Categories
धर्म-अध्यात्म

चारों वेदों की सरल शब्दों में जानकारी

सरल शब्दों में वेद
प्रायः यह कहा जाता है कि वेद केवल विद्वानो के लिए है। वेद की भाषा और शैली दोनों नीरस हैं। वेदों के अर्थों के समझना और याद रखना कठिन है। इसी समस्या का हल है यह पुस्तकें। वेदमंत्रों का सरल भाषा मे शब्दार्थ और भावार्थ इनकी विशेषता है। विद्वान लेखक ने अति सरल शब्दों मे दैनिक बोलचाल की भाषा मे वेद मंत्रो का विस्तृत व्याख्यान किया है।
वेद वन्दन 394 पृष्ठ सजिल्द ।
वेद वीथिका 326 पृष्ठ सजिल्द।
दोनों पुस्तकों का मूल्य ₹350 ( डाक खर्च सहित)
प्राप्ति के लिए 7015591564 पर whatsapp करें. (यह केवल व्हाट्सएप के लिए है। उस पर कालिंग सुविधा नही है।)
—————-
प्रस्तुत है वेद वन्दन मे एक वेद मन्त्र की व्याख्या –

समानता का उपदेश

सामान्य रूप से यह समझा जाता है कि समानता या साम्य का सिद्धान्त कम्युनिस्टो का दिया हुआ है और साम्यवाद का अर्थ कम्यूनिज्म है । यह भी समझा जाता है कि साम्य या समानता की अवधारणा कालमार्क्स की है । कम्युनिज्म समानता का प्रचारक है, किन्तु समानता के साथ ही विशुद्ध भौतिक, नास्तिक, वर्ग संघर्ष में विश्वासी, मानव के उदात्त गुणों (दया, करुणा, ममता, सहानुभूति आदि) का तिरस्कार प्रिय होने के कारण कम्युनिज्म की समानता या साम्य मानव समाज में सुख शान्ति नहीं ले आ सकता । कम्युनिज्म का साम्यवाद रूस चीन जैसे कई देशों में अपने व्यावहारिक रूप में संतोषजनक रूप में चल न सका असफल होकर सर्वथा तिरस्कृत हो गया ।

इस तथ्य को ध्यान में रखकर समानता का उपदेश देने वाले निम्न मंत्र का स्वाध्याय प्रस्तुत है –

समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।
सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः

(अथर्व०३-३०-६)

इस मंत्र में निम्न पद व्याख्या की आकांक्षा रखते हैं । (१) समानी प्रपा – प्रपा का योगरूढ़ अर्थ है जलाशय या तालाब, बाउड़ी, नदी आदि के वे स्थान जहां से लोग पानी भरते है। वेद का उपदेश है कि जलाशय सबके लिए समान है । अभी १५-२० वर्षो पूर्व तक जल पर सर्वसाधारण का समान अधिकार था । पानी पिलाना धर्म का, परोपकार का एक रूप माना जाता था । मार्गों में जगह जगह पानी पिलाने की व्यवस्था रहती थी । पानी पिलाना धर्म था । पानी को बेचने जैसे पाप को कोई सोच ही नहीं सकता था । इधर कुछ दिनों से वैश्वीकरण की बाढ़ आयी हुई है। विश्व बैंक का कहना है कि पानी एक आर्थिक वस्तु है (Water is an economic commodity, sell it) इसकी बिक्री करो, इससे लाभ कमाओं । वेद का उपदेश है- ‘समानी प्रपा’ पानीय वस्तु की समानता हो । पानी मनुष्य के कारखाने में नहीं उत्पन्न किया जाता । इसे प्रकृति के कारखाने में परमेश्वर उत्पन्न करते हैं । पानी पर किसी देश जातिवर्ग का अधिकार नहीं है । इससे लाभ कमाना मानव जाति के प्रति अन्याय है, जातीय पाप है ।

(२) सह वो अन्नभाग: – परमेश्वर उपदेश देते हैं कि हे मानव ! तुम्हारा भोजन साथ-साथ हो । सम्भव हो तो सभी साथसाथ भोजन करें । साथ में भोजन सम्भव न भी हो तो सबके भोजन में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेदभाव, जहां तक सम्भव हो, नहीं होना चाहिए । यों तो छूत- अछूत का भेद तो होना ही अनुचित है। किन्तु शिशु, युवक, वृद्ध, अध्यापक, विद्यार्थी, मजदूर श्रमजीवी और मसिजीवी आदि का भोजन अलग-अलग गुण धर्म वाले होंगे । आज घरों में काम करने वाले या श्रमजीवी मोटा अन्न पसन्द करते हैं । अतः खानपान की समानता के पीछे जो नियम ध्यान देने योग्य हैं – उन्हें अति संक्षेप में निम्न प्रकार कह सकते हैं ।

(१) प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और शक्ति के अनुसार कार्य करे, कार्य करने की सुविधा का अधिकारी हो ।

(२) प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार उपभोग सामग्री उपलब्ध हो । विद्यार्थी को बुद्धिवर्धक और श्रमजीवी को श्रम शक्ति वर्धक भोजन भोग्य प्राप्त हो ।

अन्न भाग में समानता या सहकारिता का भाव यह है कि किसी को भी भोजन का अभाव न हो । जिसके लिए जितना एवं जैसा भोजन उपयुक्त हो, उपयोगी हो, उसे उसी प्रकार का उतना भोजन प्राप्त होना चाहिए । शिशु, बालक, युवक, वृद्ध, सभी के भोजन में आयु के अनुसार पृथक्ता होना ही समानता है । इसी प्रकार श्रमजीवी बुद्धिजीवी, सैनिक, सिपाही सबके भोजन में अन्तर होना स्वाभाविक है । यह अपेक्षित अन्तर रहने पर भी सभी को उनकी आवश्यक अपेक्षा के अनुसार भोजन मिलना ही समानता है।

(३) समानी प्रपा सहवोऽन्न भाग:- इस सम्पूर्ण मन्त्रांश का आशय यह है कि उपभोग में मनुष्य मात्र को उनकी आवश्यकता की सभी वस्तुएं आवश्यकतानुसार प्राप्त हो । उपभोग में (क) भोजन (ख) वस्त्र (ग) आवास और (घ) औषध उपचार आदि सभी को सम्मिलित समझना चाहिए । यहां आवश्यक उपभोग की बात चल रही है, विलासिता या फैशन, प्रदर्शन या अमीरी आदि की गणना आवश्यक उपभोग में नहीं होती । हां, दक्षता के लिए भी कुछ अतिरिक्त सुविधाएं अपेक्षित होती हैं। उनकी गणना विलासिता अमीरी या अनावश्यक वस्तुओं में नहीं की जानी चाहिए । ।

(४) समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि – योक्त्रे का योगरूढ़ि अर्थ है जुआ, जिसमें हल आदि खींचने के लिए बैलों को या घोड़ों, भैसो को लगाते हैं, नाधते हैं. योक्त्रे का व्यापक अर्थ समझाने के लिए वैयाकरण स्वरूप से सहायता लेते हैं । योक्त्रे में ‘युजिर योगे’ धातु से दाम्नीशसयुयुज’ (३-२-१-८२) सूत्र से करण में ष्टुन् प्रत्यय करके ‘योक्त्र’ शब्द निष्पन्न होता है। जैसे लवित्रम्, – लुनाति येन, पुनाति येन तत्पवित्रम्, इसी प्रकार लवित्रम् (हंसिया) खनित्रम् (कुदाल- फावड़ा) दवित्रम्, पवित्रम् इत्यादि सभी शब्दों में करण में ही ष्ट्रन् प्रत्यय है । अब योक्त्रम् की व्युत्पत्ति होगी युनक्ति अनेन,’ जिसके द्वारा कार्य में लगाया जाये, जिस कार्य में नियुक्ति हो । यहीं से नियुक्ति शब्द भी सिद्ध होगा । नि + युजिर+ क्तिन् अर्थात् नियुक्ति (Employment) । समाने योक्त्रे का अर्थ Equality in employment । परमेश्वर का आश्वासन है कि हे मनुष्यो ! मैं तुम्हें कार्य में समान रूप से नियुक्त करता हूं ।

यहां एक ओर तो यह सुस्पष्ट है कि यह मनुष्य मात्र को

(2) Equality in employment अर्थात् नियुक्ति में, रोजगार में समानता है। अर्थात् सब को रोजगार मिले, कोई बिना काम के न रहे ।

(२) Right of employment प्रत्येक को रोजगार में नियुक्त होने का अधिकार है ।

कार्य में समानता का अर्थ एक कार्य नहीं है । आज के युग में बाजारवाद का ज़ोर है। संसार में मूल्य, व्यवहार सब रूपयों से तौला गापा जाता है। मांग और पूर्ति का बाजार है । सम्मान और आदर, सामाजिक प्रतिष्ठा, सब का एक ही निर्णायक तत्व, है ‘रुपया’ । इन परिस्थितियों में नियुक्ति में समानता का तो कोई भाव ही नहीं है। बाजार पर आधारित अर्थ व्यवस्था (market economy) का आधार और परिणति दोनों में ही विषमता है। जहां उद्देश्य प्रेरित व्यवस्था में नियुक्ति होगी वहां उद्देश्य की पूर्ति ही प्रधान लक्ष्य होगा। आज की भांति जहां व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित व्यवस्था होगी, वहां अर्थ का उपार्जन ही उद्देश्य होगा, राष्ट्रीय और जातीय स्वार्थ गौड़ हो जायेंगे । ऐसी परिस्थिति में नियुक्ति में समानता न व्यावहारिक और न नीति संगत ही होगी । जहां उद्देश्य प्रधान हो जाता है वहां कोई कार्य छोटा बड़ा नहीं रह जाता । कार्यालय के लिए मालिक मैनेजर जितने महत्त्वपूर्ण हैं, उतने ही या अधिक भी, महत्त्वपूर्ण है दरवान ! सफाई करने वाला, पानी पिलाने वाला इत्यादि । अतः जहां उद्देश्य प्रधान होगा, वही समान नियुक्ति की बात सम्भव है ।

(५) सम्यञ्चः अग्निम् सपर्यत – सम्यञ्चः का अर्थ सम्यक् प्रकार से, जैसा उचित है, जैसा अपेक्षित या आवश्यक है । सम् + अञ्जु (भ्वा० ) गतिपूजनयोः । जिस प्रकार प्रगति और सम्मान की रक्षा बनी रहे ।

सपर्यत का अर्थ है सेवध्वम् अर्थात् सेवा करो । निघण्टु का प्रमाण हैं ‘सपर्यति परिचरण कर्मा’ अर्थात् सपर्यति का अर्थ परिचर्या करना सेवा करना है । –

अग्नि है, परिचर्या का, सेवा का पात्र । सम्यक् प्रकार से अग्नि की परिचर्या करनी है । अग्नि है संकल्प, उद्देश्य, जिसकी पूर्ति सम्पूर्ण राष्ट्र को मिलकर सम्यक प्रकारेण सेवनीयमस्ति । यह राष्ट्रीय उद्देश्य है (National Objective)
राष्ट्रीय जातीय संकल्प होता है। जैसे एक व्यक्ति का उद्देश्य है, किसी का उद्देश्य अध्ययन है, तो किसी का अध्यापन, किसी का व्यवसाय, कृषि आदि अनेक उद्देश्य हो सकते हैं। परिवार के भी उद्देश्य है, कोई घर या धर्मशाला आदि बनाना है, कोई विवाह या घर का कोई सामूहिक संकल्प पूर्ण करना है तो यह परिवार की सामूहिक संकल्पाग्नि है । राष्ट्र में कभी किसी विदेशी शत्रु मे युद्ध छिड़ गया, कभी तूफान या भूकम्प, अकाल आदि की समस्याओं से राष्ट्र को उबारना आदि राष्ट्रीय उद्देश्य है। ये सभी ‘सम्यञ्चः अग्नि सपर्यत’ में शामिल हो जाएंगे ।

शतपथ में ‘अयं वै लोकोऽग्निः’ (१४-९-१-१४) पाठ मिलता है । कोष है ‘लोकस्तु भुवने जने’ । सो जो भी संसार के कल्याण सम्पादन के जातीय, राष्ट्रीय या विश्व के उद्देश्य हैं, वे सभी इस अग्नि से गृहीत होते हैं । श्री स्वामी दयानन्द जी ने संस्कार विधि में लिखा है –

‘तुमको मैं (ईश्वर) धर्मादि व्यवहार में एकीभूत करके नियुक्त करता हूं’. .. अथवा जैसे ऋत्विज् लोग और यजमान यज्ञ में मिलके (अग्निम्) अग्नि आदि के सेवन से जगत् का उपकार करते है, वैसे (सम्यञ्चः) सम्यक् प्राप्तिवाले तुम मिलके धर्मयुक्त कर्मों को (सपर्यत) एक दूसरे का हित सिद्ध किया करो’ ।

महर्षि के इस व्याख्यान से सुस्पष्ट हो जाता है कि सामूहिक, या सामाजिक या राष्ट्रीय, सभी कल्याणकारी कार्य सम्यञ्च अग्निं सपर्यत’ में गृहीत हैं ।

अब मंत्र का अगला अंतिम अंश इस बात को बता रहा है किं कैसे ‘सम्यञ्चः अग्निं सपर्यत’ अर्थात् सामूहिक उद्देश्यों की पूर्ति किस प्रकार करना चाहिए ? उत्तर दे रहे हैं –

(६) अरा: नाभिम् इव अभितः – उस प्रकार से उद्देश्य की पूर्ति में जुट जाओ जैसे अराएं रथ की नाभि के साथ जुड़कर रथ की गति को आगे बढाती है ।

अराएं समान होती हैं, रथ के पहियों को गति देती हैं, रथ के पहियों को दृढ़ता, मजबूती देती है । सो अराओं के निम्न कार्य है :(१) समानता (२) गति के साधन को दृढ़ता- मजबूती देना, (३) गति, प्रगति, गन्तव्य – उद्देश्य की ओर बढ़ाना, ये सब अराओं के कार्य हैं । यह उपमा मानव समाज के प्रत्येक घटक को, राष्ट्र के प्रत्येक विभाग को सन्देश देती है कि उद्देश्य पूर्ति में सभी समान है, सभी की भूमिका के महत्त्व को स्वीकार करना चाहिए ।

अराएं सारी एक जैसी हैं और रथ के पहिये की दृढ़ता इन्हीं अराओं के कारण है । घोड़े लगाम सारथी सबकी कर्तव्यता रथ पर ही निर्भर है और रथ अराओं के निर्बल होने पर बेकार है । इसी प्रकार सारे सामूहिक कार्यों की सफलता सभी घटकों पर निर्भर है । अराएं गति देने में सहयोगी हैं और चारों ओर से जुटी होती हैं। यह एकजुटता प्रगति का कारण है । एक वर्ग कितनी भी चेष्टा करे, परिणाम सबकी ही एकजुटता एवं भागीदारी की अपेक्षा रखता है ।

समग्र रूप में देखें तो इस मंत्र में सामूहिक उन्नति का सूत्र दिया हुआ है । इसमें कार्य और उपभोग दोनों की समानता है –

(१) उपभोग की समानता, सबको उनकी आवश्यकता के अनुसार उपभोग द्रव्य मिले और

(२) कार्य में नियुक्ति का समान अवसर सभी प्रभु प्रदत्त अधिकार ह ।

उन्नति, सफलता के दोनों पहिये हैं- उपभोग और कार्य । दोनों में समानता अभीष्ट है ।

उगता भारत समूह से साभार

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
holiganbet giriş
betgaranti mobil giriş