऐसे मुस्लिम व्यक्ति का नाम ज़रूर बताना चाहिए जिसकी चार बीवियां हों और चालीस बच्चे तो क्या बीस या दस-पंद्रह बच्चे भी हों। ?इनकी अपनी पार्टी में मुख्तार अब्बास नक़वी,शाहनवाज़ हुसैन तथा नजमा हैपतुल्ला जैसे सीमित परिवारों के मुसलमानों के बारे में यह लोग बखृबी जानते हैं।

अबुल कलाम आज़ाद,डा० ज़ाकिर हुसैन,फखरूद्दीन अली अहमद,एपीजे अब्दुल कलाम आखिर इनमें से कौन ऐसा था जिसकी चार पत्नियां थीं और चालीस बच्चे थे?? अपनी रूढ़ीवादी सोच तथा अशिक्षा के चलते जो मुस्लिम समाज अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जूझ रहा है। अपने छोटे परिवार का पेट भरने के लिए जिसे रोटी के लाले पड़े हुए हैं। वह समाज अपनी चार बीवियों को या चालीस बच्चों की परवरिश करने की कल्पना आख़िर कैसे कर सकता है? देश में हुए जनसंख्या विस्फोट का ठीकरा केवल चार शादियां जैसे प्रावधान के चलते मुसलमानों के सिर पर फोडऩा हकीकत से कहीं दूर तथा पूरी तरह हिंदू समुदाय के लोगों में भ्रम पैदा करने तथा इसी भय के चलते उन्हें राजनैतिक रूप से अपने पक्ष में संगठित करने के निहितार्थ है इसके सिवा और कुछ नहीं। दरअसल जनसंख्या वृद्धि का कारण न तो मुसलमान हैं न ही मुस्लिम शरिया में चार पत्नियां रखने का प्रावधान। बल्कि इसके पीछे एकमात्र कारण है अशिक्षा तथा जहालत। और अशिक्षित व जाहिल लोगों की जनसंख्या हिंदू धर्म में भी बड़े पैमाने पर है और मुसलमानों में भी। आप दूर-दराज़ के इलाकों खासतौर पर अशिक्षित आबादी में सर्वेक्षण करेंगे तो यही नज़र आएगा कि अधिक आबादी प्राय: गरीबों,जाहिलों व अनपढ़ लोगों की बस्तियों में ही है। और अशिक्षा व जहालत का संबंध किसी एक धर्म अथवा समुदाय से बिल्कुल नहीं है। जिस प्रकार भारतवर्ष में पचासी प्रतिशत जनसंख्या हिंदुओं की है उसी अनुपात के अनुसार अशिक्षित लोगों की संख्या भी सबसे अधिक हिंदुओं की ही है। कमोबेश यही हाल मुस्लिम समुदाय में भी है। इनमें शिक्षित लोग कम और अशिक्षित अधिक हैं। और निश्चित रूप से उन अशिक्षित मुस्लिम परिवारों में बच्चों की संख्या भी शिक्षित मुस्लिम समुदाय परिवरों की तुलना में अधिक हो सकती है। परंतु केवल अपने दूरगामी राजनैतिक हितों को साधने की गरज़ से एक ही डंडे से पूरे समुदाय को हांकना देशहित में कतई नहीं है। अन्यथा कथित हिंदू शुभचिंतकों को लालू प्रसाद यादव जैसे नेता को भी अपने उदाहरण में शामिल करना चाहिए जिनके अपने नौ बच्चे हैं। जबकि पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम ने कुंआरे ही रहकर देश को सदृढ़ बनाने में अपना पूरा जीवन गुज़ार दिया। रहा सवाल ईसाई मिशनरीज़ द्वारा धर्मातंरण कराए जाने का तो इस विषय पर बहस होती रहती है। यहां भी ईसाई मिशनरीज़ पर आरोप मढऩे के बजाए अपनी उन कमियों पर नज़र रखना ज़रूरी है जो पिछले दिनों आरजेडीसांसद पप्पू यादव द्वारा लोकसभा में चिन्हित की गईं थीं। कि आखिर क्यों लोग धर्मातंरण करते हैं? इन सब शगूफों को छोडऩे से पहले हिंदू समाज में समानता,समरसता लाए जाने की मुहिम चलाने की ज़रूरत है। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में लाखों लोगों द्वारा हिंदू धर्म त्याग कर बौत्र्द्ध धर्म सवीकार करना किसी मुस्लिम शरिया के चलते घटने वाली घटना नहीं थी। जिसे आप अपने कुंए से पानी नहीं भरने देगे,मंदिरों में प्रवेश नहीं करने देंगे, दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढऩे देंगे,सर पर पगड़ी नहीं पहनने देंगे, अपने बराबर कुर्सी या चारपाई पर बैठने नहीं देंगे उसे आप धर्म परिवर्तन करने से कैसे रोक सकते हैं? और आपको इस बात का अधिकार ही क्या है? कुल मिलाकर जनसंख्या बढ़ाओ अभियान चलाने वालों का मकसद न ही हिंदू हित है न ही राष्ट्रहित। बल्कि यह सब बहुसंख्य हिंदू मतों को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोडऩे तथा इसके बल पर सत्ता का स्वाद चखते रहने के सिवा और कुछ नहीं।

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