द्रोणस्थली आर्ष कन्या गुरुकुल महाविद्यालय का रजत जयन्ती समारोह सोल्लास सम्पन्न- “भारत देश भव्य भी है और दिव्य भी हैः पं. चन्द्रशेखर शास्त्री”

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ओ३म्

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द्रोणस्थली आर्ष कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, देहरादून का तीन दिवसीय रजत जयन्ती समारोह एवं वार्षिकोत्सव बुधवार दिनांक 8-6-2022 को सोल्लास सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर तीन दिन से किये जा रहे यजुर्वेदीय यज्ञ की पूर्णाहुति की गई। यह पूर्णाहुति यज्ञ तीन यज्ञवेदियों में किया गया। यज्ञ के अवसर पर मंच पर अनेक विद्वान एवं विदुषी आचार्यायें उपस्थित थी। इन विद्वानों में आचार्या डा. सूर्याकुमारी चतुर्वेदा जी, आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी, आचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री जी, डा. सोमदेव शतांशु जी, प्रसिद्ध आर्य भजनोपदेशक श्री दिनेश पथिक जी तथा श्री विनोद जी उपस्थित थे। यज्ञ की पूर्णाहुति हो जाने पर आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी ने परमात्मा का धन्यवाद किया। इसके बाद कन्या गुरुकुल की कन्याओं ने एक गीत प्रस्तुत किया जिसकी आरम्भ की पंक्तियां थी ‘वैदिक यज्ञ रचाया है यहां वैदिक यज्ञ रचाया है।’ इस गीत के पश्चात पं. दिनेश पथिक जी का एक भजन हुआ जिसके बोल थे ‘ऐ आर्यजनों प्रणवीन बनो, दिल से कर्तव्य निभाना, संसार को आर्य बनाना, परिवार को आर्य बनाना’। गीत बहुत ही मधुर स्वरों में प्रस्तुत किया गया जिसे सभी श्रोताओं ने पसन्द किया। हमने इस भजन का एक संक्षिप्त वीडियो फेसबुक पर प्रस्तुत किया था जिसे वहां सहस्रों बन्धुओं ने देखा व पसन्द किया है। इस भजन के बाद आचार्या डा0 अन्नपूर्णा जी ने कहा कि जहां पर जाकर मनुष्य तरता है, ज्ञान को प्राप्त करता है, जहां जाकर मनुष्य भक्ति रस में डूब जाये, पाप कर्मो को करने से बच जाये, वह स्थान तीर्थ होता है। उन्होने कहा कि यदि आपको अच्छा ज्ञान मिल गया तो आपका भावी जीवन पाप कर्मों से बच जाता है। गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्य के पाप नहीं छूटते हैं। ज्ञान की गंगा में डूबने से मनुष्य पापों से बच सकते हैं। डा. अन्नपूर्णा जी ने कहा कि यज्ञ करने वाला भी दुःखों से तरता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान देने वाले आचार्य और आचार्यायें तीर्थ होते हैं। एक ही आचार्य से पढ़ने वाले उनके सभी शिष्य सतीर्थ कहलाते हैं। आचार्य भी तीर्थ होते हैं। आचार्यों से अध्ययन करके मनुष्य का जीवन बदल जाता है।

इसके बाद प्रसिद्ध भजनोपदेशक महाशय रुवेल सिंह जी ने एक भजन गाया जिसके बोल थे ‘ओ३म् राजा न्यायकारी मेरा सहारा एक तू ही।’ यह भजन भी शब्द व अर्थ की दृष्टि से बहुत ही अच्छा था और श्रोता की आत्मा को परमात्मा से जोड़ता था। इस भजन के बाद आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान पं. चन्द्रशेखर शास्त्री, दिल्ली जी का सम्बोधन हुआ। शास्त्री जी ने कहा कि आर्यसमाज में एक ही परिवार की चार पीढ़ियां भजनोपदेशक का कार्य करते हुए आर्यसमाज को अपनी सेवायें दे रही हैं, ऐसा परिवार पं. दिनेश पथिक जी का परिवार है। आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने यज्ञ में बैठकर अग्नि से बात करने की बात कही। उन्होंने कहा कि सूर्य अग्नि का भण्डार है। यजमान में भी अग्नि के समान ऊपर उठने की भावना होनी चाहिये। सभी नदियां अपने स्रोत समुद्र की ओर ही जाती हैं। आचार्य जी ने कहा कि धन से किसी की तृप्ति नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि कोई अपनी सन्तान से दुःखी है तो कोई सन्तान के लिए दुःखी है। जिस मालिक ने हमें जीवन दिया है उसकी भक्ति व उपासना के लिये हमारे पास समय नहीं है। हम उचित रीति से परमात्मा की उपासना नहीं करते हैं, इससे बड़ा मनुष्य का दुर्भाग्य और क्या होगा? आचार्य जी ने बताया कि उन्होंने उड़ीसा में जाकर एक गुरुकुल खोला और वहां एक वृहद यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में 12 गांवों के पांच हजार बन्धुओं ने भाग लिया था। आचार्य जी ने कहा कि वहां जो बच्चे तालाब के किनारे जाकर मच्छली मारते थे वह अब गुरुकुल में पढ़ते हुए गायत्री मन्त्र का पाठ करते हैं। आचार्य जी ने बताया कि अमेरिका में उनसे पूछा गया कि अमेरिका आपको कैसा लगा? उन्होंने उत्तर दिया कि अमेरिका भव्य तो है परन्तु दिव्य नहीं है। हमारा भारत देश भव्य भी है और दिव्य भी है। उन्होंने बताया कि उड़ीसा में एक माता जो घड़े बेचती थी, उसने उन्हें दस रूपये दिये और उनके पैर छुये। आचार्य जी ने कहा कि शरीर नाशवान है और धन भी शाश्वत नहीं है। मृत्यु कब हो जायेगी, इसका ठीकाना नहीं है। उन्होंने सभी धर्म प्रेमी श्रोताओं को धर्म का संग्रह करते रहने की सलाह दी।

वैदिक विद्वान आचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने कहा कि वेद का पढ़ना धर्म तथा उसे दूसरों को पढ़ाना परम धर्म है। अच्छी बातें सुनना धर्म होता है तथा उसका प्रचार करना परम धर्म होता है। सुबह उठो तो परमात्मा का मुख्य नाम ओ३म् बोल कर उठो। उन्होंने कहा कि सबको एक मिट्टी की गुल्लक रखनी चाहिये। उसमें प्रतिदिन 10 रूपये डालने चाहिये। एक वर्ष हो जाने पर उसकी समस्त धनराशि को किसी गुरुकुल को दान कर देना चाहिये। हम यदि यज्ञ करेंगे तो सकारात्मक चिन्तन आयेगा। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने कांटे में भी फूल खिलायें हैं यह एक चमत्कार है। उन्होंने कहा हे परमेश्वर दया करो सबके सारे कष्ट हरो। सभी जगह दरबार है तेरा खुला हुआ भण्डार है। खाली दामन सबके भरो, हे परमेश्वर दया करो। बैठे हैं सब आस लगा के मन अपने को शुद्ध बना के। प्यार के बादल बनकर झरो, हे परमेश्वर दया करो।। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य के पास जो दौलत है वह भगवान की बदौलत है। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन यज्ञ देवपूजा, संगतिकरण एवं दान देने से पूर्ण होता है। दूसरों को खुश रखने की प्रेरणा देकर उन्होंने कहा तुम भी ऐसा करके खुश रहोगे।

आचार्य पं. चन्द्रशेखर शास्त्री जी ने एक पुत्र का उदाहरण दिया जिसने अपने पिता के 75 वें जन्म दिवस पर पिता को एक बहुत महंगी सोने की बनी घड़ी दी थी। पुत्र वर्षों बाद विदेश से आया था। पिता ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ कर कहा कि पुत्र तूने मुझे घड़ी तो दे दी, मुझे समय देना भी सीख ले। आचार्य जी ने कहा कि सभी माता-पिताओं को अपने बच्चों के समय आवश्यकता होती है। आचार्य जी ने सभी पुत्रों व बहुओं को प्रेरणा की कि जब वह कार्यालय से घर आयें तो कम से कम पांच मिनट अपने माता-पिता से बातें करें। उन्होंने आगे कहा कि यदि मनुष्य के मन में शान्ति न हो तो उसका जीवन बेकार जीवन होता है। आचार्य जी ने कहा कि धर्म के मार्ग पर चलकर, यज्ञ व ईश्वर की उपासना करके जीवन सुखमय बनता है। इसी के साथ आचार्य जी का उपदेश समाप्त हुआ। इसके बाद शान्ति पाठ हुआ और अगला सत्र प्रातः 11.00 बजे से गुरुकुल आश्रम के सभागार में हुआ। यजुर्वेदीय यज्ञ का आयोजन गुरुकुल के मैदान में पण्डाल बना कर भव्य रूप में किया गया था। यज्ञ में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। सभागार में सम्पन्न कार्यक्रम का विवरण हम एक अलग लेख के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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