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राजनीति

विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते हुए संसद में गंभीर मुद्दों पर चर्चा में भाग लेना चाहिए


ललित गर्ग 

मानसून सत्र के दौरान 18 बैठकें होंगी और कुल 108 घंटे का समय उपलब्ध होगा, सत्र के कार्य में 14 लंबित बिल और 24 नए बिल शामिल हैं, इन सबको निर्बाध एवं निर्द्वन्द्व संचालित करने में सत्ता पक्ष को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

संसद का मानसून सत्र 18 जुलाई से शुरू होकर और 12 अगस्त तक चलेगा। मानसून सत्र अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, आजादी के अमृत महोत्सव का मानसून सत्र अमृतमय होना चाहिए। यह सत्र इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि इसी समय राष्ट्रपति पद और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव होकर देश को नए राष्ट्रपति, नए उपराष्ट्रपति का मार्गदर्शन मिलना प्रारंभ हो जायेगा। सत्र की शुरुआत टकराव से न होकर सकारात्मक संवाद से हो, यह अपेक्षित है। इसके लिये हर दल का प्रत्येक सांसद ठण्डे दिमाग एवं मधुर संवाद के माध्यम से सत्र की कार्रवाई को सकारात्मक बनाये एवं देश के लिये नई ऊर्जा भरते हुए विकास की नयी बहार लाये।

हर संसदीय सत्र की शुरुआत से पहले ही पक्ष-विपक्ष के बीच टकराव शुरू हो जाता है, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की लम्बी फेहरिस्त तैयार कर ली जाती हैं, सकारात्मक मुद्दों की बजाय राजनीतिक दृष्टि से प्रेरित स्वार्थों से लबालब होकर संसद के महत्वपूर्ण कालखण्ड को ध्वंसात्मक बहस में व्यर्थ गंवा देने की तैयारी होती है। इस सत्र में ऐसा ही होता हुआ दिख रहा है, जबकि संसद में स्वस्थ चर्चा एवं आलोचना होना लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है लेकिन ऐसा न होकर दुर्भाग्य से टकराव-बिखराव-विद्वेष की स्थितियां देखने को मिलती हैं, जिनमें जनता से जुड़े मुद्दों को कम ही स्थान मिल पाता है। इस बार भी ऐसा ही होता हुआ दिख रहा है। विपक्ष की नाराजगी उन शब्दों को असंसदीय घोषित करने को लेकर है, जिनका इस्तेमाल वह सदन में सरकार की घेराबंदी के लिए करता है। नाराजगी की एक अन्य वजह संसद भवन परिसर में सांसदों द्वारा किए जाने वाले धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाने को लेकर भी है। इन मुद्दों पर विपक्ष के आक्रामक रुख से यह तय माना जा रहा है कि संसद के भीतर भी यही मुद्दे हावी रहेंगे। यदि ऐसा होता है, तो महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अभाव, बाढ़, प्राकृतिक प्रकोप एवं पर्यावरण जैसे मुद्दे पीछे छूटते हुए दिखाई दे रहे हैं।

मानसून सत्र के दौरान 18 बैठकें होंगी और कुल 108 घंटे का समय उपलब्ध होगा, सत्र के कार्य में 14 लंबित बिल और 24 नए बिल शामिल हैं, इन सबको निर्बाध एवं निर्द्वन्द्व संचालित करने में सत्ता पक्ष को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। संसद का सत्र इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में टकरावमुक्त हो, शालीन एवं मर्यादामय हो, इसके लिये सत्र की शुरुआत से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शनिवार को सर्वदलीय बैठक की, जिसमें उन्होंने नेताओं को सत्र की तैयारियों की जानकारी दी। बैठक के दौरान, बिड़ला ने ‘शालीनता, गरिमा और अनुशासन’ के साथ कार्यवाही के सुचारू संचालन के लिए सभी पक्षों से सहयोग मांगा। लेकिन दुर्भाग्य से इस महत्वपूर्ण बैठक में तृणमूल कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, तेलुगु देशम पार्टी, शिरोमणि अकाली दल और वामपंथी दल सहित कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने हिस्सा नहीं लिया वहीं बीजू जनता दल का भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। हालांकि, कांग्रेस और उसके सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कषगम और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, डीएमके के टीआर बालू, वाईएसआर कांग्रेस, एनडीए के घटक लोक जनशक्ति पार्टी और अपना दल ने भी बैठक में भाग लिया।
संसद की मर्यादा एवं अनुशासन को कायम रखना जहां विपक्ष की जिम्मेदारी है, वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि वह लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करते हुए विपक्ष को भी बात रखने का पूरा मौका दे। यदि संसद के भीतर सत्ता पक्ष या सरकार विपक्ष को अपनी बात ही कहने का मौका न दे, तो यह संसदीय नियमों व परंपराओं के विरुद्ध होगा, अलोकतांत्रिक होगा। ऐसी स्थिति में विपक्ष यदि संसदीय मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए संसद के भीतर और बाहर विरोध करता है, तब देश की जनता विपक्ष पर नहीं, सरकार पर सवाल उठाएगी। वरना बिना वजह हंगामा करना विपक्ष को ही नुकसान पहुंचाता है। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह लोकतंत्र की मजबूती के लिए अपनी भूमिका को मजबूत बनाए। जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से संसद में उठाए। इसके लिए उसके पास शब्दों की कमी नहीं होनी चाहिए। फिर, सरकार की कमियों को संसदीय शब्दों का उपयोग कर भी उजागर किया जा सकता है। संतुलित शब्दों और भाषा के प्रयोग से संसद की मर्यादा भी कायम रखनी चाहिए। संसद में खुले मन से संवाद हो, जरूरत पड़े तो वाद-विवाद हो। आलोचना भी हो। बहुत उत्तम प्रकार का विश्लेषण करके चीजों का बारीकियों से विश्लेषण हो। ताकि नीति और निर्णयों में बहुत ही सकारात्मक योगदान हो सके। यह पक्ष-विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है। संसद सकारात्मक बहस का माध्यम है, इन बहसों से ही देश के नवनिर्माण एवं विकास को नये पंख लग सकते हैं, देश सशक्त बन सकता है।

संसद का यह मानसून सत्र कुछ नयी संभावनाओं के द्वार खोले, देश-समाज की तमाम समस्याओं के समाधान का रास्ता दिखाए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती महंगाई, गरीबी, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी और अपराधों पर अंकुश लगाने का रोडमैप प्रस्तुत करे, सरकार की नयी आर्थिक नीतियों से आम आदमी एवं कारोबारियों को हो रही परेशानियों को उठाए तो उसकी स्वीकार्यता स्वयंमेय बढ़ जायेगी, सत्र स्वयं सकारात्मक हो जायेगा। व्यापार, अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, ग्रामीण जीवन एवं किसानों की खराब स्थिति की विपक्ष को यदि चिंता है तो यह सत्र की कार्रवाई में दिखना चाहिए। सरकार एवं उनकी कार्यप्रणाली को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते हुए स्वस्थ एवं शालीन चर्चाओं का माहौल बनायें, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाएं, यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है।
देश में दर्जनभर से भी ज्यादा विपक्षी दलों के पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा नहीं रहा है, देश को बनाने का संकल्प नहीं है, तभी वह आलोचना, तीक्ष्ण समीक्षा एवं संवाद की जगह टकराव, छिद्रान्वेषण, आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता चुनते हैं, जो विपक्षी नेतृत्व की विडम्बना एवं विसंगतियों को ही उजागर करता है। ऐसा लग रहा है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब नेतृत्व की नैतिकता एवं नीतियों को प्रमुख मुद्दा न बनाने के कारण विपक्ष नकारा साबित हो रहा है, अपनी पात्रता को खो रहा है, यही कारण है कि न विपक्ष सार्थक एवं जरूरी मुद्दे उठा पा रहा है और न ही सार्थक विपक्ष का अहसास करा पा रहा है। विपक्ष ने मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उसके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है, जो भारतीय लोकतंत्र के लिये भी शुभता का सूचक नहीं है।

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