निर्जला एकादशी व्रत की वास्तविकता

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निर्जला एकादशी व्रत की वास्तविकता को समझने से पहले हम यह जान लें निर्जला एकादशी व्रत क्या है?

आज निर्जला एकादशी व्रत है। एकादशी यद्यपि 10 जून और 11 जून दोनों दिन की है ,लेकिन व्रत आज ही 10 जून कब मनाया जा रहा है।
निर्जला एकादशी व्रत सभी एकादशियों में सबसे बड़ी एकादशी मानी जाती है। इस व्रत के दौरान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक निर्जल अर्थात बिना जल के रहना होता है।
इस दिन निर्जला व्रत रखते समय पीले वस्त्र धारण करने और भगवान विष्णु की पूजा कर व्रत का संकल्प लेने का प्रावधान है। भगवान को भी पीली वस्तुएं अर्पित करना, मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना, अन्नऔर फलों का भी त्याग करना ,गरीब और जरूरतमंदों को दान करना ,अगले दिन द्वादशी में भी स्नान करके अन्न जल ग्रहण करने तक एकादशी का व्रत माना जाता है।
भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विधि पूर्वक जल कलश के दान का विशेष महत्व माना जाता है।
इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं यह व्रत धारण करने से भीम को 10000 हाथियों का बल प्राप्त हुआ था। यह भी मान्यता है कि इस व्रत से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तथा सभी एकादशी व्रतों का पूर्ण लाभ मिलता है।
यह उपरोक्त सभी बातें जो एकादशी व्रत के विषय में कही गई हैं वेद विद्या के विपरीत हैं सत्य से कोसों दूर हैं।
आइए एकादशी के व्रत की वास्तविकता को जान लें।
अब इसके बाद हम यह पहले समझ ले कि विष्णु क्या है।
अर्थात विष्णु किसको कहते हैं।
विष्णु के पर्यायवाची बहुत है विष्णु ईश्वर को भी कहते हैं। वैदिक विचारधारा के अनुसार विष्णु आत्मा को भी कहते हैं।
इसके अतिरिक्त विष्णु सूर्य को भी कहा गया है। विष्णु राजा को भी कहते हैं।
विष्णु संसार में हमारे इन मानवीय शरीरों में व्यापक रूप से समाया हुआ है ।और विष्णु हमको प्रेरणा दे रहा है कि संसार में जय, विजय प्राप्त करो।
राजा विष्णु बन सकता है, जैसे रामचंद्र जी ने वशिष्ठ मुनि के अनुसार विष्णु बनकर के दुष्टों का संहार किया और उन पर विजय पाई ।रामचंद्र जी के उस रूप को विष्णु कहते हैं। रामचंद्र जी विष्णु के अवतार नहीं थे। क्योंकि ईश्वर कभी भी अवतार नहीं लेता। लेकिन जो राजा अपने रास्ते के प्रतिष्ठा को ऊंचा बना दे ब्राह्मण समाज को उत्तम बना दे। जो ज्ञानी और विवेकी अपनी प्रजा को बनाने के लिए हमेशा प्रयास करता रहे। ऐसा राजा विष्णु होता है।
जो पुरुष अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला हो ,संयम करने वाला हो, उस महान विजय को प्राप्त करके समाज में अग्रणी बन करके समाज को पवित्र बनाता है, और महान बनाता है , जब मानव अपनी प्रवृत्तियों पर संयम कर लेता है और ज्ञान से ही प्रवृत्तियों का शोधन कर लेता है भेजो शोधित की हुई प्रवृतियां हैं उन्हीं से जय विजय दोनों की घोषणा करता है,ऐसी आत्मा विष्णु कही जाती है। क्योंकि विष्णु बंद करके ऐसी आत्मा लोक लोकान्तरो में आवागमन करती है। ऐसी आत्मा कि संसार में प्रतिष्ठा सर्वत्र फैल जाती है। ज्ञान और विवेक जब दोनों जागृत हो जाते हैं तभी जय विजय प्राप्त होती है। ज्ञान और विवेक से ही मनुष्य उत्कृष्ट बनता है।
विवेक उस पुरुष में होता है जिसके हृदय स्थल में सहृदयता की एक महान प्रतिष्ठा विराजमान होती है ।
विष्णु के वाहन गरुड़ पर विचार करना।
जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है कि परमात्मा को भी विष्णु कहा जाता है।
महर्षि दयानंद द्वारा अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में ईश्वर के 100 नामों की व्याख्या की गई है जिसमें परमात्मा के सर्वत्र व्यापक होने के कारण उसको विष्णु कहा जाता है। अर्थात जो सब में बसा हुआ है।
गरुड़ नाम ज्ञान और विज्ञान की प्रतिभा का है। ज्ञान का आदि स्रोत परमात्मा के अतिरिक्त और कोई नहीं है। ज्ञान विज्ञान सभी स्वर में समाई हुई है। ज्ञान और विज्ञान से ही परमात्मा को जाना जा सकता है। इसलिए ज्ञान और विज्ञान दोनों का स्वरूप मिलकर गरुड़ कहा जाता है और जहां जहां गरुड़ पहुंच जाता है वहां‌ ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं।इसलिए गरुड़ अर्थात ज्ञान विज्ञान ईश्वर का वाहन है ,विष्णु का वाहन है।

अर्थ का अनर्थ करने न करें। विष्णु को केवल परमात्मा ही समझने का ध्यान रखें।
दर्शनों में वेद मंत्रों में गरुड़ की मीमांसा आती है। गरुड़ विष्णु के यहां बहुत बड़े महावैज्ञानिक को कहा जाता है। ऐसे महान वैज्ञानिक की अर्थात गरुड़ की उड़ान बहुत ऊंची होती है ऐसा महा वैज्ञानिक सभी मंडलों में विचरण करता हुआ आकाशगंगा तक पहुंच जाता है अर्थात ब्रह्मरंध्र में पहुंच जाता है।
अब अक्षय क्षीर सागर के बारे में जान ले।
जो ईश्वर अर्थात् परमात्मा विष्णु है, वह हमारा लालन पालन कर रहा है, सारे संसार को क्रियाशील बना रहा है, सारे संसार में वह विष्णु ओतप्रोत रहता है। हम ऐसे ईश्वर अर्थात विष्णु की उपासना करते हैं। किसी ईश्वर के पास अक्षय क्षीरसागर है अर्थात उसके पास ज्ञान का ऐसा सागर है जिसका कभी क्षय नहीं होता। उसका ज्ञान का सागर सदैव अक्षय रहता है। सृष्टि के निर्माण में , सृष्टि के संरचना में, और प्रलय में ईश्वर का ज्ञान का सागर अक्षय बना रहता है। क्योंकि ईश्वर जन्म और मरण के बंधन में नहीं आता। इसलिए अक्षय क्षीर सागर जहां मानव को ज्ञान होता है और बुद्धि, मेधा, ऋतंभरा और प्रज्ञा प्राप्त होती है। इसी प्रज्ञा बुद्धि के आधार पर वह संपूर्ण ब्रह्मांड की, आत्म तत्व की, लोक लोकान्तर की जानकारी कर साक्षात कर लेता है। और आपने हृदय रूपी गुफा में इसको धारण कर लेता है। जब पिंड का और ब्रह्मांड का दोनों का समन्वय कर लेता है और प्रज्ञा भी बुद्धि से परमपिता परमात्मा का दर्शन करता है तब उसका नाम अक्षय क्षीरसागर होता है।
स्पष्ट हुआ कि विष्णु आत्मा परमात्मा राजा और सूर्य को कहते हैं और जो आत्मा प्रज्ञा भी बुद्धि प्राप्त करके परमात्मा में विचरण करती है वह क्षीरसागर में विचरण करती होती है।
तो फिर विष्णु के चतुर्भुज क्या है?
राजा जो विष्णु के स्वरूप का हो जाता है, उसके एक भुज में पदम, दूसरे में गदा,तीसरे में शंख तथा चौथे चक्र होता है।
पदम कहते हैं सदाचार और शिष्टाचार को। राजा के एक हाथ में सदाचार शिष्टाचार होना चाहिए जिससे राजा का राष्ट्र पवित्र हो जाता है। सदाचार और शिष्टाचार नहीं होगा ,तो एक दूसरे का सम्मान नहीं होगा और ऐसा राष्ट्र आज नहीं तो कल नष्ट हो जाएगा। इसलिए सदाचार और शिष्टाचार की तरंगे जिस राजा के राज में होती है उस को सफल बना देती है उन्चा उठा देती है।
गदा नाम है क्षत्रियों का।
राजा के राष्ट्र में बलवान छत्रिय होने चाहिए ।उन्हें अपनी आत्मा का भी ज्ञान होना चाहिए। ब्रह्मचर्य द्वारा पुष्ट होना चाहिए अपराधियों को दंड दिया जाना चाहिए। ऐसा राज्य सदैव रामराज्य बनकर रहता है। इसलिए गदा का स्वरूप अपराधियों को दंड देने से है।
अब देखे चक्र किसको कहते हैं।
वशिष्ठ मुनि महाराज ने रामचंद्र जी को चक्र का अर्थ समझाते हुए कहा है कि जिस राजा के राष्ट्र में संस्कृति होती है उस राजा के राष्ट्र में चक्र विद्यमान होता है।
संस्कृति अमूल्य वाणी है जो मानव को सदाचार और शिष्टाचार देने वाली है। जो सभी कार्य करने में और अपनी आत्मा की उन्नति करने में परमात्मा तक पहुंचने में जो सहायक होती है वही संस्कृति है ,और यही चक्र है।
अब शन्ख किसे कहते हैं?
शन्ख कहते हैं वेद की ध्वनि को, और वेद में क्या है ?वेद में ज्ञान है परमात्मा का दिया हुआ।
अर्थात जिस राष्ट्र में यज्ञ होते हैं वेदों की ध्वनि गूंजती है, ज्ञान वर्धन कार्य के कार्य होते हैं। वहां पर शंख है।
और जिसके पास पदम, गदा, चक्र और शंख है ,वही विष्णु हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वह सुनो आत्मा की लिए यदि प्रयोग किया जाता है तो वह एक उपाधि मात्र है। ऐसे ही राजा का नाम विष्णु है। राम ने इसी प्रकार की राज्य की स्थापना की थी इसीलिए उनको विष्णु कहा जाता है। लेकिन अज्ञानी होने विष्णु का अवतार बताया जो सर्वथा अनुचित एवं वेद विरुद्ध है।

लोक में किसी सागर की कल्पना करना ,विष्णु की मूर्ति बनाकर लक्ष्मी को उसके पैर पूजन करते हुए दिखाना, शेषनाग पर लेटना यह सभी पाखंड है अज्ञानता है।
अब हम मूल विषय पर लौटते हैं कि एकादशी क्या है,?
एकादशी का अभिप्राय है ‘अन्नवता ब्रह्मे नत्यम त्याग्य ब्राह्मे अंशदानम’ आचार्य जन के द्वारा ऐसा कहा जाता है कि अन्न को त्यागना ही हमारे लिए एकादशी नहीं। अन्न को त्यागना भी वैज्ञानिक रूप में परीगणित और स्वीकृत किया गया है। हमारे जीवन का जो संबंध है, वह उस महान प्रकृतिवाद से रहता है। अर्थात अन्न से रहता है।’अन्नवाद ब्रह्म ‘अन्न में अवृत दोष होते हैं।
वास्तव में व्रत संकल्प के लिए कहते हैं। हम जानते हैं कि हमारे शरीर में पांच ज्ञानेंद्रियां हैं और 5 कर्मेंद्रिय हैं और 11 वा मन है।
संकल्प मन से होते हैं अर्थात व्रत मन में होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसमें अन्न को गृहण नहीं करना चाहिए ,लेकिन अन्न को क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए?
व्रत नाम संकल्प का है और एकादशी का अभिप्राय यह है कि हम मन वचन और कर्म से ही अपने दसों इंद्रियों को संयम में बनाएं पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियों के साथ में लगा हुआ जो मन है इसको एकादशी कहते हैं ।यही इंद्रियों का प्रतीक माना गया है मन ।बिना मन के इंद्रियों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। क्योंकि मानव के नेत्रों की जितनी भी ज्योति चलती है ,उसमें मन ही विराजमान रहते हैं ।यदि मन नेत्रों के साथ लगा हुआ है प्रत्येक इंद्रिय के साथ मन होता है। वह मन की चेतना है।एकादशी व्रत धारण करने से जीवन में महानता की ज्योति प्रकट हो जाती है । उससे ही जीवन का लक्ष्य हमारे समीप आने लगता है।
आज का समाज तो अन्न को त्यागने का व्रत स्वीकार करता है। परंतु वास्तव में सनातन और समाज में किसी प्रकार का अंतर्द्वंद नहीं होना चाहिए ।यह तो सभी के लिए एक समान होता है। जो इंद्रियों को संयम में बनाना है। संकल्प विचारधारा का शोधन करना है। सारे ऋतु विज्ञान को और इस भौतिक मानव विज्ञान को पान करना है । मानव को रुढीवाद में नहीं जाना चाहिए। केवल एक वाद में रमण करते हुए व्रत को धारण करते चले जाओ। जैसा कि बताया गया व्रत नाम संकल्प का है। व्रत नाम अच्छाइयों को लाना है। ‘दुरितानी दुराम’ जितने भी दुर्व्यवहार है उन को त्यागना है ।अन्न को त्यागना ही कोई व्रत नहीं कहलाता। केवल क्षुधापीड़ित बनना ही व्रत नहीं कहलाया जाता। क्षुधा पीड़ित होना व्रत नहीं है ।
व्रत नाम अपनी इंद्रियों को विचारशील बनाना है ।इंद्रियों पर अनुसंधान करना है। यही व्रत का अभिप्राय है ।
ऐसे में निर्जल रहना और वह भी गर्मी के मौसम में जब पानी की शरीर को सबसे अधिक आवश्यकता होती है ,तो यह केवल पाखंडिओं के द्वारा अपनी पूजा करवाने के लिए तथा पूजा से जठराग्नि शांत करने के लिए समाज में भ्रांति फैलाई गई है। क्योंकि इसमें एकादशी व्रत में उल्लेख आता है कि व्रत रखने के बाद ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
जिसका सीधा सीधा तात्पर्य है उदर पूर्ति करना और ऐसे लोगों ने यह चलाई है जो उदर पूर्ति के साधनों में लगे रहते हैं। इनको स्वयं को इसका वास्तविक अर्थ न तो मालूम है और यदि मालूम है तो ना ही वह बताना चाहेंगे।
इसलिए निर्जला एकादशी व्रत रखना वैदिक सिद्धांत के विपरीत है।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन होता भारत समाचार पत्र

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