जात-पात की यह व्यवस्था हमारे समाज के लिए एक बड़ा नासूर बन चुकी है।

निर्मल रानी

हमारे देश की सामाजिक न्याय व्यवस्था भी क्या अजीबो-गरीब है कि यहां गंदगी फैलाने वालों को तो उच्च जाति का समझा जाता है जबकि उनके द्वारा फैलाई जाने वाली गंदगी को साफ करने वाले को नीच अथवा दलित जाति का समझा जाता है। धर्मशास्त्रों में सदियों से दुष्प्रचारित की गई इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था का आज तक अंत नहीं हो सका है। और यदि हमारे समाज में तथाकथित उच्च जाति से संबंध रखने वाले कुछ उदारवादी लोग ऊंच-नीच की इस जाति आधारित परंपरा को समाप्त करना भी चाहते हैं तो भी कुछ रूढ़ीवादी शक्तियां ऐसी हैं जो जात-पात व ऊंच-नीच की गहरी हो चुकी इस खाई को पाटने नहीं देतीं। दलित उत्पीडऩ के तमाम प्राचीन किस्से व घटनाएं ऐसी हैं जिन्हें सुनकर किसी भी न्यायप्रिय व्यक्ति के होश उड़ जाएं। यहां उन्हें दोहराने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। इसमें भी कोई शक नहीं कि पिछली शताब्दी के दौरान हमारे देश में इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध काफी जागरूकता भी आई है। काफी हद तक तथाकथित ऊंच-नीच के भेदभाव समाप्त भी हुए हैं। दलित समाज को उसका खोया हुआ मान-स मान वापस दिलाए जाने के प्रयास भी किए गए। आरक्षण जैसी व्यवसथा लागू कर इस समाज को आर्थिक व शैक्षिक रूप से ऊपर उठाने की सफल कोशिश भी की गई। परंतु इन सबके बावजूद अभी भी देश के किसी न किसी कोने से कोई न कोई ऐसे समाचार प्राय: आते रहते हैं जिन्हें सुनकर फिर यह एहसास जाग उठता है कि हो न हो आज भी हमारे समाज में दलित समुदाय उत्पीड़न व उपेक्षा का शिकार है। खासतौर पर ऐसी बातें जब देश के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के हवाले से आती हों तो यह सुनकर और अधिक दु:ख होता है।

dalit chennaiहमारे देश में दलित समाज का मंदिरों में प्रवेश करना वर्जित था। आज भी देश में ऐसे समाचार सुनाई देते हैं कि अमुक मंदिर में बाकायदा बोर्ड लगाया गया है कि यहां दलितों का प्रवेश वर्जित है। कई जगहों से दलितों को शारीरिक रूप से मंदिर में प्रवेश करने से रोकने व उन्हें अपमानित कर मंदिर से भगा दिए जाने के समाचार प्राप्त होते रहते हैं। इस उपेक्षापूर्ण सौतेली सामाजिक व्यवस्था ने ही दलित समाज को जात-पात के आधार पर संगठित होने का अवसर दिया जिसका पूरा लाभ काशीराम व मायावती जैसे नेताओं ने उठाया। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंकड़ों की बाजीगरी के चलते मायावती कई बार सत्ता में तो ज़रूर आ गईं। उनका अपना आर्थिक व राजनैतिक उत्थान भी बखूबी हुआ। परंतु इसके बावजूद दलित उत्पीडऩ या दलितों के प्रति अन्याय के विरुद्ध जिस बिगुल को फूंकती हुई वह दलितों की मसीहा के रूप में उभरी थीं उस दलित समाज को फिर भी पूरी तरह न्याय न मिल सका। हां मायावती अपने जनाधार को बढ़ाने की फिराक में दलितों के रास्तों से होते हुए कथित उच्च जाति की ओर पुन: आकर्षित होती हुई ज़रूर दिखाई दीं। यानी उन्होंने ने भी दलितों के उत्थान के प्रति गंभीरता दिखाने के बजाए उन्हें मात्र वोट बैंक समझकर तथा उनकी भावनाओं का इस्तेमाल कर अपना राजनैतिक हित अवश्य साधा। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कथित उच्च जाति के आम लोगों द्वारा तो दलित समुदाय का उतना मुखरित विरोध नहीं किया जाता जितना कि धर्म के चंद जि़ मेदार लोगों द्वारा समय-समय पर अपने विवादित बयानों से इन्हें बार-बार जीवित करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने यह कहकर एक बार फिर विवाद उत्पन्न कर दिया कि मंदिरों में दलितों का प्रवेश निषेध होना उचित है। पहले भी ऐसे कई धर्माधिकारियों द्वारा इस प्रकार के बयान दिए जा चुके हें। ज़ाहिर है शंकराचार्य द्वारा ऐसे बयान जारी करने से उनके अपने अनुयाईयों व समर्थकों पर इसका प्रभाव पड़ता है। साथ-साथ जिस दलित समाज के लिए वह मंदिरों में प्रवेश निषेध की बात करते हैं वह समाज स्वयं को उपेक्षित तथा हीन समझने लग जाता है।

बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस हिंदू समाज में भगवान श्रीराम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को आदर्श महापुरुष व भगवान माना जाता हो उस धर्म में दलितों के प्रति इस प्रकार की अपमानजनक सोच रखने का आिखर औचित्य ही क्या है? बेशक हिंदू समाज शताब्दियों पूर्व कभी वर्र्णव्यवस्था पर आधारित समाज रहा होगा परंतु आज के प्रगतिशील व आधुनिक युग में क्या ऐसा संभव है कि हम धर्म व जाति के आधार पर ऊंच-नीच का निर्धारण कर सकें? जब जगजीवन राम,के आर नारायण जैसे अनेक लोग सत्ता के शिखर पर बैठ चुके हों और देश ने उन्हें उनकी योग्यता के कारण पूरा मान-स मान दिया हो,यहां तक कि भारतीय संविधान आज भी बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जैसी महान शख्सियत का कर्जदार हो ऐसे देश में उसी समाज से संबंध रखने वालों के लिए यह सोचना कि इस जाति का व्यक्ति मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता तथा कथित उच्च जाति के लोगों के साथ बराबर से चारपाई अथवा कुर्सी पर नहीं बैठ सकता या इस जाति का दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर अपनी बारात नहीं ले जा सकता यह आ$िखर कहां का धर्म है और कहां का न्याय? हिंदू धर्म के ठेकेदार प्राय:मु$गलों या दूसरे मुसलमान शासकों पर विभिन्न प्रकार के इल्ज़ाम लगाते हैं और इनके द्वारा किए गए अत्याचार की कथाएं सुनाकर हिंदू धर्म को एकजुट करने का प्रयास करते रहते हैं। मुसलमानों की बढ़ती जनसं या का भय दिखाते रहते हैं। और तो और धर्म परिवर्तन व घर वापसी जैसी नौटंकी कर मुस्लिम व ईसाई समुदाय के लोगों की हिंदू धर्म में वापसी का दिखावा कर हिंदू धर्म के प्रति अपनी चिंताएं जताते रहते हैं। परंतु यही पूर्वाग्रही रूढ़ीवादी शक्तियां इस बात का हिसाब कभी नहीं देती कि हिंदू धर्म से ही संबंध रखने वाले दलित समाज के लोग तथाकथित उच्च जाति के लोगों के इसी सौतेले व भेदभावपूर्ण व्यवहार से दु:खी होकर अब तक कितनी बड़ी सं या में धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और अब भी करते रहते हैं? क्या भगवान या उसके मंदिरों पर किसी धर्म व जाति विशेष के लोगों का स्वामित्व भी हो सकता है? मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर क्या यही संदेश दिया था कि उनके नाम पर राजनीति तो ज़रूर करना परंतु दलितों को हमेशा अपमानित व उत्पीडि़त करते रहना? क्या बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जैसे शिक्षित महापुरुष द्वारा हिंदू धर्म त्यागकर लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाए जाने का कारण हिंदू धर्म में फैली अन्यायपूर्ण व्यवस्था नहीं थीं?

दूल्हे के रूप में घोड़ी पर बैठकर बारात ले जाना क्या केवल तथाकथित उच्च जाति के लोगों का ही अधिकार है? अक्सर राजस्थान व मध्य प्रदेश जैसे और भी कई राज्यों से ऐसे घृणित समाचार सुनाई देते हैं कि किसी दलित दूल्हे को कथित उच्च जाति के लोगों द्वारा घोड़ी से नीचे खींचकर उतार दिया गया। दलितों की बारात पर पथराव तक के घृणित समाचार सुनने में आ चुके हैं। अभी पिछले दिनों मध्य प्रदेश के रतलाम जि़ले में एक दलित परिवार को तो प्रशासन द्वारा यह हिदायत दी गई कि दूल्हा अपने सिर पर हैल्मेट पहन कर ही घोड़ी पर सवार हो अन्यथा दूसरी जाति के लोग उसपर पथराव कर सकते हैं। लिहाज़ा वह अपनी सुरक्षा का प्रबंध स्वयं करे। कैसी घिनौनी व्यवस्था और उससे भी घृणित सरकारी आदेश? और इन सबके बावजूद धर्म के ठेकेदार और हिंदूवाद का दंभ भरने वाले लोग धर्म परिवर्तन को लेकर हाय-तौबा करते दिखाई देते हैं। यही शक्तियां धर्म परिवर्तन रोकने संबंधी $कानून बनाए जाने की भी पक्षधर हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि आपको चाहे जितना ज़लील या अपमानित किया जाए, समाज में जिस श्रेणी में भी रखा जाए आपको उसी हाल में रहना ही होगा? आप अपनी स्वतंत्रता से अपना धर्म भी नहीं चुन सकते? दूसरी ओर इसी कथित उच्च जाति का दोहरापन भी उस समय देखा जा सकता है जबकि मायावती जैसे दलित नेता इसी दलित उपेक्षा व उत्पीडऩ की सीढ़ी पर चढ़कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाते हैं। उस समय कथित उच्च जाति के लोग मायावती जैसे नेताओं के समक्ष ‘दंडवत’ करते भी दिखाई देते हैं। इससे एक बात और साफ ज़ाहिर होती है कि दलित या नीच जाति का व्यक्ति वह है जो आर्थिक या शारीरिक रूप से अथवा पारिवारिक पृष्ठभूमि के लिहाज़ से कमज़ोर है। और यदि वही दलित सत्ता में अथवा किसी अन्य उच्च पद पर है या सांसद, विधायक अथवा मंत्री जैसे पदों पर विराजमान है तो वहां उस दलित व्यक्ति की उपेक्षा करने या उसे अहमियत न दिए जाने का साहस कोई नहीं कर पाता। यदि हमें केवल हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि भारतीय समाज तथा संपूर्ण राष्ट्र को एकजुट रखना है तथा वास्तव में देश की एकता व अखंडता की बात करनी है तो मात्र दलितों के आरक्षण की राजनीति करने अथवा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को अपना आदर्श बताने या संत रविदास जयंती अथवा बाल्मीकि जयंती पर मु य अतिथि बनकर उन्हें अपनी प्रेरणा का पात्र अथवा आदर्श बताने जैसे लोकलुभावने बयानों से काम नहीं चलने वाला। बजाए इसके हमें दलित उत्पीडऩ तथा दलितों की उपेक्षा व आए दिन होने वाले उनके अपमान को समाज से जड़ से समाप्त करने की कोशिश करनी होगी क्योंकि ऊंच-नीच व जात-पात की यह व्यवस्था हमारे समाज के लिए एक बड़ा नासूर बन चुकी है।

Comment:

vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
restbet giriş
restbet giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
restbet giriş
Vaycasino Giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betasus giriş
betasus giriş
bahiscasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
bets10 giriş
bets10 giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
ilbet giriş
betcio giriş
betvole giriş
betcio giriş
betcio giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betcio giriş
nakitbahis giriş
nakitbahis giriş
celtabet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betasus giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betasus giriş
holiganbet giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
holiganbet giriş
trendbet giriş
trendbet giriş
betasus giriş