पुस्तक समीक्षा : अभी जिंदगी और है…

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अभी जिंदगी और है…. की लेखिका कुसुम अग्रवाल हैं ।जिन्होंने अपनी इस पुस्तक के आत्मकथ्य में लिखा है कि अभी जिंदगी और है ….कहानी जिसने मेरी पुस्तक के नाम होने का गौरव हासिल किया है, को समस्त कहानियों का निचोड़ या मर्म कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हमारा जीवन गतिमान है। जब तक जीवन है, तब तक आशा, विश्वास और उत्साह बना रहना चाहिए । किसी भी काम करने की या लक्ष्य को प्राप्त करने की तथा शौक को पूरा करने की कोई निर्धारित उम्र नहीं होती है। अतः हमें निसंकोच उनकी पूर्ति में जुटे रहना चाहिए। समाज आपकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को नहीं समझ पाता है ।वह तो केवल सदियों से चली आ रही परंपराओं को निर्बाध रूप से स्वीकृत कर उनका निर्वहन चाहता है। अब यह हम और आप पर निर्भर करता है कि हम उनमें कैसा परिवर्तन चाहते हैं ? तभी तो नए समाज का निर्माण होगा।
विदुषी लेखिका ने वास्तव में अपनी पंक्तियों में लेखक के धर्म को उद्घाटित किया है। प्रतिभा को निखार देने के लिए हमें हमेशा सक्रिय और सचेष्ट रहना चाहिए। उम्र के किसी भी पड़ाव पर रुक जाना उचित नहीं है। अंतिम सांस तक संघर्ष करते रहने की ऊर्जा अपने भीतर अनुभव करते रहना चाहिए । प्रत्येक मनुष्य का यही जीवन लक्ष्य होना चाहिए कि उसे जीवन के पल पल का आनंद लेना है और पल पल का सदुपयोग भी करना है।
परंपराओं को हमें अपने ऊपर बोझ नहीं बनाना चाहिए। रूढ़ियां हमें जकड़ न लें, इस बात का ध्यान रखना चाहिए। रूढ़ियों को तोड़कर परंपराओं के बीच रहकर हमें नित्य नूतन सनातन का स्वागत करते रहना चाहिए।
पुस्तक के प्रारंभ में आई इन पंक्तियों से भी यह संकेत स्पष्ट मिल जाता है कि पुस्तक कुछ खास संदेश देने वाली है :-

मायूस न हो जिंदगी कुछ खास बाकी है।
सुनहरा होगा कल अभी आस बाकी है।।

लेखिका ने अपनी कुल 22 कहानियों को अपनी इस पुस्तक में स्थान दिया है । अभी जिंदगी और है …उनकी एक खास कहानी है। उनकी यह कहानी सचमुच इस पुस्तक का निचोड़ बन गई है।
अपनी कहानी ‘मुखोटे उतर गए’ में वह मां बेटे के बीच के संबंधों पर प्रकाश डालती हैं। जिसमें मां शांति देवी बेटे से कहती है कि बेटा ! यह झूठे प्रेम के मुखौटों को एक न एक दिन तो उतरना ही था। मेरे सामने और दुनिया के सामने भी। साइड टेबल पर पड़े हुए कागजों से मुझे सब पता चल गया कि आजकल तुम मेरी इतनी सेवा सुश्रुषा किस लालच में कर रहे हो ? यदि ऐसा ना होता तो तुम अपने पिता के मरने के 6 महीने बाद ही जमीन जायदाद के कागजात मुझसे दस्तखत कराने की कोशिश ना करते। बेटा, मां का हृदय सब पहचान लेता है, सच्चे प्रेम और दिखावटी प्रेम का फर्क मालूम है उसे।
….शांति देवी की बात सुनकर राज के पैरों तले की जमीन सरक गई। आखिर सच सामने आ ही गया था। वह यह सोच कर शर्मिंदा था कि जमीन जायदाद तो उन्हें मिल जाएगी परंतु मां का विश्वास और प्रेम वे हार गए थे।”
कहानी के इस एक संवाद से लेखिका की भाषा शैली और संदेश देने का उनका अपना तरीका पता चल जाता है। वह सहज, सरल संवाद में बड़ा संदेश देने में कुशल हैं। पाठक रुक कर उनके साथ चलते चलते उन्हें पढ़ना और समझना चाहता है। जिससे उनकी लेखन शैली की विशिष्टता का बोध होता है।
इसी प्रकार उनकी प्रत्येक कहानी एक गहरा संवाद पाठक और पाठक के दिल के बीच स्थापित कर देती है।
कुल144 पृष्ठों में समाहित इन कहानियों की इस पुस्तक का मूल्य ₹250 है। पुस्तक के प्रकाशक साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर 302003, फोन 0141 –2310785, 4022382 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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