आयें जाने अमृत गौदुग्ध की महिमा को !!* *!! गौदुग्ध यानि देशी गाय के दूध !!*

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       ✦ *संस्कृत में दूध के तीन मूल नाम मुख्यत:-*
*इस प्रकार प्रचलित हैं :–*
*दुग्ध, क्षीर और पय।*
*‘दुग्धं क्षीरे पूरिते च’, ‘क्षीरं पानीयदुग्ध यो: पयः क्षीरे च नीरे च’*

*इन तीनों नामों की व्युत्पत्तियां संस्कृत में बहुप्रचलित हैं। इनके अलावा दूध के हजारों विशेषण नाम संसार की हर भाषा में प्रयोग में लाए जाते हैं। दक्षिण भारत की प्राचीन बोली में इसे ‘पाल’ कहा जाता है। यही नाम इसका तमिल में भी है। अंग्रेजी में इसे ‘मिल्क’ कहते हैं। दूध शब्द संस्कृत के ‘दुग्ध’ का अपभ्रंश रूप है।*

        ✦ *देशी गाय मातृशक्ति की साक्षात् प्रतिमा है*

✦ *”देशी गाय जानवर नहीं जान है इस देश की”*
✦ *”देशी गाय प्राणी नही प्राण है इस देश की”*
✦ *”गाय बचेगी तभी हम सब बच पायेगे”*
✦ *”आये लौट चले “वेद” की ओर”*
✦ *”आये लौट चले “इंडिया” से “भारत” की ओर”*
✦ *”आयें लौट चले “किचेन” से महान “रसोईघर” की ओर”*

✦ *”रसोईघर केवल भोजनालय ही नहीं “ब्रह्माण्ड” की प्रथम औषधालय भी है”।*

    ✦ *देशी गाय के दूध का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व :✦*

✦ *हमारे वैदिक सनातन धर्म में गाय का सर्वोपरि महत्व दूध के कारण ही है। उत्तरी यूरोप और रूस के इलाकों में गाय और घोड़ी का दूध प्रचलित है। अरब जैसे रेगिस्तानी क्षेत्रों में ऊंटनी के दूध का उपयोग होता रहा है। भारत में गाय, बकरी इत्यादि का दूध पुराने समय से ही उपयोगी माना जाता रहा है।*

✦ *हिन्दुओं के पूज्य और संसार के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में गाय की पूज्यता उसके दुग्ध के कारण ही है। “गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः।”*

अर्थात् *जो व्यक्ति स्वयं गाय का हनन करे या किसी अन्य से मरवाए, हरण करे या हरण करवाए, उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए।*

*इसी प्रकार वेदों व अन्य धर्मशास्त्रों में गाय और उसके दूध का महत्व उसके गुणों के कारण विस्तारपूर्वक लिखा गया है।*

✦ *वैदिक ग्रंथो में गाय को अत्यंत पवित्र माना गया है। वैदिक काल से ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, योगेश्वर श्री कृष्ण जी, भगवान श्री शंकर जी गाय पाले रखे और गाय के दूध ही खाते पिते थे भैंस का नहीं (जर्शी हॉलेस्टियन, फ्रीजियन, अमेरिकन ये सब गाय के श्रेणी में नही आते) इसकी दूध बहुत ही हानिकारक होता है।*

✦ *पूजा की थाली में घी का दीपक जलाकर रखना, यज्ञ-हवन इत्यादि में शुद्ध घी का प्रयोग करना, धार्मिक कृत्यों में दूध और घी का उपयोग करना आदि बातें इस बात का परिचायक हैं कि दूध और घी का महत्व मानव जीवन में सर्वोपरि है और श्रेष्ठतम वस्तु की भावना प्रकट करता है।*

✦ *घरों में गाय पालना एक पवित्र धर्म माना जाता है जो भारत में दूध-घी के सर्वोत्कृष्ट गुणों के कारण ही है।*

✦  *ऋषि-मुनिगण भी सदैव अपने आश्रमों में गाय पालते थे। ना कि भैंस को शास्त्रों में तो यहां तक प्रतिपादन है कि गाय की दूध घी दही खाने पीने से शरीर के कितने रोगो को नाश करता है।*

✦  *दूध में पाए जाने वाले अनुपम गुणों के कारण ही इसे समस्त पदार्थों में सर्वोत्तम माना गया है। यह सबसे अच्छा और सुपाच्य पदार्थ है। विभिन्न साग-सब्जियों एवं अन्य खाद्य पदार्थों को पचाने में शरीर की जितनी ऊर्जा व्यय होती है, उससे आधी भी दूध को पचाने में व्यय नहीं करनी पड़ती। वास्तव में यह पचा-पचाया रस है जो अति शीघ्र शारीरिक अवयवों में परिवर्तित हो जाता है। इसे न काटने की, न चबाने की जरूरत है। और न ही इसके लिए आंतों को पचाने में कोई श्रम करना पड़ता है। इसे शरीर की समस्त धातुओं में वृद्धि करने वाला ‘मधुर रस’ कहा गया है।*

✦  *दूध की इन्हीं विशेषताओं ने भारत में गाय को सर्वश्रेष्ठ सभी जानवरों में गौ का महत्व प्रदान किया है। यहां तक कि गाय को ‘गोमाता’ कहकर उसका सदैव सम्मान किया जाता है। यही है कि ‘गाय’ ही एकमात्र गौधन है जिसके संवर्द्धन से समस्त समाज को सुचारु रुप से चलाई जा सकती हैं। तो आइये जाने गाय के दूध के गुणों के बारे में…*

                 ✦ *!! अमृत गौदुग्ध की महिमा !!* ✦  

          *देशी गाय की दूध इस पृथ्वी पर सर्वोत्तम आहार है।*

1.) *मनुष्य की शक्ति एवं बल को बढ़ाने वाला गाय की दूध जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ पदार्थ इस त्रिलोकी में नहीं है। जितनी गाय के दूध और बैलो के उपयोग से मनुष्यों को सुखों का लाभ होता है उतन भैसों के दूध और भैंसों से नहीं, क्योंकि जितने आरोग्यकारक और बुद्धिवर्धक, बलकारक,मधुर ,शीतल, मृदु, स्निग्ध,बहल ,श्लक्षण, गुरु, मंद और प्रसन्न आदि गुण देशी गाय के दूध में है अन्य के दूध में नहीं (जैसे फ्रिजियन, हॉलेस्ट्टियन,अमेरिकन विदेशी सूअरो से आदि से नहीं) हो सकते।*

✦ *महर्षि चरक अपनी संहिता में लिखते है कि =* 

2.) *दस गुण से अधिक गुणों वाला दूध यदि किसी माता का है  तो वे है देशी गौमाता के दूध में है। इसलिए सामान्य होने से दूध ओज को बढा़ता है। इसलिए जीवनीय वस्तुओं में दूध सबसे अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है। यह रसायन है।* 

✦ *दीपिकातत्व :-*

3.) *दूध में जीवनीय गुण समान होने से जल के पश्चात दूध का वर्णन किया गया है। क्षीर से उत्पन्न होने से दधि आदि भी कहे जाते हैं। क्षीर का मतलब दूध, दधि का मतलब दही कहते हैं। दूध की निर्दोषता श्रेष्ठ गुण होने से कही जाती है।*

4.) *शीध्र व्याई गाय का दूध को पीयूष कहते हैं। वही जबतक पूर्ण रुप से निर्मल नहीं हो जाता तबतक “मोरट” कहा जाता है। किलाट अर्थात खूब खौलाये गये दूध का नष्ट भाग जो गाढा़ हो जाता है जिसे लोग “क्षीलसार” कहते हैं।*

5.) *दूध पथ्य सुपाच्य एवं भक्षदायक है। यह वृष के भाँति सकारात्मक (सात्विक) बल प्रदान करता है। विटामिन डी (Vitamin -D) सूर्य के अतिरिक्त गाय के दूध में ही प्राप्त होता है। इसमे मौजूद वसा सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता का होता है। यह मनुष्य के लिए (जीवों) के लिए अमृत है। गाय के दूध के कण में सुपाच्य एवं सूक्ष्म होते हैं। अतः यह मस्तिष्क की सूक्क्षतम नाड़ियों में पहूंचकर मस्तिष्क को शक्ति प्रदान करते हैं। गाय के दूध में कैरोटिन (विटामिन -A) नामक पीला पदार्थ रहता है। जो आंखों की ज्योति को बढाता है।*

✦ *महर्षि निघंटु के अनुसार :-*

6.) *देशी गाय का दूध सर्वोत्तम रसायन पथ्य बलवर्धक हृदय हितकारी बुद्धिवर्धक एवं आयुप्रद तथा त्रिदोषनाशक है।*

*नेत्र के ज्योति बढा़ने तथा नेत्र विकार को समाप्त करने के लिए धारोषण दूध पीना चाहिए और इस दूध को पीने से बल अधिक प्राप्त होता है लेकिन कमजोर पाचन वाले के लिए हितकर नहीं है जिनकी पाचन शक्ति मजबूत है उनके लिए सर्वोत्तम है। गाय के दूध में फैट का प्रतिशत 7 होता है।*

7.) *दूध में ऊँटनी का दूध भैंस से भी अधिक देती है तो भी इनके दूध से सदृश नहीं। ऊंट व ऊंटनी के गुण भार उठाकर शीध्र पहुंचाने के लिए प्रशंसनीय है।* 

8.) *दूध अनमोल गुणों का कोष है। प्राचीन भारतीय ऋषियों का आयुर्वेदिक मंत्र और आशीर्वचन ‘जीवेम शरदः शतम्’ दूध की शक्ति पर ही आधारित रहा है। दूध शरीर को मात्र शक्ति ही प्रदान नहीं करता, अपितु पुष्टि भी देता है। इसके सेवन से शरीर के समस्त धातुओं में वृद्धि होती है। दूध मनुष्य को ओज और तेज प्रदान करने का अनुपम साधन है।*

9.) *आयुर्वेद में दूध को ‘सवौषधीसार’ अर्थात समस्त औषधियों का सत्व कहा गया है। इसे समस्त रोगों की औषधि बताया गया है जो असाध्य रोगों को भी दूर करने में सक्षम है। यह ‘आयुवर्द्धक’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘अक्षि-ज्योति’ अर्थात् आंखों की रोशनी बढ़ाने वाला, ‘मेध्य’ अर्थात् मस्तिष्क की मेधा शक्ति में वृद्धि करने वाला, ‘हृद्य’ अर्थात् हृदय को बल प्रदान करने वाला, ‘देव्य’ अर्थात् देवयज्ञों में उपयोग होने वाला, ‘अनिन्द्य’ अर्थात् कभी भी निन्दा के योग्य न माना जाने वाला, ‘वीर्यवान’ अर्थात् वीर्य में वृद्धि करने वाला, ‘बल्य’ अर्थात बल प्रदान करने वाला, ‘सेव्य’ अर्थात सेवन करने योग्य और ‘रसायन’ एवं ‘रसोत्तम’ अर्थात् समस्त रसों में श्रेष्ठ रस तथा विभिन्न रसों का सार माना गया है।*

10.) *आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार भी दूध सर्वोत्तम पेय पदार्थ है जिसे ‘संपूर्ण खाद्य’ माना जाता है। इसमें 85 प्रतिशत प्रोटीन होता है। कैल्शियम, पोटेशियम,आयोडीन, फॉस्फोरस, आयरन इत्यादि खनिज लवण और विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘एच’, विटामिन ‘बी’ जैसे अनेक विटामिन भी इसमें पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं। इससे प्राप्त वसा अर्थात् ‘फैट’ भी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। जो अत्यंत सुपाच्य और हल्की होती है। इस प्रकार दूध एक ऐसा पदार्थ है जिसके सहारे मनुष्य अन्य खाद्य इत्यादि ग्रहण किए बिना भी संपूर्ण स्वस्थ जीवन बिता सकता है।*

11.) *जीर्ण ज्वरे मनोरोगे शोध-मूर्च्छा भ्रमेषुच, हितं एतद् उदाहृतम्।*

*अर्थात – पुराने से पुराना ज्वर, मानसिक बीमारियां, सूजन, बेहोशी और भ्रम अर्थात मस्तिष्क विकारों को दूर करने में गाय का दूध-घी सर्वोत्तम हितकर है।*

12.) *दूध-घी ‘आयुष्य’ अर्थात् आयु बढ़ाने वाला, ‘वृष्य’ अर्थात् पौरूष में वृद्धि करने वाला तथा ‘वयः स्थापन्द’ अर्थात् वय को सुस्थिर करने वाला है।*

13.) *श्रमे क्लमे हितम् एतद् !*

*अर्थात – दूध श्रम और थकान का नाश करने वाला है।*

*(भाव प्रकाश निघण्टु)*

रोग:-

 *माइग्रेन (आधासीसी दर्द) :*

14.) *सिर के आधे भाग में रक्त-संचार में रुकावट हो जाना इस रोग का मुख्य कारण है। स्त्रियों को यह रोग अधिक घेरता है जो उनके मासिक-चक्र, गर्भावस्था इत्यादि के कारण होता है। दिमागी काम की अधिकता, मानसिक चिन्ताएं और तनाव, वायु प्रकोप, प्रदूषणजन्य वातावरण में काम करना इत्यादि इस रोग के अन्य कारण हैं।*

15.) *इसमें सूर्योदय होने के साथ ही सिर के आधे भाग में दर्द शुरू हो जाता है। यह दर्द सूर्यास्त तक बना रहता है। कभी-कभी अत्यंत तीव्र दर्द होता है। सर्दी लगना, चक्कर आना, मन्दाग्नि हो जाना, उल्टी होना अथवा प्रकाश की असहनीयता जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं।*

                           ✦  *उपचार :-* 

*250 मि.ली. गाय के दूध में 250 मि.ली. पानी मिलाएं। अब 5 लौंग, 5 टुकड़े दालचीनी और 2 टुकड़े पिप्पली-तीनों को पीसकर दूध-पानी में मिलाकर गुनगुना ही घूट -घूट करके सेवन करें और कंबल लपेटकर सो जाएं। सुबह-शाम दो बार यह प्रयोग कुछ दिनों तक करें।*                             

                           ✦ *पंचग्वय:-*

16.) *1 चम्मच गोमूत्र 4-8 तह सुती कपड़े में 8 बार छाने तो अतिउतम् 1 चम्मच दूध, 1चम्मच गोवर रस (कपड़े से निचोरे) 1 चम्मच घी गुनगुना (वैदिक पद्धतिे हाथ से विलोना घी ताजा मिल जाये तो उतम्) 1 चम्मच दही ( ताजा) ये सभी को बारी – बारी(एक एक कर) से ही आपस में मिलाये एक साथ कभी नहीं मिलाये।*

*यह पंचग्वय औषधि सर्वरोगनाशक है इस पंचग्वय से असाध्य से असाध्य रोग मिट जाती है।*

*यह पंचग्वय कैंसर के लिए सर्वोतम औषधि है।*

      *ध्यान रखे घी ताजा या छः महीने पुराना चलेगा दूध, दही, गोमूत्र, गोवर रस ये चारो ताज ताजा ही लेना। इसमे शहद भी मिलाया जा सकता है।*

नोट:- 

*ध्यान रखे”-*

*दूध दही एक साथ नहीं मिलाना है। शहद और घी सम मात्रा में नहीं यानि बराबर मात्रा में नहीं मिलाना है। घी दो चम्मच शहद एक चम्मच यानि विषम मात्रा में मिलाया जा सकता है।*

*सेवन विधि :*
*सुबह 6:00 बजे शाम में भी 6:00 बजे ही लेना है।*

17.) *एलोपैथिक तीव्र औषधियाँ एक बीमारी हटाकर दूसरी बीमारी पैदा करती हैं। अनेक औषधियाँ रिएक्शन करती हैं, परंतु ‘पंचगव्य’ अर्थात ― गो मूत्र, गोबर, दूध, दही तथा घी को एक सुनिश्चित अनुपात में मिलाकर औषधि के रूप में सेवन किया जाय तो लाभ-ही-लाभ होता है, कोई रिएक्शन नहीं होता। पञ्चगव्य एक सशक्त टॉनिक है।*

*गाय का दूध, जीर्णज्वर, मानसिक रोगों, मूर्च्छा, भ्रम, संग्रहणी, पांडुरोग, दाह, तृषा, हृदयरोग, शूल, गुल्म, रक्तपित्त, योनिरोग आदि में श्रेष्ठ है।*

18.) *प्रतिदिन गाय के दूध के सेवन से तमाम प्रकार के रोग एवं वृद्धावस्था नष्ट होती है। उससे शरीर में तत्काल वीर्य उत्पन्न होता है।*

19.) *एलोपैथी दवाओं, रासायनिक खादों, प्रदूषण आदि के कारण हवा, पानी एवं आहार के द्वारा शरीर में जो विष एकत्रित होता है उसको नष्ट करने की शक्ति गाय के दूध में है। क्योंकि वे जंगलो से कितनी प्रकार की वनस्पति जडी़ बुटियां चर के आती हैं जो गाय माता जंगलो में विचरण कर चर के आती है तो उनके दूध दही घी गोमूत्र व गोवर में सभी प्रकार की औषधिय गुण पाई जाती है और वो सभी रोगों नष्ट कर देती है।*

20.) *गाय के दूध से बनी मिठाइयों की अपेक्षा अन्य पशुओं के दूध से बनी मिठाइयाँ जल्दी खराब हो जाती हैं।*

21.) *गाय को शतावरी खिलाकर उस गाय के दूध पर मरीज को रखने से क्षय रोग (T.B.)  मिटता है।*

22.) *गाय के दूध से कोलेस्टरोल नहीं बढ़ता बल्कि हृदय एवं रक्त की धमनियों के संकोचन का निवारण होता है। इस दूध में दूध की अपेक्षा आधा पानी डालकर, पानी जल जाये तब तक उबालकर पीने से कच्चे दूध की अपेक्षा पचने में अधिक हल्का होता है।*

23.) *यदि कच्चा दूध पीना चाहते हैं तो जब गौ दूध देती है तो उसी समय छानकर 1-2 गिलास दूध पी सकते हैं जिसे धारोषण दूध कहते हैं।  इस दूध में पूर्ण औषधिय गुण पाई जाती है औय ये दूध बहुत ही बलबर्धक , बुद्धि बर्धक ,लंबी उम्र, शरीर के कई सारे रोगों को समाप्त कर देती है।*

✦  *कृपया यहाँ पर ध्यान देने योग्य बातें हैं =*
*यह दूध सभी को नहीं पचता जिनका पाचन शक्ति मजबूत है उन्हें आसानी से पच जाता है और जिनको नहीं है उन्हें दिन में कितनी बार दस्त करा देगा , बार बार शौच लगेगा तो यहां पर आपको ध्यान देना होगा।* 

24.) *1 कप कच्चा दूध में नींबू निचोड़ कर पीने से दस्त रुक जाती है।*

25.) *दूध को गरम करे जब उबलने लगे तब नींबू निचोड़ कर छेना बनाये इस छेना का पानी पीने लीवर के समस्त रोगों में लाभ मिलता है और इसी छेना के पानी से हर प्रकार के बुखार ठीक होता है।*

26.) *गाय के गरम दूध में उसी गाय का घी मिलाकर पीने से बलबुद्धि के साथ साथ पेट भी अच्छी तरह से साफ होती है।*

27.) *पंचामृत :*
*गाय का दूध 120 ग्राम, दही 60 ग्राम, मिश्रि 30 ग्राम, शहद 15 ग्राम, घी 7 ग्राम*

*इससे निम्न और उच्च रक्त चाप (Low BP and High BP) दोनो में लाभ, हृदय रोग के लिए, इससे पाचन शक्ति मजबूत होती है। इससे प्रतिरोधक क्षमता को बढाकर शरीर को निरोग और मनुष्य को स्वस्थ रखने में पूर्ण सक्षम है।*

*= “तो है ना हमारे देशी गौमाता का चमत्कार व उनके दूध का चमत्कार…”*

*इसलिये इसे “सर्वऔषधिसार” कहा जाता है।*

✦ *इसलिये सभी आर्यो ने भगवान राम जी, भगवान श्री कृष्ण जी, भगवान शिव जी देशी गाय को सर्वोत्तम मानी है और सभी ने गाय रखी व गाय चराई। एक भी भैंस नही रखी और ना पाली* 

✦ *🌹मैं अरुण आर्य क्रांतिगुरु ज्ञान के सागर भाई राजीव दीक्षित जी व वर्तमान ऋषिवर वैज्ञानिक लेखक आचार्य अग्नि व्रत नैष्ठिक जी को सुनने के बाद व घरेलू चिकित्सा के महानायक अग्रज भाई गोविंद शरण प्रसाद जी व वैद्यमित्र आयुर्वेदाचार्य श्री सत्यवान नायक जी के ज्ञान से ज्ञानित व प्रोत्साहित हो निःस्वार्थ “स्वस्थसमृद्घपरिवार व “स्वस्थसमृद्घवैदिकभारत” के निर्माण में सदैव तत्पर हूं। आप सबो का सहयोग आशीर्वाद हेतु बड़ों का चरण स्पर्श, छोटे का शुभ स्नेह, प्रेम आप सबो से विनती है कि अपनी तकलीफे व अपनाये गये उपचार व हो रहे चिकित्सीय लाभ का संक्षेप में उल्लेख करते हुये आप अपना-अपना अनुभव औडियो वीडियो व लेख के रुप में मनुष्यहित,राष्ट्रहित के कल्याण हेतु बनाकर मुझे शेयर करे ताकि इसे पढ़ सुनकर अन्य भाई बहन भी इस ज्ञान से ज्ञानित हो सके, लाभान्वित हो सके। धन्यवाद !! वंदे मातरम् !!*🌹

✦ 🌹 *हो हमारा “स्वस्थसमृद्धवैदिक भारत ” आप सबसे विनती करता हूँ कि जीवन में किसी को सुने या ना सुने कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपने जीवन में श्री राजीव दीक्षित जी को अवश्य सुनें अपने जीवन को एक दिशा व भावी पीढ़ी को एक नई सोच देने के लिए।*🌹🔥

✦ *सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं,उन सबका आदिमूल परम् पिता परमात्मा है।🌹वेद विहित कार्य ही धर्म है,उसके विपरीत कार्य अधर्म है।*🌹

✦ *महर्षि दयानंद सरस्वती जी कहे__*
           
*जिससे पदार्थ का स्वरुप यथावत् जानकर उससे उपकार ले के अपने और दूसरों के लिए सब सुखों को सिद्ध कर सकें तो उसे हम “विद्या” कहते हैं।*

         ✦ *बिना विद्या के मानवों का परस्पर न्याययुक्त व्यवहार भी संभव नहीं, और पुनः लिखते है — *”जिससे यथावत् जानकर न्याययुक्त कर्म किये जावें वह “विद्या” कहाती है।*
          ✦ *संदर्भ विश्व के विशाल ग्रंथ – “वेदविज्ञान आलोक”*

✦ *आपका युट्युब चैनल* =
*”स्वस्थसमृद्घपरिवार”* 

*पर लगभग सभी बीमारियों का समाधान पाये।।*

https://youtube.com/c/SWASTHSAMRIDDHPARIVAR

*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*

*मन्त्र 1 :-*

*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*

*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन कभी न करें*

*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*

*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*

*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग कुछ  न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*

*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*

*• ‎ईश्वर में श्रद्धा व विश्वास रखें*

*मन्त्र 2 :-*

*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड कभी न खाएं) जैसे पीजा बर्गर चौमीन, होट डोग , कोल्ड डोग*

*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें जब गले में फसे तो एक दो घूँट ही पिये अनथा नहीं एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*

*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी बैठकर  ही सेवन कर शौच क्रिया को जाये*

*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*

*सुबह का भोजन 9:00 बजे तक अवश्य कर ले*

*शाम का भोजन सूर्यास्त से एक घंटा पहले तक अवश्य कर ले।*
*भोजन मंत्र याद न हो तो गायत्री मंत्र ईश्वर को कोटि कोटि प्रणाम धन्यवाद अवश्य करे।*

*भोजन करते समय बात चीत मोबाइल T. V.  का प्रयोग न करे।*

*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये भोजन सदैव बैठ कर ही करे*

*भोजन को ज्यादा से ज्यादा बार चबा चबा कर खाये।*

*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूर्णतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें अंतराल 5-6 घंटे की रखे*

*उस भोजन को ग्रहण कदापि न करें जिसे बनते हुए सूर्य प्रकाश न मिला हो अर्थात (कुकर का, फ्रीज़ का रखा व माइक्रोवेव का बना हो)*

*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वदेशी स्वावलंबी , स्वाभिमानी परिवार समाज,  “स्वस्थसमृद्घपरिवार” व “स्वस्थसमृद्घवैदिकभारत” निर्माण में एक पहल आप सब भी अपने अपने जीवन में किसी को सुने या न सुने कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपने जीवन में भाई राजीव दीक्षित जी व आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक जी को अवश्य सुने तथा यथासंभव खूब प्रचार प्रसार करें।*🌹

*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*🙏🏻🌹🔥

*🌹मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम में लगा हूं – भाई राजीव दीक्षित जी*

🌹 *विशेष आशीर्वाद व मर्गदर्शन :-*

 *चिकित्सा पथप्रदर्शक – अग्रज महान भाई श्री गोविन्द शरण प्रसाद जी, वैद्यमित्र आयुर्वेदाचार्य श्री सत्यवान नायक जी*

*आपका अनुज अरुण आर्य (7352904382)*

प्रस्तुति : डॉक्टर अर्जुन पांडेय झारखंड

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