सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानंद ने भी किया है ज्ञानवापी में स्थित शिवलिंग का उल्लेख

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आज ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर जिस प्रकार लोगों को अनेक प्रकार के साक्ष्य एकत्र करने पड़ रहे हैं, उनके दृष्टिगत महर्षि दयानंद के ‘ सत्यार्थ प्रकाश’ की साक्षी भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि शिवलिंग के रूप में डाले जाने का उल्लेख महर्षि दयानंद ने भी ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में किया है । यद्यपि उसका प्रसंग थोड़ा दूसरा है ,परंतु शिवलिंग को उस समय कूप में डाल दिया गया था यह बात तो ऋषि दयानंद जी को भी ज्ञात थी और उन्होंने उसे यथावत अपने अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्पष्ट किया है। उस प्रसंग को हम यहां यथावत प्रस्तुत कर रहे हैं :–

प्रश्न) जैसे स्त्री की पाषाणादि मूर्ति देखने से कामोत्पत्ति होती है वैसी वीतराग शान्त की मूर्त्ति देखने से वैराग्य और शान्ति की प्राप्ति क्यों न होगी?

(उत्तर) नहीं हो सकती। क्योंकि उस मूर्त्ति के जड़त्व धर्म आत्मा में आने से विचारशक्ति घट जाती है। विवेक के विना न वैराग्य और वैराग्य के विना विज्ञान, विज्ञान के विना शान्ति नहीं होती। और जो कुछ होता है सो उनके संग, उपदेश और उनके इतिहासादि के देखने से होता है क्योंकि जिस का गुण वा दोष न जानके उस की मूर्त्तिमात्र देखने से प्रीति नहीं होती। प्रीति होने का कारण गुणज्ञान है। ऐसे मूर्त्तिपूजा आदि बुरे कारणों ही से आर्य्यावर्त्त में निकम्मे पुजारी भिक्षुक आलसी पुरुषार्थ रहित क्रोड़ों मनुष्य हुए हैं। सब संसार में मूढ़ता उन्हीं ने फैलाई है। झूठ छल भी बहुत सा फैला है।

(प्रश्न) देखो! काशी में ‘औरंगजेब’ बादशाह को ‘लाटभैरव’ आदि ने बड़े-बड़े चमत्कार दिखलाये थे। जब मुसलमान उन को तोड़ने गये और उन्होंने जब उन पर तोप गोला आदि मारे तब बड़े-बड़े भमरे निकल कर सब फौज को व्याकुल कर भगा दिया।

(उत्तर) यह पाषाण का चमत्कार नहीं किन्तु वहां भमरे के छत्ते लग रहे होंगे। उन का स्वभाव ही क्रूर है। जब कोई उन को छेड़े तो वे काटने को दौड़ते हैं। और जो दूध की धारा का चमत्कार होता था वह पुजारी जी की लीला थी।

(प्रश्न) देखो! महादेव म्लेच्छ को दर्शन न देने के लिये कूप में और वेणीमाधव एक ब्राह्मण के घर में जा छिपे। क्या यह भी चमत्कार नहीं है?

(उत्तर) भला जिस के कोटपाल, कालभैरव, लाटभैरव आदि भूत प्रेत और गरुड़ आदि गणों ने मुसलमानों को लड़के क्यों न हटाये? जब महादेव और विष्णु की पुराणों में कथा है कि अनेक त्रिपुरासुर आदि बड़े भयंकर दुष्टों को भस्म कर दिया तो मुसलमानों को भस्म क्यों न किया? इस से यह सिद्ध होता है कि वे बिचारे पाषाण क्या लड़ते लड़ाते? जब मुसलमान मन्दिर और मूर्त्तियों को तोड़ते-फोड़ते हुए काशी के पास आए तब पूजारियों ने उस पाषाण के लिंग को कूप में डाल और वेणीमाधव को ब्राह्मण के घर में छिपा दिया। जब काशी में कालभैरव के डर के मारे यमदूत नहीं जाते और प्रलय समय में भी काशी का नाश होने नहीं देते तो म्लेच्छों के दूत क्यों न डराये? और अपने राज के मन्दिरों का क्यों नाश होने दिया? यह सब पोपमाया है।

इस उदाहरण से स्पष्ट है कि हिंदू समाज में प्रचलित आम धारणा के आधार पर महर्षि दयानंद ने अपने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में इस घटना को यथावत स्थान दिया । यदि महर्षि दयानंद जैसे महापुरुष ने इस घटना का उल्लेख किया है तो निश्चय ही यह घटना उस समय तक लोगों के चित्त में बनी बैठी रही होगी। इसके अतिरिक्त महर्षि दयानंद ने इस पर पर्याप्त अध्ययन करने के उपरांत ही इसे इस प्रकार उल्लेखित किया होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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