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जनादेश ने भरे हर जख्म, उभारे हर जख्म !!

 पुण्य प्रसून बाजपेयी

आज मां की आंखों में आंसू हैं। पिता की नजरें उठी हुई हैं। बेटे को गर्व है । बेटी पिता को निहार रही है। पत्नी की आंखें चमक रही हैं। यह केजरीवाल के परिवार का अनकहा सच है। जिसे बीते नौ महीनो के दौर में पूरे परिवार ने जिस दर्द और त्रासदी के साथ भोगा है उसका अंत जनादेश के इतिहास रचने से होगा यह किसने सोचा होगा। गजब का प्राकृतिक न्याय है। बनारस में केजरीवाल की हार और लोकसभा चुनाव में मोदी की अजेय जीत के बाद जो भक्त कल तक केजरीवाल परिवार को कटघरे में खड़ाकर तिरस्कृत करने से नहीं चूक रहे थे और समूचा परिवार दीवारों के भीतर खामोश होकर सिर्फ वक्त को बीतते हुये देख रहा था उसी परिवार को दिल्ली के जनादेश ने सर उठाकर फिर से सर आंखों पर बैठा लिया। मई 2014 के जनादेश ने मोदी को सर आंखों पर बैठाया और फरवरी 2015 के जनादेश ने केजरीवाल को मोदी के जनादेश पर भारी करार दे दिया। जख्म भरे। ईमानदारी ताकत बनी। रिश्तों की पहचान हो गई। मुश्किल दौर के हर पाठ ने जिन्दगी को जीना सिखा दिया। कुछ इसी सच के आसरे पहली बार 14 फरवरी की तारीख एक तारीख बन गई। क्योंकि इतनी तेजी से लोकसभा चुनाव के जनादेश का सम्मोहन खत्म होगा यह किसने सोचा होगा। और उसी तेजी से जनादेश एक नये इतिहास को रच देगा यह भी किसने सोचा होगा। कांग्रेस शून्य पर रहे फिर भी खुश हो जाये, यह किसने सोचा होगा। लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के भीतर का बुलबुला उबलता हुआ उभरने लगे यह किसने सोचा होगा। बूथ मैनेजमेंट और संघ की राजनीतिक सक्रियता धरी की धरी रह जाये यह किसने सोचा होगा। और जैसे ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केजरीवाल का फोन घनघनाकर बधाई दी, उसके बाद उसी सरकार के प्यादे से लेकर वजीर तक बीजेपी की हार मानकर केजरीवाल को बधाई देने पर टूटे बीजेपी के भीतर के इस खौफजदा लोकतंत्र को इससे पहले किसने देखा होगा। और जीत के बाद घमंड ना पालने देने का खुला ऐलान केजरीवाल अगर यह कहकर कहे कि पहले कांग्रेस में घंमड आया तो वह साफ हुई और अब बीजेपी में आया तो जनता ने उसे जमीन सूंघा दी तो यह किसने सोचा होगा।

वाकई जीत का इतिहास रचने के महज नौवे महीने में ही मोदी -शाह की जोडी की इतनी तिरस्कृत हार इससे पहले किसे याद होगी। राजनीति साख पर चलती है। और नेता का साख जनता के परशेप्शन पर बनती है। यह जब टूट जाये तो राजा को रंक बनाने में जनता को वक्त नहीं लगता। कुछ इसी अंदाज में दिल्ली के जनादेश ने मनमोहन से लेकर मोदी के अनकहे किस्सो को ही बेलगाम कर दिया। याद कीजिये मनमोहन सरकार में तेवर दिखाते राहुल गांधी की साख इतनी भी नहीं बची थी कि उनके सियासी फैसलो को भी जनता गंभीरता से लेती। पहली बार गांधी परिवार राजनीतिक बिसात पर एक मजाक बना दिया। और नरेन्द्र मोदी ने गांधी परिवार की साख पर आखरी कील लोकसभा चुनाव प्रचार में राबर्ट बढेरा से लेकर क्रोनी कैपटलिज्म के खुले खेल को उभार कर ठोंकी। वजह भी यही रही कि 2014 के जनादेश ने आजादी के बाद की राजनीति को ही बदल दिया। और जो मुद्दे जिस तेवर के साथ लोकसभा चुनाव में उठे उसने देश की आम जनता के भीतर बदलती राजनीति को लेकर जबरदस्त आस भी जगायी। वाकई किसानों को समर्थन मूल्य ज्यादा मिलेगा। वाकई देश में खेती की जमीन को हडपना अपराध होगा। वाकई देश उत्पादन की राह पकड़ेगा। वाकई रोजगार पैदा होंगे। वाकई वीआईपी राजनेता और कारपोरेट की नहीं देश में हाशिये पर पड़ी जनता की चलेगी। जनता के नाम पर मंत्री-संतरी की लूट बंद होगी। राजनीतिक सत्ता के जरीये विकास और विकसित होने के सपनों को जिस तरह जगाया गया उसने जातिवाद और साप्रदायवाद को हाशिये पर ढकेल कर एक नयी सियासत को जन्म दे दिया है, कुछ ऐसी ही आस तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जागी। लेकिन महज साढे आठ महीनों में अगर दिल्ली चुनाव मोदी सरकार के नाम और काम हुआ और उसे हार मिली तो यह संकेत उम्मीद जगाते है या फिर लोकसभा चुनाव के जनादेश के बाद बदले देश के हालात में पलीता लगाते हैं। उम्मीद इसलिये नहीं कह सकते क्योंकि केजरीवाल बीते चार बरसों से लगातार संघर्ष करते हुये नजर आ रहे हैं। सत्ता के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल को लेकर आंदोलन। आंदोलन से राजनीति। राजनीति में दिल्ली की सत्ता में 2013 में जीत और तो 2014 में बनारस में हार। फिर 2015 में दिल्ली में जीत । केजरीवाल का रास्ता भटकों को पटरी पर लाने का है या खुद नयी पटरी बनाकर व्यवस्था की गाड़ी के पहियों को बदल कर नये तरीके से दौड़ने का। मनमोहन सिंह आवारा पूंजी में उलझे। सत्ता के दो ध्रुव में उलझे । विकास की ताबड़तोड़ दौड में उलझे। और दुनिया के सामने भारत को बाजार के तौर पर पेश कर कांग्रेस की राजनीतिक धारा में उलझे। वहीं नरेन्द्र मोदी अपनी ही सियासी धारा में उलझे। संघ परिवार के अर्जुन और दुनिया के बाजार के सबसे बड़े व्यापारी बनने में उलझे। चुनाव के वक्त हाशिये पर पडे लोगो का राग और पीएम बनने के बाद सत्ता की हनक की धुन पर हाशिये पर पडे लोगों को रिझाने का हुनर। एक हालात ने सत्ता दिलायी तो दूसरा हालात ने जनता की भावनाओं से दूर कर दिया। वायदों की पोटली कब कैसे हवा हवाई हो गई इसका एहसास हिल्स पर कभी किसी ने करने या पीएम को कराने की जरुरत भी नहीं समझी।

2014 के जनादेश ने बीजेपी से बड़ा समर्थन बीजेपी के बाहर से पीएम को दे दिया। क्योंकि पहली बार कोई पीएम पद का उम्मीदवार जनता की बोली में सत्ता पहर निशाना साध रहा था। “स्विस बैक में जमा पूंजी चोर लुटेरों की है। जनता से लूट कर कालाधन विदेशी बैको में जना किया गया है। सरकार कहते ही कैसे लाये ,

तो क्या मोदी पीएम हो जो वह बताये कि कैसे लाये। हमारी सरकार होगी तो लेकर आयेंगे। तब बतायेंगे कैसे सरकार चलती है” । मां-बेटे और दामाद की सरकार। काले कोयले में काला घोटाला कर डूबी सरकार । लोकसभा चुनाव प्रचार के दौर में कही गई नरेन्द्र मोदी की सारी बाते देश में किसी को भी अंदर राष्ट्रहित का ज्वार पैदा कर ही देती। यानी जिस बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो चला था उसी बीजेपी को नरेन्द्र मोदी के भाषण से नयी उर्जा मिल गयी। राष्ट्रवाद हिलारे मारने लगा। संघ परिवार की राजनीतिक सक्रियता भी नरेन्द्र मोदी के आग भरे भाषणो के जरिये सार्थक नजर आयी। सत्ता को चेताने वाले मोदी के तीखे तेवर ने राजनीतिक बदलाव की एक ऐसी हवा देश में बहायी जिसमें आरएसएस के सामाजिक शुद्दिकरण की तर्ज पर मोदी के राजनीतिक शुद्दिकरण को देखा-परखा जाने लगा। लेकिन इन आठ महिनों में किसानों की खुदकुशी बढ़ी । उत्पादन बढ़ा नहीं। रोजगार कम ही हुये । महंगाई और पेट्रोल की कम कीमते नसीब पर जा टिकीं। यूरिया की कमी ने किसानों को परेशान किया। तो सीमेंट-लोहे ने रियल इस्टेट को हैरान किया। इन्फ्रस्ट्क्चर से लेकर स्मार्ट सिटी और गांवो को आधुनिक बनाने की समझ नारों में गुम होती दिखायी दी। लेकिन बीजेपी के बाहर की ताकत ने पीएम को बीजेपी से ताकतवर बना दिया तो विदेशी सत्ताधारियों के साथ भारत को बाजार बनाने की हनक ने पीएम को अंतराष्ट्रीय संबंधो की घुरी बना दिया। ऐसे मोड़ पर दिल्ली चुनाव परिणाम सिर्फ साढे आठ महीनो में सपनो के टूटने की अनकही कहानी है या फिर राजनीति में बदलाव के संकेत। दिल्ली चुनाव का जनादेश पारपरिक राजनीति के लौटने के संकेत है या दिल्ली की सत्ता के जरीये संभलने देने वाले हालात पैदा कराने की चाह। क्योंकि पहली बार सिर्फ मुसलमानो को ही नहीं दिल्ली में आम वोटरों को लगा काग्रेस को वोट देने का मतलब बीजेपी को जीताना होगा। वोटरों की प्रतिक्रिया केजरीवाल को जिताने से ज्यादा मोदी सरकार को हराने की थी । जिससे पांच बरस के लिये केन्द्र की सत्ता में बैठी मोदी सरकार को अभी से याद आ जाये कि आने वाले चार बरसो में उसकी प्राथमिकता होनी क्या चाहिये। क्योंकि संघ के हिन्दु राष्ट्रवाद के सपने में कभी रामजादा के शब्द छुपे तो कभी घर वापसी ने सवाल उठाये। कभी महिलाओं को बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला गया तो कभी गिरजाघरों पर हमलों के बीच सत्ता की खामोशी पर अंगुली उठी। मजदूरों के हक को खत्म करते सवाल हो या भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की ताकत के आगे पांच सितारा जीवन के लिये खेती की जमीन को हडपने की बिसात। बारतीय मजदूर संघ भी खामोश रहा और किसान संघ भी। किसी को भी चकाचौंध में खोये प्रधानमंत्री से सवाल पूछना भारी पडता तो सवाल किसी ने नहीं किया।

यानी मनमोहन सरकार जो यूपीए-2 में आकर डिरेल हुई। मोदी सरकार महज साढे आढ महिनो में ही क्यों डिरेल हो गई। यह ऐसे सवाल हैं जिससे पहली बार मीडिया भी बचते दिखा। कैबिनेट मंत्री भी संकोची दिखे। वरिष्ठ नेता ने मार्ग दर्शन का पाठ पढ़ना छोड दिया। नौकरशाही भी डरी हुई सी दिखी। संघ परिवार भी अपने विस्तार के लिये पूरी ढील देता हुआ दिखायी दिया। जाहिर है 2014 में जनादेश जनता का था तो 2015 में बेखौफ सत्ता को जनता ही बांध सकती है तो जनता ने ही दिल्ली में मोदी की सियासत को केजरीवाल को जनादेश देकर बांधा। और अर्से बाद केजरीवाल की मां से जब पूछा कैसा लग रहा है तो मां की आंखो में आंसू आ गये। पत्नी अर्से बाद हंसती-मुस्कुराती दिखी। बेटा अर्से बाद खूब बोलता दिखा। बेटी अर्से बाद अपने सहेलियों के साथ घर के एक कोने में चर्चा करती दिखी। जनादेश ने सिर्फ सियासत नहीं पलटी बल्कि सीख भी दी राजनीति में जहर पीना भी आना चाहिये और घमंड से दूर रहना भी आना चाहिये।

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