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विश्व व्यापार संगठन में भारत का प्रभावी योगदान

अभी हाल ही में सम्पन्न हुई विश्व व्यापार संगठन की बैठक में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जो विशेष रूप से, भारत की अगुवाई में, विकासशील देशों की जीत के रूप में देखे जा रहे हैं। दिनांक 17 जून 2022 का दिन विश्व व्यापार संगठन के इतिहास में स्वर्णअक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि इस दिन 164 सदस्य देशों ने लगभग 9 वर्षों के उपरान्त कुछ मुद्दों पर एक राय से फैसला लिया है। 5 दिनों तक लगातार चली बैठकों में स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा से जुड़े कुछ मुद्दों पर यह फैसले एकमत से लिये गये है। वर्ष 2012-13 के बाद से लगातार लगभग 9 वर्षों तक विश्व व्यापार संगठन में एक भी निर्णय एकमत से नहीं हो सका है। इतने लम्बे अंतराल के बाद 17 जून 2022 को कुछ निर्णय एक राय से लिए जा सके हैं, यह आगे आने वाले समय के लिए एक शुभ संकेत माना जा सकता है।

जब विश्व व्यापार संगठन की उक्त बैठक प्रारम्भ हुई थी, उस समय किसी भी देश ने ऐसा नहीं सोचा था कि एकमत से कोई निर्णय हो सकेगा। परंतु, भारतीय प्रतिनिधि मंडल की प्रभावकारी भूमिका के चलते ऐसा सम्भव हो सका है और समस्त सदस्य देशों के बीच कई साकार समझौते सम्भव हो सके हैं। इससे आगे आने वाले समय में बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को लागू करने की सम्भावना एक बार पुनः जागी है। अभी तक केवल विकसित देश अपनी चौधराहट के दम पर अपने हित में ही समझौते कराने में सफल हो जाते थे। परंतु, अब भारत के नेतृत्व में विकासशील देशों का आपस में एक साझा रणनीति के अंतर्गत काम करना एक तरह से विश्व व्यापार संगठन के समस्त देशों के लिए ही फायदेमंद साबित हो सकता है।

हाल ही में पूरे विश्व में फैली कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए बनाए गए टीकों का निर्माण एवं निर्यात अविकसित एवं विकासशील देशों में करने हेतु, बौद्धिक सम्पदा अधिकार सम्बंधी नियमों में कुछ ढील देने के लिए, सभी देशों के बीच सहमति बनी है। अब इन टीकों का न केवल ये देश निर्माण कर सकेंगे बल्कि अन्य छोटे छोटे देशों को निर्यात भी कर सकेंगे। इस नियम में ढील देने का सीधा सीधा लाभ, थाईलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश एवं दक्षिणी अफ्रीका तथा पूर्वी एशिया के गरीब देशों को होगा और अब इन देशों के नागरिकों को भी कोरोना महामारी से बचाया जा सकेगा।

भारत पूर्व से ही टीकों एवं दवाईयों का निर्यात छोटे छोटे देशों को, सहायता के रूप में, करता आया है। अब जाकर विश्व के अन्य देशों ने भी भारत के इन प्रयासों की सराहना करते हुए अन्य देशों को टीकों एवं दवाईयों के निर्माण के सम्बंध में लागू बौद्धिक सम्पदा अधिकार सम्बंधी नियमों में कुछ छूट देने पर विचार करने की बात कही है। यह दरअसल समय की मांग भी है। विश्व व्यापार संगठन की आगामी बैठकों में इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार करने की बात भी कही गई है। वर्तमान में विशेष रूप से नई ईजाद की गई दवाईयों का निर्माण बौद्धिक सम्पदा अधिकार सम्बंधी नियमों का पालन करते हुए ही किया जा सकता है अतः यह अधिकार केवल उन कम्पनियों के पास ही रहता है जिन्होंने इन दवाईयों को ईजाद किया है एवं अन्य देश इन दवाईयों का निर्माण नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार इन दवाईयों के उपयोग से छोटे छोटे गरीब देशों के नागरिक वंचित रह जाते हैं।

भारत ने अन्य गरीब देशों के हितों को ध्यान में रखकर इस मुद्दे को इस बैठक में बहुत ही प्रभावी तरीके से उठाया था जिसे अन्य विकासशील देशों का अपार समर्थन प्राप्त हुआ। हालांकि भारत को इस निर्णय से सीधे सीधे कोई लाभ होने वाला नहीं है परंतु अन्य विकासशील देशों को जरूर इससे बहुत अधिक लाभ होने जा रहा है। हां, विशेष रूप से टीकों एवं कुछ जरूरी दवाईयों के निर्माण में पेटेंट सम्बंधी नियमों को यदि पूरे तौर पर हटा दिया जाए तो भारत को बहुत लाभ हो सकता है। परंतु, इस सम्बंध में अभी विचार करने की बात कही गई है जिसे भारत के हित में एक अच्छी शुरुआत माना जा सकता है। पेटेंट सम्बंधी नियमों को शिथिल किया ही जाना चाहिए और अब यह समय की मांग भी है। इस प्रकार के निर्णय बड़ी बड़ी कम्पनियों के तुलन पत्र के आकार को बढ़ाने की दृष्टि से नहीं लिए जाने चाहिए बल्कि गरीब देशों के नागरिकों को भी अच्छी से अच्छी दवाईयों को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराए जाने का प्रयास होना चाहिए।

हालांकि गरीब देशों द्वारा टीके के निर्माण के लिए बौद्धिक सम्पदा अधिकार से सम्बंधित नियमों में कुछ ढील देने का निर्णय किया जरूर गया है परंतु, व्यावहारिक रूप से इन देशों को टीकों के निर्माण में कई प्रकार के कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है। जैसे कच्चे माल के लिए इन देशों को पूर्ण रूप से विकसित देशों पर ही निर्भर रहना होगा। दूसरे, इन टीकों को अन्य देशों को निर्यात करने के लिए सप्लाई चैन की आवश्यकता होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई चैन भी विकसित देशों द्वारा ही नियंत्रित की जाती है। अतः केवल बौद्धिक सम्पदा अधिकार सम्बंधी नियमों में कुछ ढील देने से काम होने वाला नहीं है। कुल मिलाकर नियमों में शिथिलता लाने के साथ साथ विकसित देशों को भी छोटे एवं गरीब देशों की सहायता में आगे आना होगा।

दूसरे, अभी हाल ही के समय में, वैश्विक स्तर पर, यह ध्यान में आया है कि कई देशों द्वारा समुद्र की सीमा में मछली उत्पादन बहुत बड़े स्तर पर किया जा रहा है, इससे समुद्रीय पर्यावरण के विपरीत रूप से प्रभावित होने का खतरा उत्पन्न हो रहा है। अतः इन देशों द्वारा मछली पकड़ने हेतु मछुआरों को दी जाने वाली सब्सिडी की राशि को अब कम करने पर विचार किया जा रहा है ताकि मछली उत्पादन को एक निर्धारित सीमा के अंदर लाया जा सके एवं इससे पर्यावरण को हो रहे नुक्सान को रोका जा सके।

आजकल भारी मात्रा में हो रहे मछली उत्पादन के लिए नए नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आवश्यकता होती है। जापान, दक्षिणी कोरिया एवं अन्य कई विकसित देश भारी मात्रा में मछली उत्पादन के लिए न केवल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं बल्कि उन्होंने इस सम्बंध में बुनियादी ढांचा भी विकसित कर लिया है। किंतु भारत द्वारा अभी इस दिशा में काम किया जा रहा है एवं मछुआरों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाने हेतु तथा इस सम्बंध में बुनियादी ढांचा भी विकसित करने हेतु भारत द्वारा अभी भी प्रयास किए जा रहे हैं।

अब जब विश्व व्यापार संगठन में इस प्रकार के प्रस्ताव लाए जा रहे हैं कि जिन देशों द्वारा भारी मात्रा में मछली उत्पादन किया जा रहा है एवं अगर इससे समुद्रीय पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तो इन देशों द्वारा मछली उत्पादन हेतु उपलब्ध करायी जा रही सब्सिडी की राशि को घटाया जाय। हालांकि जिन देशों द्वारा इस सम्बंध में अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर यदि मछली का अतिरिक्त उत्पादन, अवैधानिक एवं अनभिलिखित रूप से किया जा रहा है एवं इससे यदि समुद्रीय पर्यावरण विपरीत रूप से प्रभावित हो रहा है तो ऐसी स्थिति में सब्सिडी की राशि कम करने अथवा समाप्त करने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। परंतु, भारत द्वारा भारतीय मछुआरों को चूंकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को उपलब्ध कराने एवं बुनियादी ढांचा विकसित करने सम्बंधी क्षेत्र में अभी कार्य किया जा रहा है एवं भारत द्वारा चूंकि देश में मछली उत्पादन में वृद्धि करने के उद्देश्य से एक विशेष योजना “प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना” भी चलाई जा रही है। अतः भारतीय मछुआरों के लिए किसी भी प्रकार की सब्सिडी को कम नहीं करने की मांग इस बैठक में भारत ने पूरे जोरशोर से उठाई। भारत की इस मांग पर विश्व व्यापार संगठन ने गम्भीरता से विचार किए जाने की बात कही है और इस प्रकार अभी भारत सरकार द्वारा भारतीय मछुआरों को प्रदान की जा रही सब्सिडी को कम करने की आवश्यकता नहीं होगी। इस निर्णय को भी विश्व व्यापार संगठन में भारत की जीत के रूप में देखा जा रहा है।

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