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भारत के आर्थिक विकास में बढ़ रहा है मातृशक्ति का योगदान

भारत की 50 प्रतिशत आबादी मातृशक्ति के रूप में विद्यमान है। देश के आर्थिक विकास को यदि पंख लगाने हैं तो इस आधी आबादी को सशक्त कर उन्हें उत्पादक कार्यों में लगाना अनिवार्य है। विशेष रूप से वर्ष 2014 में केंद्र में श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के आने के बाद से भारत में मातृशक्ति का सशक्तिकरण बहुत ही तेज गति से किए जाने के प्रयास हो रहे हैं और भारत में आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को बढ़ाने के उद्देश्य से कई विशेष योजनाओं को लागू किया गया है। इसके सुखद परिणाम भी अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। अभी हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए जमाराशि एवं ऋणराशि में हो रही वृद्धि दर सम्बंधी आंकड़ों में मातृशक्ति का लगातार बढ़ रहा योगदान स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

यह बहुत ही हर्ष का विषय है कि वित्तीय वर्ष 2022 में समस्त वाणिज्यिक बैकों की जमाराशि में हुई वार्धिक वृद्धि में महिलाओं का योगदान 35 प्रतिशत का रहा है जो कि वित्तीय वर्ष 2021 में केवल 15 प्रतिशत का रहा था, अर्थात, प्रतिशत में, 20 बिंदुओं का जबरदस्त उच्छाल दृष्टिगोचर हुआ है। एक तथ्य यह भी उभरकर सामने आया है कि विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के योगदान में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वित्तीय वर्ष 2022 में ग्रामीण क्षेत्रों में जमाराशि में हुई वार्धिक वृद्धि में ग्रामीण महिलाओं का योगदान 66 प्रतिशत का रहा है जबकि वित्तीय वर्ष 2020 में यह केवल 37 प्रतिशत का रहा था। दरअसल, कुछ राज्य सरकारों ने विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत प्रदान की जाने वाली सहायता राशि का पैसा महिलाओं के बैंक खातों में ही हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है, इसलिए जमाराशि की वार्धिक वृद्धि में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण इलाकों में जमाराशियों की वृद्धि में महिलाओं के लगातार बढ़ रहे योगदान में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की विशेष भूमिका देखी जा रही है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में वित्तीय वर्ष 2020 से वित्तीय वर्ष 2022 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों की जमाराशि की वार्धिक वृद्धि में महिलाओं का योगदान 60 प्रतिशत रहा है। यह इन बैंकों द्वारा स्वयं सहायता समूह की समस्त महिला सदस्यों के जमा खाते खोले जाने के चलते सम्भव हुआ है। जबकि, पूर्व में स्वयं सहायता समूह के केवल अध्यक्ष और सचिव महिला सदस्यों के खाते खोले जाते थे। चूंकि स्वयं सहायता समूहों की स्थापना विशेष रूप से ग्रामीण एवं अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में ही अधिक हो रही है अतः क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा इन्हीं क्षेत्रों में महिलाओं के अधिक से अधिक जमा खाते खोले जा रहे हैं। देश में स्थापित कुल स्वयं सहायता समूहों में से 48 प्रतिशत स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत हैं जबकि 44 प्रतिशत स्वयं सहायता समूह अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। स्वयं सहायता समूह न केवल कृषि के क्षेत्र में कार्यरत हैं बल्कि कृषि रहित अन्य सूक्ष्म गतिविधियों में भी कार्य करते दिखाई दे रहे हैं।

वित्तीय वर्ष 2020 की जमाराशियों पर वित्तीय वर्ष 2022 में जमाराशि में हुई वार्धिक वृद्धि में महिलाओं के योगदान में सबसे अधिक वृद्धि उत्तर प्रदेश राज्य में हुई है। इसके बाद तेलंगाना, कर्नाटक एवं केरल का स्थान आता है। इसके विपरीत दिल्ली, मध्य प्रदेश एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में जमाराशि में हुई वार्धिक वृद्धि में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है। यह इन राज्यों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए एवं इन राज्यों द्वारा तुरंत इस संदर्भ में कुछ उपाय किए जाने चाहिए ताकि महिलाओं की भागीदारी इन राज्यों में भी बढ़े।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ही जारी की गई जानकारी के अनुसार, भारत में समस्त अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में 31 मार्च 2022 को प्रदान की गई कुल ऋणराशि में महिलाओं का योगदान 22.5 प्रतिशत का पाया गया है। महिला ऋण खातेदारों की संख्या 9.1 करोड़ तक पहुंच गई है। इस दौरान कृषि, उद्योग एवं व्यापार के क्षेत्र में महिला ऋण खातेदारों की संख्या में बहुत आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है। कोरोना महामारी के खंडकाल में महिला उद्यमियों ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र में अधिक मात्रा में ऋण लिया है, क्योंकि इन ऋणों पर केंद्र सरकार द्वारा प्रतिभूति प्रदान की जा रही थी। वित्तीय वर्ष 2014-15 में व्यक्तिगत खातों में प्रदान की गई कुल ऋणराशि में से महिलाओं को 18.3 प्रतिशत राशि प्रदान की गई थी जिसमें वित्तीय वर्ष 2021-22 तक 4.3 प्रतिशत (430 बिंदुओं) की वृद्धि होकर अब यह 22.5 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। इस दौरान 6.7 करोड़ नए महिला खातेदारों को कुल 7.8 लाख करोड़ रुपए की वार्धिक ऋणराशि प्रदान की गई है।

भारतीय महिलाओं को सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से देश में कई योजनाएं प्रारम्भ की गई है। देश में 9 करोड़ से अधिक शौचालय बनाकर महिलाओं के गौरव को बढ़ाया गया है। कई शिक्षा योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रारम्भ की गई हैं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के अंतर्गत अच्छा कार्य हो रहा है। बच्चियों को पढ़ाने की ओर अब ध्यान दिया जा रहा है। महिलाओं को प्रदान किए जा रहे शिक्षा ऋण पर ब्याज दर तुलनात्मक रूप से कम है। पोस्ट ऑफिस के माध्यम से सुकन्या समृद्धि योजना प्रारम्भ की गई है। महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखने हेतु एक बड़ी योजना देश में प्रारम्भ की गई है। मुद्रा योजना प्रारम्भ की गई है, यह देखा गया है कि इस योजना के अंतर्गत प्रदत्त कुल ऋणों का लगभग 75 प्रतिशत भाग महिलाओं को प्रदान किया गया है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बैंक महिलाओं तक पहुंचे, यह भी कोशिश की गई है। महिलाओं द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बाजार तक पहुंचाने हेतु ऑनलाइन महिला ई-हाट की सुविधा प्रारम्भ की गई है, जहां महिलाएं अपने उत्पादों का विक्रय कर सकती हैं। इस साइट पर हजारों की संख्या में उत्पाद बिक्री हेतु उपलब्ध हैं, लगभग सभी राज्य इस योजना से जुड़ गए हैं एवं लाखों की संख्या में ग्राहक इस साइट पर लगातार विजिट कर रहे हैं। स्टैंड-अप योजना के अंतर्गत महिलाओं के कौशल को विकसित किया जा रहा है। सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, जरदारी, आदि का काम महिलाओं को सिखाया जाता है। महिला होस्टल समूह भी बनाए गए हैं। महानगरों एवं शहरों में स्थित इन महिला होस्टल में ग्रामीण कामकाजी महिलाओं को रहने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। केंद्र सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण हेतु लागू की गई उक्त योजनाओं के कारण ही अब समस्त वाणिज्यिक बैकों की जमाराशि एवं ऋणराशि में महिलाओं का योगदान बहुत तेजी से बढ़ रहा है।

वर्ष 2014 के बाद से विशेष रूप से प्रधानमंत्री जन-धन योजना के लागू किए जाने के बाद से तो भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में सुधार दृष्टिगोचर है। जमाराशि एवं ऋणराशि में महिला खातेदारों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। यही नहीं, केंद्र सरकार द्वारा बैंकों, वित्त एवं आर्थिक क्षेत्र में लागू की गई विभिन्न विशेष योजनाओं जैसे – मुद्रा ऋण योजना, में महिलाओं की भागीदारी में लगातार सुधार देखने में आ रहा है। इसके अतिरिक्त महिला सशक्तिकरण के लिए अलग से विशेष योजनाएं भी चालू की गई हैं – सुकन्या समृद्धि योजना, उज्जवला योजना, महिलाओं को प्रदान की जाने वाली छात्रवृत्ति योजना, आदि। यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य होता है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओं जैसे स्टैंड-अप इंडिया में महिलाओं की भागीदारी 81 प्रतिशत हो गई है, मुद्रा ऋण योजना में महिलाओं की भागीदारी 71 प्रतिशत हो गई है, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में 37 प्रतिशत एवं प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना में 27 प्रतिशत भागीदारी हो गई है।

भारत में 6.36 करोड़ महिलाएं स्वयं सहायता समूहों एवं दीनदयाल अंत्योदया योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ गईं हैं। स्वयं सहायता समूहों में 8 से 10 महिलाएं मिलकर एक समूह बनाती हैं, ग्रामीण स्तर पर अपने संगठन का निर्माण करती हैं, क्लस्टर स्तर पर फेडरेशन भी बनाती हैं। अपनी आजीविका एवं व्यापार विस्तार के लिए इन महिलाओं द्वारा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बैंकों से ऋण लिया जाता है। इन समूहों की एक सबसे अच्छी बात यह है कि इन स्वयं सहायता समूहों द्वारा बैंकों से लिए गए ऋण में गैर निष्पादनकारी आस्तियां बहुत कम मात्रा में पाई जा रही हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं द्वारा सेवा केंद्र भी स्थापित किए गए हैं जहां महिलाओं के समूह द्वारा पावर टिलर, कृषि उपकरण, मिट्टी की जांच आदि सम्बंधी कार्य किसानों के लिए किए जाते हैं। ग्रामीण आजीविका के नाम से सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में आज महिलाओं द्वारा ऑटो रिक्शॉ चलाए जा रहे हैं। साथ ही, सुदूर ग्रामीण इलाकों में महिलाएं ही वित्तीय समावेशन को मूर्त रूप देने में लगी हुई हैं। आज लाखों की संख्या में महिला किसान, कृषि के क्षेत्र में, कृषि सखी के रूप में कार्य कर रही हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कृषि सख़ी, पशु सखी, बैंक सखी, आदि के रूप में कार्य कर इन इलाकों के विकास में अपनी महती भूमिका निभा रही हैं।

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