दुनिया का भारत की ओर आकर्षित होने का आखिर कोई तो कारण है

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अंशु जोशी

सोवियत रूस के विघटन के बाद जब दुनिया शीत युद्ध से निकलकर आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण और तकनीकी उत्कृष्टता के दौर में आ रही थी, तब शक्ति के मायने भी बदल रहे थे। नब्बे के दशक में ताकत उन देशों की मानी गई, जिनके पास संस्कृति, ज्ञान, साहित्य, भोजन, योग, सिनेमा और प्रवासियों की ताकत थी। असल में भारत की ताकत दुनिया ने तभी से समझनी शुरू की।
आजादी के बाद भारत सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा के क्षेत्र में आगे तो बढ़ा, लेकिन तब तक इसकी पहचान दुनिया में तीसरी दुनिया के एक देश के रूप में ही बन पाई थी। भारत खुद को गुटनिरपेक्ष देश तो कहता रहा, लेकिन अक्सर सोवियत रूस की छाया में खड़ा दिखा। मगर पिछले आठ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पटल पर न सिर्फ हमारी यह छवि बदली, बल्कि हमने एक नई पहचान के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर कदम रखा। आज यूक्रेन-रूस संकट में अमेरिका, रूस, यूक्रेन और बाकी देश भारत से मध्यस्थता की मनुहार कर रहे हैं। यह भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है।
पिछले महीने जापान में क्वॉड समिट के बाद यह साफ हो गया कि चाहे जलवायु परिवर्तन रोकने का लक्ष्य हो या तालिबान जैसी आतंकी शक्तियां हों, पाकिस्तान हो या इन सबके पीछे खड़े होकर दुनिया की शांति और सुरक्षा को चुनौती देता चीन हो, आज भारत न सिर्फ इनके प्रति मुखर है बल्कि वह ऐसी तमाम नकारात्मक शक्तियों से निपटने में अकेला नहीं है। लड़ाई चाहे आतंकवाद से हो या कोविड से, भारत हर महत्वपूर्ण वैश्विक लक्ष्य की प्राप्ति का प्रणेता बन चुका है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ताकत से दुनिया भर में अच्छे संबंध बनाए हैं, जिनका असर अब साफ दिखता है।

जब पूरी दुनिया कोरोना से जूझ रही थी, चीन अपनी हरकतों से समूचे विश्व की सुरक्षा और शांति के लिए चुनौतियां पैदा कर रहा था। क्वॉड के जरिए भारत ने चीन के विस्तारवादी षड्यंत्रों को नाकाम करने का सफल प्रयास भी किया। क्वॉड के अन्य सदस्य देशों, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका ने बातचीत तथा बैठकों में चीन के आक्रामक तथा कब्जा करने के रवैये की भर्त्सना की, साथ ही स्वतंत्र और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामूहिक दृष्टि पर अपनी प्रतिबद्धता जताई। इस सब में भारत ने न सिर्फ कूटनीतिक सफलता अर्जित की, बल्कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को यह साफ मैसेज दिया कि वे भारत को कमजोर ना समझें।
भारत ने ब्राजील, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों से लेकर नेपाल और बांग्लादेश तक सत्तर से अधिक देशों को कोविड की वैक्सीन भेजी और ‘वैक्सीन डिप्लोमैसी’ का एक नया अध्याय शुरू किया। आज तीसरी दुनिया के देश से बदलकर भारत की तस्वीर अगर एक शक्तिशाली देश के रूप में उभरी है, तो मानना होगा कि भारत की वसुधैव कुटुंबकम परंपरा का इसमें बड़ा योगदान रहा है। अमेरिका से भी भारत के संबंध अच्छे हुए हैं। योग हो, व्यंजन हों, सिनेमा हो या प्रवासी भारतीयों का समुदाय, अमेरिका में भारत का प्रभाव साफ दिखता है। अमेरिका और भारत के कई उद्देश्य एक से होते हुए भी वर्षों से दोनों के बीच संबंधों में वह सहजता नहीं दिखी, जिसकी दरकार थी। खुद को गुट निरपेक्ष कहते हुए भी हम कहीं न कहीं रूस के खेमे से जुड़े रहे। मगर प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ अमेरिका के साथ संबंध मजबूत किए, बल्कि रूस के साथ चले आ रहे सशक्त संबंधों पर इसका कोई प्रभाव पड़ने नहीं दिया।
जापान और कोरिया जैसे देशों के साथ भी हमारे सांस्कृतिक संबंधों ने साझा विकास को नई गति देने का प्रयास किया है। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस, जापान और कनाडा जैसे देशों के साथ बढ़िया संबंधों का प्रभाव चीन और पाकिस्तान जैसे शत्रुता का भाव रखने वाले देशों की हरकतों को रोकने में निश्चित ही महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहा है। आज भारत की छवि एक सहज, मिलनसार किंतु शक्तिशाली राष्ट्र की बनी है। भारत ने वैश्विक राजनयिकों के साथ मित्रता के नए सोपान गढ़े, वहीं पाकिस्तान और चीन जैसे देशों को साफ संदेश दिया कि भारत की सुरक्षा पर किसी प्रकार का प्रहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह नए भारत की ताकत है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति-कला तो है ही, सबसे ज्यादा सहयोग की भावना है।

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