वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून का ग्रीष्मोत्सव आरम्भ- “सात्विक मन मनुष्य को ऊंचाईयों की ओर ले जाता है और परमात्मा से भी मिलाता हैः उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ”

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ओ३म्
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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का पांच दिवसीय ग्रीष्मोत्सव आज दिनांक 11-5-2022 को सोल्लास आरम्भ हुआ। उत्सव में देश के अनेक भागों से अनेक साधक एवं ऋषिभक्त पधारे हुए हैं। आज प्रातः योग प्रशिक्षण के अन्तर्गत आसन, प्राणायाम एवं ध्यान का प्रशिक्षण दिया गया। प्रातः 6.30 बजे से 8.30 बजे तक सन्ध्या एवं वेदपारायण वृहद यज्ञ का आयोजन किया गया। प्रवचन वेदी पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी सहित साध्वी प्रज्ञा जी, वैदिक विद्वान श्री उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी, पं. सूरतराम शर्मा जी, भजनोपदेशक श्री रुवेल सिंह आर्य, श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी आदि विद्वान उपस्थित थे। कुल चार वृहद यज्ञवेदियों में यज्ञ किया गया। वेद पाठ गुरुकुल पौंधा देहरादून के दो ब्रह्मचारियों ने मधुर स्वरों से किया। सूक्त की समाप्ति पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी वेद मन्त्रों के अर्थों पर प्रकाश डाल रहे थे। इसीप्रकार एक सूक्त की समाप्ति पर स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा प्रत्येक क्षण हमारे साथ है। परमात्मा कभी किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। जो जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। सत्याचरण करना ही मनुष्य का धर्म है। न्याय का आचरण करना भी मनुष्य के धर्म के अन्तर्गत आता है। वृहद यज्ञ में मण्डप में विद्यमान सभी यज्ञप्रेमियों को यज्ञाग्नि में आहुतियां देने का अवसर प्रदान किया गया। गायत्री मन्त्र से भी यज्ञ में आहुतियां दी गईं। यज्ञ सम्पन्न होने पर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने सभी यजमानों को जल छिड़क कर आशीर्वाद दिया। सामूहिक प्रार्थना करते हुए स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने ईश्वर से कहा कि हमें यज्ञ करने का अवसर दिये जाने तथा यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होने के लिए हम ईश्वर का धन्यवाद करते हैं।

हम अपना यह यज्ञ परमात्मा को समर्पित करते हैं। परमात्मा उदार हैं। परमात्मा हमें भी उदार बनायें। परमात्मा ने इस सृष्टि को हमारे सुख व उन्नति के लिए बनाया है। सभी रत्न आदि उत्तम पदार्थ भी परमात्मा ने सृष्टि में बनायें हैं। परमात्मा की हम सब पर अत्यन्त कृपा है कि उसने हमें ऋषियों के इस महान देश में जन्म दिया है। परमात्मा ने कृपापूर्वक हमें वेदों का ज्ञान दिया है। इतिहास में हमारी दुर्दशा का चित्रण भी स्वामी जी ने अपनी प्रार्थना में किया। स्वामी जी ने ऋषि दयानन्द जी के वेद प्रचार तथा समाज सुधार आदि कार्यों सहित उनके योगदान की चर्चा भी ईश्वर की प्रार्थना करते हुए की। स्वामी जी ने प्रार्थना की कि देश में ऋषि दयानन्द के सामन विद्वान व योगी जन्म लें। परमात्मा हम सबके पिता हैं। हम सब मनुष्य प्रेम से मिलकर रहें। सब के घरों में सुख व शान्ति का वास हो। सबके पास प्रचुर मात्रा में धन तथा सम्पत्ति हो। परमात्मा हम सबके सभी दुःखों व दरिद्रता को दूर करें। स्वामी जी ने अपनी प्रार्थना में ईश्वर से जन जन के कल्याण की प्रार्थना की। स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा संसार के कण-कण में विद्यमान हैं। वह सदा हमारे साथ रहते हैं। वह हम से कभी दूर नहीं होते। परमात्मा सबका मंगल एवं कल्याण करें, इन शब्दों के साथ स्वामी जी ने सामूहिक प्रार्थना को विराम दिया। इसके बाद भजनोपदेशक श्री रूवेल सिंह आर्य जी ने यज्ञ प्रार्थना कराई।

यज्ञ की सामाप्ति एवं सामूहिक प्रार्थना के पश्चात आर्य भजनोपदेशक श्री रूवेल सिंह आर्य जी का एक स्वरचित भजन हुआ। भजन के बोल थे ‘मेरे प्यारे प्रभु मुझको अपना बना लीजिये, युग-युग से भटकता हूं, अब तो अपना लीजिये।।’ श्री रूवेल सिंह जी ने कहा कि हम सबको परमात्मा को अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये। संसार की अन्य सभी वस्तुयें परमात्मा की बनाई हुई हैं। उनके समर्पण की तुलना में अपनी आत्मा का समर्पण उत्तम कार्य है। कार्यक्रम का संचालन आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने बहुत उत्तमता से किया। उन्होंने कहा कि यदि हम परमात्मा के पास जाना चाहते हैं तो हमें अपनी सभी बुराईयों को छोड़ देना चाहिये। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चे परमात्मा के सबसे निकट होते हैं क्योंकि उनमें कोई बुराई नहीं होती। श्री रूवेल सिंह आर्य जी के भजन के बाद आगरा से पधारे प्रसिद्ध आर्य विद्वान श्री उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का व्याख्यान हुआ।

आचार्य उमेशचन्द्र जी ने अपने सम्बोधन में यज्ञ में दी जाने वाली प्रजापत्याहुति की चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस आहुति को मौन होकर दिया जाता है। इससे जुड़ा एक आख्यान उन्होंने श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक बार वाणी और मन में बहस हुई। दोनों ने कहा कि हम एक दूसरे से बड़े हैं। वाणी ने अपने गुणों का वर्णन किया तथा मन ने भी अपने गुणों का वर्णन किया। दोनों ने अपने को बड़ा कहा। मन ने कहा कि मन जिस इन्द्रिय के साथ लगता है वह इन्द्रिय काम करती है। मनुष्य यदि एकाग्र व शान्त नहीं है तो उसे अपने सम्मुख दृश्य का भी ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता। मन व वाणी दोनों विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति के पास गये। दोनों ने अपनी बड़ाई के तर्क प्रजापति के सम्मुख रखें। मन ने एक तर्क में कहा कि शब्द आकाश का गुण है। आत्मा आकाश से और परमात्मा आत्मा से भी सूक्ष्म है। मन जीवात्मा को मन के एकाग्र होने पर परमात्मा का साक्षात्कार कराता है। एकाग्र मन ही मनुष्य को ईश्वर के ध्यान की अवस्था में पहुंचाता है। प्रजापति मन के तर्क से सहमत हो गये। वाणी परमात्मा का साक्षात्कार नहीं करा सकती। इस कारण वाणी नाराज होकर प्रजापति आहुति के समय मौन रहती है।

आचार्य उमेश चन्द्र जी ने व्याख्या कर बताया कि मन क्या है? उन्होंने कहा कि यह प्रकृति से बना हुआ जड़ पदार्थ है। मन अति क्रियाशील है। मन हमें चेतन लगता है परन्तु यह जड़ है। आत्मा की सत्ता से ही मन क्रियाशीला होता व रहता है। मन प्रकृति से बना हुआ है। प्रकृति में तीन गुण सत्व, रज व तम होते हैं। इन तीन गुणों का प्रभाव भी मन पर होता है। मन कभी सत प्रधान होता है, कभी रज प्रधान और कभी तम प्रधान। आचार्य जी ने मन के इन तीन गुणों से जुड़े होने पर मन के कार्यों के उदाहरण भी प्रस्तुत किये। एक उदाहरण में उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति सत्संग में जाता है। वहां वह रजगुण के प्रभाव से अपनी पुरानी चप्पल छोड़ किसी की नयी चप्पल ले आता है। घर आकर उसके मन में सत्व गुण का प्रभाव उत्पन्न होता है तो वह उस चप्पल को उसी स्थान पर जाकर छोड़ आता है और अपनी पुरानी चप्पल ले आता है। आचार्य जी ने कहा कि मन को सात्विक गुण से युक्त रखना बहुत आवश्यक है। सात्विक मन मनुष्य को ऊंचाईयों की ओर ले जाता है और परमात्मा से भी मिलाता है। सात्विक मन के लिये मनुष्य को धन धर्मपूर्वक कमाना तथा व्यय करना चाहिये। इससे मन सात्विक बनता है। सात्विक मन में उत्तम संस्कार होते हैं। सात्विक मन से मनुष्य परमात्मा से मिल पाता है। आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि कि हमें शुद्ध अन्न का ही प्रयोग व सेवन करना चाहिये। हमारा भोजन सात्विक एवं पवित्र होना चाहियें। यदि हमारा भोजन पवित्र होगा तो हमारा मन भी सात्विक वा पवित्र होगा। आचार्य जी ने प्राणायाम से मन को होने वाले लाभों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे मनुष्य के भीतर प्राणशक्ति आत्मा के सहारे से टिकी हुई है। सब मनुष्यों को प्राणायाम की साधना करनी चाहिये। इससे मन नियंत्रित होता है। आचार्य जी के उपदेश के बाद शान्ति पाठ हुआ।

यज्ञ, भजन एवं उपदेश के पश्चात ध्वजारोहरण का कार्यक्रम सम्पन्न किया गया। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती सहित अनेक विद्वानों ने ध्वजारोहण का कार्य सम्पन्न किया। इसके बाद राष्ट्रीय प्रार्थना का वाचन हुआ तथा वेदमन्त्र के हिन्दी अर्थों पर आधारित गीत ‘ब्रह्मन्! स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म-तेजधारी’ का सामूहिक पाठ किया गया। इसके बाद ओ३म् ध्वज गीत का भी सामूहिक पाठ किया गया। इस अवसर पर वैदिक विद्वान श्री उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि ओ३म् ध्वज से विश्व में सन्देश जाता है कि विश्व में ईश्वर का साम्राज्य स्थापित होना चाहिये। इससे विश्व में सभी प्राणी सुखी रहेंगे। ऋषि दयानन्द प्राणी मात्र के कल्याण का चिन्तन करते थे। संसार के झगड़ों का कारण यह है कि हम समग्र रूप से ईश्वर को जगतपिता और स्वयं को एक दूसरे प्राणी का भाई बहिन स्वीकार नहीं करते। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने अपने सम्बोधन में ईश्वर के गुणों का विस्तार से वर्णन किया और कहा कि वह ईश्वर ही सबका ध्येय एवं उपासनीय है। वह ईश्वर सबको दुःखों से छुड़ाकर परम आनन्द का देनेवाला है। आश्रम के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी ने कहा कि सबको अपने घरों पर ओ३म् ध्वज अवश्य लगाना व फहराना चाहिये। उन्होंने कहा कि ओ३म् ध्वज आश्रम के पुस्तक विक्रय केन्द्र से प्राप्त किये जा सकते हैं। इसी के साथ प्रातःकालीन सत्र का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसके बाद दिन का सत्र एवं सायंकालीन सत्र भी हुए। सायं के सत्र में वृहद यज्ञ के अनुष्ठान सहित भजन एवं उपदेश का आयोजन सम्पन्न हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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