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हत्यारा एक भी नहीं मिला

आज से 28 साल पहले हुए हाशिमपुरा हत्याकांड पर जो फैसला अदालत ने दिया है, उसका क्या अर्थ लगाया जाए? उसका ठीक-ठीक अर्थ जानने के पहले हमें कुछ तथ्यों को समझ लेना चाहिए। हाशिमपुरा मेरठ जिले का एक गांव है। मई 1987 में एक हिंदू डॉक्टर प्रभातसिंह को ‘एक भीड़ ने घेरकर मार डाला’। तीसरे दिन उ.प्र. की पुलिस और भारतीय फौज ने हाशिमपुरा में मुसलमानों को पकड़कर उनके घर से निकाला और लगभग 50 को ट्रकों में भरकर एक निर्जन स्थान पर ले गए। उन्हें कतार में खड़े करके शूट कर दिया। कुछ भाग गए लेकिन 42 लोग मारे गए। उनके शवों को गंगनहर में बहा दिया गया।

उस समय उ.प्र. में वीरबहादुर सिंह की कांग्रेस सरकार थी और केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी। इस भयंकर नरसंहार की न तो थाने में रपट लिखी गई, न कोई जांच की गई और न ही किसी को पकड़ा गया याने राज्य और केंद्र सरकार की मिलीभगत थी। इस मिलीभगत के खिलाफ कुछ गैर-सरकारी मानवअधिकार संगठनों ने आंदोलन किया तो सात साल बाद एक गोलमोल रपट (गोपनीय) दी गई। अब28 साल बाद अदालत ने जो फैसला दिया, उसमें यह तो पता चलता है कि 42 लोगों की हत्या हुई लेकिन अदालत को हत्यारा एक भी नहीं मिला। 19 के 19 आरोपी बरी हो गए, क्योंकि उनके विरुद्ध ठोस प्रमाण नहीं मिले। वाह, क्या अदभुत न्याय है?

सबसे पहली बात तो यह कि 28 साल की देर के लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसी अदालत को भी कोई सजा है या नहीं? जिन सरकारों ने प्रमाण नहीं जुटाए, उनके जो-जो नेता और अधिकारी अभी जिंदा हैं, उन्हें कम से कम पांच-पांच साल की सजा तो मिलनी चाहिए। उनकी सारी संपत्तियां प्राविडेंट फंड और पेंशन जब्त होनी चाहिए। यह मामला बड़ी अदालतों में दुबारा चलना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए कि वह इस मामले को अपने हाथ में ले।

इस मामले को सांप्रदायिक रंग देना ठीक नहीं। यदि हाशिमपुर के मुसलमानों पर मेरठ के हिंदू हमला करते तो यह मामला सांप्रदायिक हो जाता लेकिन उल्टा हुआ। 12 मुसलमानों की रक्षा एक हिंदू पड़ौसी ने की, उन्हें अपने घर में छिपाकर। यह मामला है, सरकार के सिरफिरेपन का! निरंकुशता का! सरकार को गुस्सा आ गया, प्रभातसिंह की हत्या के कारण! उसने गंगनहर को लाल कर दिया मुसलमानों के खून से! सरकारों ने इस तरह के कई हत्याकांड कई बार किए हैं लेकिन वे कानून की गिरफ्त से बच निकलती है। यदि सत्ताधीशों को यह पता चल जाए कि वे बचेंगे नहीं तो इस तरह के हत्याकांड का हुकुम देने के पहले वे सौ बार सोचेंगे।–

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