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कई मायनें में ऐतिहासिक रहा बजट सत्र

budgetमृत्युंजय दीक्षित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए बीता हुआ बजट सत्र कई मायने में ऐतिहासिक व उपलब्धियों वाला रहा है। यदि क्रिकेट की भाषा में इस सत्र को परखा जाये तो यह साफ पता चल रहा है कि इस बार पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही ओर से सधी हुई गंेंदबाजी और कभी- कभी आक्रामक व सधी हुई बल्लेबाजी का खेल चलता रहा । संसद का बजट अधिवेषन दो सत्रों में होता है। लोकसभा में मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त है तथा वहां पर सदस्य संख्या के बल पर सरकार हर प्रकार के बिल आसानी से पारित करवा कर सकती है। लेकिन सरकार के लिएसबसे बड़ी मुसीबत राज्यसभा बन गयी है जहां पर विपक्ष बहुमत में हैं और विपक्ष इसी का लाभ उठाकर लोकसभा में पूर्ण बहुमत को दबाव मंे लाने व सरकार को पटरी में लाने का खेल खेल रहा है। राज्यसभा में बहुमत के कारण विपक्ष ने जिस प्रकार से सरकार को घेरने का खाका तैयार किया वह निष्चय ही विकास विरोधी व सरकारी कामकाज में जानबूझकर रोड़ा अटकाने वाला रहा है। विपक्ष की भूमिका विकास के खलनायक की बन रही है।

मोदी सरकार बनने के बाद जो पहला सत्र हुआ था वह तो केवल पिछली सरकार के रूके हुए काम व षेष अवधि के लिए बजट आवंटन करवाने के लिए ही हुआ था। मोदी सरकार के असी कामकाज की समीक्षा तो अब की जायेगी साथ ही विपक्ष की भी। संसद के वर्तमान बजट सत्र में मोदी सरकार का पहला वास्तविक पूर्ण आम बजट व रेल बजट पेष किया गया। इस बजट सत्र में पहली बार मोदी सरकार का वास्तविक राष्ट्रपति का अभिभाषण भी संपन्न हुआ। सरकार की ओर से पेष किये गये रेल बजट की सबसे बड़ी विषेषता यह रही की कि रेल मंत्री सुरेष प्रभु ने पहली बार किसी नयी रेल परियोजना की घोषणा नहीं की उनका पहला लक्ष्य यही है कि किसी प्रकार से विगत तीस वर्षों से कागजों में लम्बित पड़ी व धनाभाव के चलते लम्बित पड़ी योजनायों पूर्ण हो सकें। रेल बजट का स्वागत किया गया। वित्तमंत्री अरूण जेतली का आम बजट भी कुछ नये तरीके से पेष किया गया हालांकि उसके कुछ प्रावधान पुरानी सरकार के ही थे। मोदी सरकार के पहले पूर्ण बजटों से यह साफ संकेत गया कि मोदी सरकार पिछली सरकारों की ओर से चलायी जा रही किसी भी योजना को फिलहाल बंद नहीं करेगी अपितु वह सभी योजनाओं को और अधिक कारगर ढंग से लागू करने जा रही है। लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सरकार को राज्यसभा में उस समय तगड़ा झटका लगा था जब राज्यसभा में विरोधी दल मोदी सरकार के खिलाफ कालाधन वापस लाने की नाकामी के प्रस्ताव को पास कराने में सफल हो गये । यह देष के संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में विपक्ष का कोई प्रस्ताव पास हो गया हो। लेकिन यह सब कुछ सरकार की संसदीय उदारता का ही परिणाम भी माना जाना चाहिए।

सरकार के लिए बजट सत्र का पहला भाग इस मायने में भी ऐतिहासिक रहा कि इसमें सरकार तीन प्रमुख अधिसूचनाओं को पारित करवाने में कामयाब रही। जिसमें बीमा विधेयक , कोयला विधेयक और खान व खनिज नियमन से जुड़ा विधेयक षामिल है। दोनों सदनों में रिकार्ड 24 विधेयक पारित कराने में व विगत पांच -छह वर्षो में सबसे अधिक काम का रिकार्ड भी बन गया। लोकसभा अध्यक्ष सुिमत्रा महाजन के काम करने व करववाने का तरीका सभी को रास आ रहा है। यही कारण है कि आज प्रष्नकाल व षून्यकाल दोनांे ही नियमानुसार चल रहे हैं तथा प्रष्नकाल में प्रष्नों की संख्या मंे भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। अब जो विपक्षी संासद यह आरोप लगाते हैं कि उन्हें बोलने के लिए समय ही नहीं दिया जा रहा वह केवल और केवल राजनैतिक विद्वेष की भावना से ही लगाया जा रहा है। इस सत्र में यदि विपक्ष पर नजर डाली जाये तो लोकसभा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पहले सत्र में राजनैतिक चिंतन करने के नाम पर अवकाष पर चले गये थे। जिसकी राजनैतिक गलियारे में खूच चर्चा रही तथा राहुल गांधी मजाक के पात्र बन गये थे। पहले सत्र में राहुल गांधी की अनुपस्थिति के कारण कांग्रेस पार्टी गहरे दबाव में थी। सत्तापक्ष विपक्ष पर कटाक्ष कर रहा था।
लेकिन संसद का दूसरा चरण प्रारम्भ होते ही कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी 59 दिनों के राजनैतिक वनवास के बाद तरोताजा होकर वापस आ गये। कांग्रेस व विपक्ष में नया उत्साह आ गया। श्रीमती सोनिया गांधी व युवराज राहुल गांधी के नेत्ृत्व में मोदी सरकार को नये सिरे से घेरने की रणनीति तैयार होने लग गयी। जिसमें राज्यसभा में सरकार के बहुमत में न होने को भी हथियार बनाया गया। सरकार को घेरने के लिए मां – बेटे की जुगलबंदी कुछ सीमा तक मीडियाई आकर्षण चुराने में सफल रही। राहुल गांधी षून्यकाल मंें रोज कुछ न कुछ नया बोलने लग गये। कभी किसान,कभी युवा तो कभी सूचना का अधिकार के दुरूपयोग व फिर अमेठी में फूड पार्क परियोजना को रदद करने का झूठा आरोप ही सरकार पर मढ़ डाला। अमेठी में फूड पार्क को लेकर राहुल गांधी के बयान पर वे स्वयं ही फंसते चले गये व उनका साफ झूठ उजागर हो गया। देष के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी नेता के बयान केे बाद सरकार की आरे से पांच मंत्रियों ने बयान दिये हों। राहुल गांधी में एक जिम्मेदार व परिपक्व नेता का घोर अभाव स्पष्ट नजर आया। वह संसद में झूठ का पुलिंदा ही बोल रहे थे। उनकी हरबात की काट सरकार के पास मौजूद थी। सरकार यदि दबाव मेें आरही थी तो वह केवल राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण। बस इसी कारण राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष उछल रहा था। राहुल के बयान पूरी तरह से उदंड मानसिकता के प्रतीक थे। उनमें गहराई नहीं थी । पता नहीं वे कब से किसान बन गये हैं। अभी तक वे क्या कर रहे थे। जब दस साल नहीं अपितु 65 वर्षो तक उनके परिवार को समर्पित सरकारें रही तब किसानों का भला क्यों नही हा सका। कांग्रेस अभी तक देष के अच्छे दिन क्यों नहीं ला सकी थी। कांग्रेस व गांधी परिवार के लोग केवल मोदी सरकार की छवि को झूइे आरोपों के सहारे बदनाम करने की साजिष रच रहे हैं।

वहीं सरकार की नजर में यह सत्र भी चुनौतियों के साथ सफलतादायक भी रहा। हालांकि कुछ गलतियों व उदारता के कारण कुछ विधेयक प्रवर समिति को भेतने ही पड़ गये। हालांकि फिर भी सरकार दूसरे सत्र में वित्त विधेयक,कंपनी संषोधन विधेयक ,विदेषों में छिपाए गये कालेधन पर रोक लगाने सम्बंधी विधेयक को मुजूर करवाने में सफल रही। सरकार के लिए सबसे अहम सफलता भारत बांग्लादेष के साथ भूमि समझौते संषोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग गयी। यह वह विधेयक है जिसका कभी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित भाजपा व संघ परिवार कड़ा प्रतिवाद करता था। लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद यह कानून बन चुका है। इससे बांग्लादेष और भारत दोनों को ही लाभ होगा। सदन में भ्रष्टाचर के खिलाफ कई संषोधन पारित हुए तथा कर्द पर चर्चा भी प्रारम्भ हो गयी हैं यह कि अब अगले सत्र में पारित हो जाने की पूर्ण संभावना हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बिल जीएसटी व भूमि अधिग्रहण बिल को सरकार को मजबूरी में संसद की स्थायी समितियोें को वापस भेजना पड़ गया। संसद सत्र के दौरान नेपाल व उत्तर भारत कम से कम दो बार भूकम्प के झटकों से दहला लेकिन इतनी व्यवस्ता के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तत्परता व तेजी के साथ भूकम्प पीडि़तों की सहायता के लिए कदम उठाये उसकी जितनी भी प्रषंसा की जाये वह कम है।
संसद सत्र की समाप्ति के बाद वित्तमंत्री अरूण जेटली का एक साक्षात्कार मंेे यह कथन उचित ही है कि, ”राज्यसभा की अड़चनें संसदीय व्यवस्था के लिए एक जबर्दस्त चुनौती है। राज्यसभा में वे सदस्य चुने जाते हैं जो परोक्ष वोटों से चुने जाते हैं वहां सीधे वोट से चुने गये प्रतिनिधियों यानी लोकसभा के फैसलों पर प्रष्न उठा रहे हैं।ऐसा एक दो बार राजनैतिक वजहों से हो तो बात समझ में आती है लेकिन यह तो हर विधेयक पर ही ऐसा हो रहा है।“
अगर राजनैतिक कारणों से राज्यसभा में आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो फिर राज्यसभा अपनी गरिमा और मर्यादा खो भी सकती है तथा उसको देषहित में विभिन्न देषों का हवाला देकर समाप्त भी किया जा सकता है। भारत में तो राज्यसभा को विपक्ष ने अपनी राजनीति चमकाने का हथियान बना लिया है जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

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