*ऐसे टूटेगी चीन की युद्धक हेकड़ी*

*राष्ट्र-चिंतन*

*आचार्य श्री विष्णुगुप्त*

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चीन की अपेक्षा ताइवान बहुत ही छोटा और कमजोर देश है। चीन की आबादी जहां एक अरब चालीस करोड़ है वही ताइवान की आबादी दो करोड़ 45 लाख है। चीन का रक्षा बजट ताइवान की रक्षा बजट से करीब 15 गुणा है। ताइवान की अपेक्षा चीन के सैनिकों की संख्या कई गुणा ज्यादा है। चीन के पास करीब 15 लाख रिजर्ब सैनिक हैं। जब किसी देश का रक्षा बजट बहुत ही ज्यादा होता है और जब किसी देश के पास सबसे अधिक रिजर्ब सैनिक होते है तब उसके पास युद्ध के हथियार भी बहुत ज्यादा होते हैं, खतरनाक और रक्तपिशाचु हथियारों का जखीरा भी होता है।
निश्चिततौर पर चीन के पास खतरनाक, हिसंक और रक्तपिशाचु संस्कृति के हथियारों का जखीरा है। इसके साथ ही साथ वर्तमान में चीन दुनिया की सबसे मजबूत आर्थिक वाला देश है, उसकी अर्थव्यवस्था का विकास दर भारत और शेष दुनिया से भी ज्यादा है। दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियों के कारखाने चीन में लगे हुए हैं। चीन कूटनीतिक तौर पर भी काफी मजबूत है। चीन के पक्ष में हिंसक और अराजक देशों का एक समूह भी है। चीन की रूस, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों के साथ दोस्ती भी है। चीन ने यूक्रेन के प्रश्न पर रूस का साथ देकर रूस पर बहुत ही मेहरबानी की है, इसलिए रूस किसी भी परिस्थति में चीन का साथ देने के लिए तत्पर होगा और मजबूर भी होगा। ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश अमेरिका के घूर विरोधी और पीडित है। इस कारण चीन का साथ उत्तर कोरिया और ईरान देने के लिए बाध्य होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि चीन के पास संयुक्त राष्टसंघ में बीटो का अधिकार है। बीटो के अधिकार वाले देशों को किसी भी देश पर हमला करने और किसी देश की संप्रभुत्ता को रौंदने में कोई परेशानी नहीं होती है, बीटोधारी देशों पर संयुक्त राष्टसंघ का कोई कानून और प्रतिबद्धताएं अनिवार्य तौर पर लागू नहीं होती हैं।
अब ताइवान की विशेषताएं क्या हैं? यह भी देख लीजिये। ताइवान के पास जो विशेषताएं हैं वे विशेषताएं क्या चीन के लिए हानिकारक और सबककारी होंगी? चीन से आकार-प्रकार में छोटा जरूर है, आबादी के मामले में चीन से बहुत छोटा जरूर है। पर ताइवान की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो चीन के लिए खतरनाक चुनौती होंगी। सबसे बड़ी बात यह है कि ताइवान के सैनिक बड़े दक्ष और भगोलिक स्थितियो से परिचित हैं, भगोलिक स्थितियों से प्रशिक्षित हैं। ताइवान के पास छोटे हथियारों का एक मजबूत जखीरा है। छोटे हथियार भी अपनी भगोलिक स्थितियों के कारण आक्रमणकारी दुश्मनों के खिलाफ भारी पड़ते हैं। ताइवान की युद्ध और सुरक्षा की तैयारियां चीन से कुछ ज्यादा ही गंभीर है। खासकर सुरक्षा की तैयारियां काफी मजबूत हैं। ताइवान ने सुरक्षा के लिए एयर रेड शेल्डर की नीति अपनायी है। करीब चार हजार छह सौ एयर रेड शेल्डर बनाये हैं। इन एयर रेड शेल्डरों में करीब 12 लाख की आबादी छिप सकती है और चीन के मिसाइलों और एयर हमलों से अपना बचाव कर सकती है। ताइवान की पहली प्राथमिकता चीनी हमलों से अपने नागरिकों के जीवन की सुरक्षा करना है। चीन के हैंकरों को ताइवान दिन में तारे दिखा रहा है। चीन के हैंकरों की हेकड़ी भी नाकाम साबित हो रही है। हर मिनट 84 लाख चीनी हैकर अवैध लॉग इन कर रहें और ताइवान की गोपनीय जानकारियों को हासिल करने के लिए असफल प्रयास भी कर रहे हैं। ताइवान की राष्टपति साई इंग बेन ने चीन को करारा जवाब देते हुए कहा है कि हम अपने लोकतंत्र और अपनी संप्रभुत्ता की सुरक्षा करने के लिए कटिबद्ध हैं और हम चीन के सामने किसी भी परिस्थति में नहीं झुकेंगे।
चीन युद्ध की धमकी देने और युद्ध की भूमिका बनाने में बहुत आगे है। जब अमेरिकी लोकसभा के अध्यक्ष ताइवान के दौरे पर थी तो उसके पहले ही चीन ने युद्ध की धमकी दी थी और ताइवान के साथ ही साथ अमेरिका को भी दुष्परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। अमेरिका ने अपने लोकसभा के अध्यक्ष की सुरक्षा करने के लिए अपने दर्जनों युद्धक विमानों को लगाया था। अमेरिका के युद्धक विमानों की सुरक्षा घेरे को देख कर चीन की हेकड़ी गुम हो गयी थी और कोई भी युद्धक शुरूआत करने से वह पीछे हट गया था। अगर चीन ने अमेरिकी विमानों पर कोई हमला करता तो फिर अमेरिका भी चीन को जवाब देने से डरता नहीं। अमेरिकी विमान भी चीनी विमानों को सबक देने के लिए तैयार होते।
इधर ताइवान को डराने और अमेरिका को दुष्परिणाम भुगतने की धमकियों को लेकर चीन आक्रामक है। चीन सैनिक अभियान के नाम पर हिंसा और अराजकता का प्रदर्शन कर रहा है। ताइवान के चारो तरफ सैनिक अभ्यास कर रहा है। ताइवान की वायु सीमा के अंदर चीन के लड़ाकू विमान घुसपैठ कर रहे हैं। सैनिक अभ्यास की कुछ मिसाइलें जापान की वायु सीमा के अंदर भी गिरी हैं। इसलिए जापान भी चीन के सैनिक अभियान के खिलाफ सतर्क और गंभीर है। चीन के सैनिक अभ्यास के कारण अंतर्राष्टीय वायु और समुद्र यातायात प्रभावित है। आशंका यह व्यक्त की जा रही है कि चीन ताइवान पर हमला जरूर करेगा। कहा यह जा रहा है कि जिस तरह से रूस ने यूक्रेन पर हमला किया है उसी प्रकार से चीन भी ताइवान पर हमला करेगा और ताइवान का अस्तित्व समाप्त कर कब्जा कर लेगा।
चीन अगर ताइवान पर हमला करेगा तो फिर लोकतांत्रिक दुनिया की भूमिका क्या होगी? खासकर अमेरिका की नीति क्या होगी? अमेरिका की नीति अभी से ही स्षष्ट है, घोषित है और ताइवान के साथ खड़ी है। अमेरिका ने घोषित कर रखा है कि ताइवान की संप्रभुत्ता की सुरक्षा के लिए वह समर्पित है और संकल्पित हैं। यूक्रेन का उदाहरण भी यहां उल्लेखनीय है। इसलिए यह उम्मीद नहीं हो सकती है कि अमेरिका चीन के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल होगा और ताइवान की तरफ से अमेरिकी सैनिक लडेंगे? पर ताइवान की सेना को अमेरिकी सैनिक प्रशिक्षित करेंगे। अमेरिका अपने घातक लड़ाकू विमान ताइवान को देगा। चीन के पास अच्छे किस्म के लड़ाकू विमानों की घोर कमी है। चीन के लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता का कोई प्रमाणिक जानकारियां भी नहीं हैं। कहने का अर्थ यह है कि चीनी आधुनिक हथियारों की गुणवता पर संदेह है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी हथियार चीन के लिए काल साबित होगे। अमेरिका के पास चीन को सबक सिखाने के लिए और भी हथियार हैं। अमेरिका चीन के खिलाफ व्यापारिक, वित्तीय और सूचना क्षेत्र में प्रतिबंध लगा सकता है। इसके अलावा जापान भी चीन के खिलाफ सामरिक और कूटनीतिक तौर पर घातक सकता है। जापान के साथ चीन की भी दुश्मनी पुरानी है। जापानी द्विपो पर चीन अपना अधिकार जताता है और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी सैनिकों के कथित अत्याचार को लेकर चीन आज भी जापान के साथ दुश्मनी रखता है।
चीन ताइवान को हड़पने के चक्कर में अपना भी नुकसान कर सकता है, चीन की हेकड़ी भी दम तोड़ सकती है, चीन की अर्थव्यवस्था भी चौपट हो सकती है, चीन के तथाकथित आधुनिक हथियारों की मारक क्षमता भी बेपर्द हो सकती है, चीन की पड़ोसियों पर हमला करने और उनकी संप्रभुत्ता को रौंदने की रक्तपिशाचु मानसिकता को भी सबक मिल सकता है। रूस की विशाल सेना और रूस के अति आधुनिक हथियार भी अब तक यूक्रेन पर कब्जा करने या फिर यूक्रेन को झुकाने में सफल नहीं हो सके हैं। चीन को रूस के उदाहरण से सबक लेना चाहिए। अगर चीन युद्ध हमला करता है तो फिर लंबे समय तक वह ताइवान में उलझा रहेगा। ताइवान की जनता किसी भी परिस्थिति में चीन की गुलामी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि चीन की युद्धक मानसिकताओं का दुष्परिणाम दुनिया को भी भुगतना पड़ सकता है। दुनिया के अंदर खाद्य और तेल समस्या बढेगी। किसी भी परिस्थिति में चीन की युद्धक मानसिकता की गर्दन मरोड़नी ही होगी, चीन के अंहकार और हिंसा से पड़ोसी देशों की सुरक्षा करनी ही होगी। निश्चिततौर पर चीन के लिए ताइवान एक खतरनाक चुनौती और आत्मघाती युद्ध कदम होगा।

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