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धारा 370 को कर सकता है राष्ट्रपति समाप्त

370जम्मू में 20 नवम्बर 2008 को ब्यूरो पुलिस रिसर्च एवं डवलपमेंट द्वारा आयोजित एक समारोह में राज्य के चीफ सेक्रेटरी एस.एस. कपूर ने बताया कि पिछले 20 वर्षों में सुरक्षाबलों के जवानों समेत कुल 47 हजार लोगों की हत्या अलग-अलग आतंकवादी हमलों में हुई है। कपूर द्वारा पेश किया गया यह आंकड़ा हमें यह सोचने को विवश करता है कि आखिर भारत सरकार के तमाम प्रयासों के उपरान्त भी जम्मू-कश्मीर में रक्तपात थमने का नाम क्यों नहीं ले रहा?

जम्मू कश्मीर राज्य की स्थिति भारत में अनोखी है। एक प्रकार से द्वैध शासन की व्यवस्था को स्वयं हमारा संविधान ही इस प्रान्त में मान्यता प्रदान करता है, जिससे हमारे संविधान की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। दक्षिण भारत से लेकर पंजाब और हिमाचल के उस छोर तक जहाँ से जम्मू कश्मीर की सीमा का आरम्भ होता है, आप भागे चले जाइए, हमारा संविधान आपको निरंतर अपनी सुरक्षा प्रदान करता रहेगा। किन्तु जम्मू कश्मीर की सीमा में घुसते ही आपका साथ हमारा भारतीय संविधान छोड़ देगा। अपने देश में ही आप ठगे से रह जाएँगे। आपको ज्ञात हो जाएगा कि आपके भारतीय संविधान की सीमाएँ क्या हैं? सम्भवत: ऐसी हास्यास्पद स्थिति संसार के किसी अन्य देश के संविधान की नहीं है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 और 370 स्वयमेव जम्मू-कश्मीर पर लागू होंगे। अन्य अनुच्छेदों का लागू होना राज्य की सरकार के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाएगा। यह एक अन्तरिम व्यवस्था बताई गई जिसके विषय में प्राविधानित किया गया, कि यह व्यवस्था तब तक चलती रहेगी जब तक जम्मू-कश्मीर की संविधानिक सभा अपना विनिश्चय न कर दे। व्यवस्था यह भी दी गयी कि इस संविधान सभा की संस्तुति राष्ट्रपति को भेजी जाएगी जो इस अनुच्छेद को निराकृत करेगा अथवा संविधान सभा की संस्तुतियों के अनुसार इस धारा का उपान्तरण करेगा। जम्मू कश्मीर राज्य भारत का मुस्लिम बाहुल प्रान्त है। इसमें मुस्लिमों के हित संरक्षण के लिए यह विशेष अनुच्छेद भारत के संविधान में स्थापित किया गया है। यह अनुच्छेद अस्थायी था। इसे लेकर भाजपा ने देश में जमकर राजनीति की, किन्तु जब उसके शासन काल में इसे हटाने का समय आया तो उसका ‘कमल’ मुरझा गया। परिणाम ये हुआ कि आज इस राज्य से लाखों हिन्दू पलायन करने पर विवश हो चुके हैं। ये लोग देश की राजधानी सहित कई प्रान्तों में शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस संविधान की व्यवस्थाओं के कारण एक ही देश के लाखों नागरिक उसी देश में शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं। ये शरणार्थी आज तक नहीं समझ पाए कि वास्तविक स्वतंत्रता क्या होती है? व्यक्ति की गरिमा की रक्षा यह संविधान नहीं कर पाया? व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा भी नहीं कर पाया? देश की अखण्डता की रक्षा नहीं कर पाया? सब नागरिकों के मध्य समानता का व्यवहार नहीं कर पाया?

फि र किसलिए इसे हम ढो रहे हैं? हमारे देश के लिए दुर्भाग्य हैं, ये अनुच्छेद 1947 ई. जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आकर जम्मू कश्मीर में बस गए थे उन्हें आज तक विधानसभा के चुनाव में मत डालने का अधिकार प्रदान नहीं किया गया। ये लोग लोकसभा के चुनावों में ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। इससे भी अधिक दुख:दायी स्थिति ये है कि इस प्रान्त का जनसांख्यिकीय आंकड़ा विकृत करने के दृष्टिकोण से यहाँ उन मुस्लिमों को पुन: बुलाकर बसाने का कार्य किया जा रहा है जो 1947 में भारत छोडक़र पाकिस्तान चले गए थे। इससे इस प्रान्त में हिन्दू समुदाय का जीना दूभर हो गया है। कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं की छदम धर्मनिरपेक्षता यहाँ इस प्रान्त के हिन्दुओं की पीड़ा के प्रति पत्थर बन गयी है।

यह अन्याय का क्रम है जो अभी जम्मू कश्मीर में बन्द होता दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। अब जबकि यह संविधान और इसका यह राष्ट्रविरोधी प्रावधान हमें इतनी पीड़ा पहुँचा रहा है तो इसे समाप्त करने पर विचार होना चाहिए। इसी अनुच्छेद के खण्ड 3 में यह उपबन्ध् है-

‘‘इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा, या ऐसा अपवादों और उपान्तरणों सहित ही ऐसी तारीख से प्रवर्तन में रहेगा, जो वह निर्दिष्ट करे, परन्तु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना निकाले जाने से पूर्व खण्ड 2 में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की संस्तुति आवश्यक होगी।’’

आज जबकि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा विद्यमान नहीं है तो ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रपति की शक्ति पर अब कोई बाधा नहीं है। तब भाजपा जैसी पार्टियाँ इस अनुच्छेद की समाप्ति को लेकर जिस प्रकार का रोना रोती हैं वह भी राष्ट्र के साथ सीधा-सीधा छल है।

आज जब हम संविधान के अनुच्छेद 370 के खण्ड 3 में वर्णित उपबन्ध् का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हमने दुर्भाग्य के हाथों राष्ट्र की इच्छा शक्ति को पराजित कर दिया है। हमारा राजनैतिक नेतृत्व नपुंसकता का प्रदर्शन कर रहा है। एक ‘अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध’ को हम समाप्त नहीं कर पा रहे हैं।

अनुच्छेद 371 और भी राष्ट्रघाती

संविधान का अनुच्देद 371 (क) हमारी दृष्टि से सामान्यतया ओझल रहता है। हम धारा 370 पर काफ ी लिखते-पढ़ते और बोलते हुए लोगों को देखते हैं किन्तु संविधान के अनुच्छेद 371 (क)  पर ऐसा नहीं देखते। सम्भवत: यही कारण है कि इस ओर राष्ट्र के जागरूक कहे जाने वाले नागरिकों का भी ध्यान नहीं जाता। अनुच्छेद 370 के विषय में हमारी जागरूकता का एक कारण यह भी हो सकता है कि यह अनुच्छेद उस प्रान्त के विषय में है जो स्वतंत्रता की प्राप्ति के समय से ही राष्ट्रवादी शक्तियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है, क्योंकि यहाँ मजहबी तुष्टिकरण के कारण राष्ट्र की उद्यम शक्ति और देशभक्ति दोनों ही दांव पर लगे रहे हैं।

संविधान का अनुच्छेद 371 (क) ईसाई बहुल प्रान्तों यथा, नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय में कई स्थानों पर ईसाई नागाओं को भूमि क्रय करने का जो अधिकार प्रदान करता है वह हिन्दुओं को प्राप्त नहीं है। मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र में ऐसी ही सुविधा ईसाई नागाओं को दी गई है। जिससे यह अनुच्छेद पूर्वोत्तर भारत ईसाई धर्म प्रचारकों का गढ़ बन गया है।

देश का जनसाधारण यहाँ जाकर अपनी आजीविका नहीं चला सकता। यहाँ ईसाई आतंकवाद बढ़ रहा है। जिसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ईसाई देशों का समर्थन मिल रहा है। ईसाई देशों की दृष्टि पूर्वोत्तर भारत में निरन्तर बढ़ रही पृथकतावादी मनोवृत्ति पर टिकी है। मदर टेरेसा जैसी तथाकथित ‘भारत-रत्न’ ने इस मनोवृत्ति को और भी उत्साह प्रदान कर दिया है। आप यदि-वहाँ इस प्रवृत्ति का विरोध करेंगे तो आपको धर्म सापेक्ष माना जाएगा और ‘विदेशी-भारतीय’ मानकर भगा दिया जाएगा या ‘ऊपर’ पहुँचा दिया जाएगा। इसके उपरान्त भी हमारी केन्द्र सरकार मूकदर्शक बनी तमाशा देख रही है। अनुच्छेद 371 (क)  का दुरूपयोग बन्द कराने अथवा इस  आपत्तिजनक अनुच्छेद को संविधान से निकलवाने का साहस नहीं किया जा रहा है। यहाँ तक कि आज भाजपा (नरेन्द्र मोदी ) की पूर्ण बहुमत वाली केन्द्र सरकार  भी इस ओर कोई सार्थक कदम उठाने का साहस नही कर पा रही है।

भारत के राष्ट्रपति को हमारा संविधान यह शक्ति प्रदान करता है कि वह जिसे चाहे पहाड़ी क्षेत्र घोषित कर सकता है। इन पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी हिन्दू प्रवेश नहीं कर सकता। यहाँ अपने लिए भूमि क्रय नहीं कर सकता। समझो कि यह क्षेत्र देश में ईसाईयों के लिए ही आरक्षित हो गया है। ऐसी स्थिति को देखकर कई हिन्दू संगठनों ने स्वयं को अहिन्दू घोषित करने का न्यायालयों से अनुरोध् किया है क्योंकि-

 ‘‘गुनहगारों पर देखी जब रहमते परवरदिगार,

बेगुनाहों ने पुकारा कि हम भी गुनाहगारों में हैं।’’

आज यह स्थिति पूर्वोत्तर में है, कल को यह इस देश के अन्य प्रान्तों में मुखरित होती दीखेगी। ‘बेगुनाह’ स्वयं कहेंगे कि हम भी गुनाहगारों में हैं। शासक वर्ग की देशविरोधी लोगों पर अर्थात् गुनाहगारों पर जब दया दृष्टि होगी तो बेगुनाहों के सामने अर्थात् राष्ट्रवादियों के सामने यही स्थिति आएगी।

इसलिए हमारी केन्द्र सरकार को तत्काल इस आपत्तिजनक अनुच्छेद 371 (क)  को समाप्त अथवा यथावश्यक संशोधित कर राष्ट्र रक्षा के प्रति गंभीर होना चाहिए। इस ओर जितनी शीघ्रता से कदम उठाया जाएगा उतना ही राष्ट्रहित में उचित होगा।

प्रस्तुति : दुर्गाशंकर वाजपेयी

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