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कुरैशी की शर्मनाक बर्खास्तगी

मिजोरम के राज्यपाल अजीज़ कुरैशी को जिस तरह बर्खास्त किया गया, वह हमारी सरकार, हमारे राष्ट्रपति और हमारे लोकतंत्र की स्वस्थता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। कुरैशी को यदि सिर्फ इसलिए बर्खास्त किया गया है कि वे कांग्रेसी हैं तो क्या कांग्रेसी होना देशद्रोह है? यदि कांग्रेसी होना ही बर्खास्तगी के लिए काफी है तो सबसे पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर भाजपा सरकार को सोचना चाहिए था। उनसे बड़ा कांग्रेसी कौन है? मुझे आश्चर्य तो खुद प्रणब दा पर है। उन्होंने कुरैशी की बर्खास्तगी के कागज़ पर दस्तखत कैसे कर दिए? कोई भी फैसला करते समय राष्ट्रपति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं?

देश यह जानना चाहता है कि राज्यपाल कुरैशी को राष्ट्रपति मुखर्जी ने किस आधार पर बर्खास्त किया है? यदि बर्खास्तगी का आधार यह है कि पिछली सरकार ने उन्हें नियुक्त किया है तो प्रणब दा बताएं कि के.के. पॉल अभी तक राज्यपाल कैसे बने हुए हैं? मुखर्जी ने उन्हें बर्खास्त क्यों नहीं किया या कराया? मुखर्जी पर कौन—सा दबाव काम कर रहा है, जिसके कारण एक पूर्व पुलिस अधिकारी को मोदी सरकार बर्दाश्त कर रही है? मैं पॉल और नजीब जंग की योग्यता या ईमानदारी पर कोई शक नहीं कर रहा हूं। वे प्रतिष्ठित अफसर रहे हैं लेकिन अजीज कुरैशी की योग्यता, ईमानदारी और सच्चरित्रता में क्या कहीं कोई संदेह है? यदि कुरैशी ने राज्यपाल के तौर पर कहीं कानून का उल्लंघन किया है तो उस पर कोई आपत्ति अभी तक क्यों नहीं की गई? उन्हें तंग करने और बर्खास्त करने के बाद बदनाम करने के लिए लगाए आरोपों का महत्व जनता की नजर में क्या रह जाएगा?

मैं तो यह समझता हूं कि कुरैशी जैसा राज्यपाल भारत में कोई और नहीं है। अजीज़ कुरैशी ने उत्तराखंड के राज्यपाल के तौर पर भारत में प्रथम विश्व संस्कृत सम्मेलन बुलवाया। उसमें दिया गया उनका भाषण संस्कृत के पंडितों के लिए भी प्रेरणास्पद था। इसी प्रकार उन्होंने उ.प्र. के राज्यपाल रहते हुए दिल्ली, उ.प्र., उत्तराखंड और हरियाणा के हजारों कुरैशियों का सम्मेलन लखनऊ में बुलवाया। वहां उन्होंने जो प्रस्ताव पारित करवाया, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। उस कुरैशी सम्मेलन ने यह प्रस्ताव पारित किया कि वे अपने हिंदू भाइयों की भावनाओं का सम्मान करेंगे। गोवध नहीं करेंगे और जो भी कुरैशी गोवध करता पाया गया, वे उसका मुंह काला करेंगे। कुरैशी राज्यपाल की शपथ लेने के बाद हरिद्वार गए और उन्होंने कई मंदिरों की भी यात्रा की। ऐसे राज्यपाल को मोदी सरकार अपमानित करके अपना और इस देश का अपमान कर रही है।

यह भी समझ में नहीं आया कि कुरैशी की बर्खास्तगी का मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है, फिर भी राष्ट्रपति ने दस्तखत कैसे कर दिए? क्या यह न्यायालय की अवमानना नहीं है? मुझे विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की संविधान—पीठ इस मसले को शीघ्र तय करेगी और भारत सरकार, राष्ट्रपति और भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को नष्ट होने से बचाएगी।

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