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रेडियो से जुड़ी मेरी यादें और विभिन्न उदघोषक (भाग-1)

radioसुरेश चिपलुनकर

“रेडियो” का नाम आते ही एक रोमांटिक सा अहसास मन पर तारी हो जाता है, रेडियो से मेरे जुड़ाव की याद मुझे बहुत दूर यानी बचपन तक ले जाती है। आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है कि सन 1975 में जब हमारा परिवार सीधी (मप्र में रीवा/चुरहट से आगे स्थित) में रहता था और मैं शायद छठवीं-सातवीं में पढ़ता था। घर पर एक विशाल सा रेडियो था बुश बैरन (Bush Baron) का, आठ बैंड का, चिकनी लकड़ी के कैबिनेट वाला, वाल्व वाला। उस जमाने में ट्रांजिस्टर नहीं आये थे, वाल्व के रेडियो आते थे, जिन्हें चालू करने के बाद लगभग 2-3 मिनट रुकना पड़ता था वाल्व गरम होने के लिये। उन रेडियो के लिये लायसेंस भी एक जमाने में हुआ करते थे, उस रेडियो में एक एंटीना लगाना पड़ता था। वह एंटीना यानी तांबे की जालीनुमा एक बड़ी सी पट्टी होती थी जिसे कमरे के एक छोर से दूसरे छोर पर बाँधा जाता था। उस जमाने में इस प्रकार का रेडियो भी हरेक के यहाँ नहीं होता था और “खास चीज़” माना जाता था, और जैसा साऊंड मैने उस रेडियो का सुना हुआ है, आज तक किसी रेडियो का नहीं सुना। बहरहाल, उस रेडियो पर हमारी माताजी सुबह छः बजे मराठी भक्ति गीत सुनने के लिये रेडियो सांगली, रेडियो परभणी और रेडियो औरंगाबाद लगा लेती थीं, जी हाँ सैकड़ों किलोमीटर दूर भी, ऐसा उस रेडियो और एंटीना का पुण्य-प्रताप था, सो रेडियो से आशिकाना बचपन में ही शुरु हो गया था।

सीधी में उन दिनों घर के आसपास घने जंगल हुआ करते थे, सुबह रेडियो की आवाज से ही उठते थे और रेडियो की आवाज सुनते हुए ही नींद आती थी। उन दिनों मनोरंजन का घरेलू साधन और कुछ था भी नहीं, हम लोग रात 8.45 पर सोने चले जाते थे, (आजकल के बच्चे रात 12 बजे भी नहीं सोते), उस समय आकाशवाणी से रात्रिकालीन मुख्य समाचार आते थे, और श्री देवकीनन्दन पांडेय की गरजदार और स्पष्ट उच्चारण वाली आवाज “ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनन्दन पांडे से समाचार सुनिये…” सुनते हुए हमें सोना ही पड़ता था, क्योंकि सुबह पढ़ाई के लिये उठना होता था और पिताजी वह न्यूज अवश्य सुनते थे तथा उसके बाद रेडियो अगली सुबह तक बन्द हो जाता था। देवकीनन्दन पांडे की आवाज का वह असर मुझ पर आज तक बाकी है, यहाँ तक कि जब उनके साहबजादे सुधीर पांडे रेडियो/फ़िल्मों/टीवी पर आने लगे तब भी मैं उनमें उनके पिता की आवाज खोजता था। रेडियो सांगली और परभणी ने बचपन के मन पर जो संगीत के संस्कार दिये और देवकीनन्दन पांडे के स्पष्ट उच्चारणों का जो गहरा असर हुआ, उसी के कारण आज मैं कम से कम इतना कहने की स्थिति में हूँ कि भले ही मैं तानसेन नहीं, लेकिन “कानसेन” अवश्य हूँ। विभिन्न उदघोषकों और गायकों की आवाज सुनकर “कान” इतने मजबूत हो गये हैं कि अब किसी भी किस्म की उच्चारण गलती आसानी से पचती नहीं, न ही घटिया किस्म का कोई गाना। अस्तु…

जब थोड़े और बड़े हुए और चूंकि पिताजी की ट्रांसफ़र वाली नौकरी थी, तब हम अम्बिकापुर (सरगुजा छत्तीसगढ़) और छिन्दवाड़ा में कुछ वर्षों तक रहे। उस समय तक घर में “मरफ़ी” का एक टू-इन-वन तथा “नेल्को” कम्पनी का एक ट्रांजिस्टर आ चुका था (और शायद ही लोग विश्वास करेंगे कि नेल्को का वह ट्रांजिस्टर -1981 मॉडल आज भी चालू कंडीशन में है और उसे मैं दिन भर सुनता हूँ, और मेरी दुकान पर आने वाले ग्राहक उसकी साउंड क्वालिटी से रश्क करते हैं, उन दिनों ट्रांजिस्टर में FM बैंड नहीं आता था, इसलिये इसमें मैंने FM की एक विशेष “प्लेट” लगवाई हुई है, जो कि बाहर लटकती रहती है क्योंकि ट्रांजिस्टर के अन्दर उसे फ़िट करने की जगह नहीं है)। बहरहाल, मरफ़ी के टू-इन-वन में तो काफ़ी झंझटें थी, कैसेट लगाओ, उसे बार-बार पलटो, उसका हेड बीच-बीच में साफ़ करते रहो ताकि आवाज अच्छी मिले, इसलिये मुझे आज भी ट्रांजिस्टर ही पसन्द है, कभी भी, कहीं भी गोद में उठा ले जाओ, मनचाहे गाने पाने के लिये स्टेशन बदलते रहो, बहुत मजा आता है। उन दिनों चूंकि स्कूल-कॉलेज तथा खेलकूद, क्रिकेट में समय ज्यादा गुजरता था, इसलिये रेडियो सुनने का समय कम मिलता था।

शायद मैं इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं कर रहा हूँ कि मेरी उम्र के उस समय के लोगों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाला “बिनाका गीतमाला” और अमीन सायानी की जादुई आवाज न सुनी होगी। जिस प्रकार एक समय रामायण के समय ट्रेनें तक रुक जाती थीं, लगभग उसी प्रकार एक समय बिनाका गीतमाला के लिये लोग अपने जरूरी से जरूरी काम टाल देते थे। हम लोग भोजन करने के समय में फ़ेरबदल कर लेते थे, लेकिन बुधवार को बिनाका सुने बिना चैन नहीं आता था। जब अमीन सायानी “भाइयों और बहनों” से शुरुआत करते थे तो एक समाँ बंध जाता था, यहाँ तक कि हम लोग उनकी “सुफ़ैद” (जी हाँ अमीन साहब कई बार सफ़ेद को सुफ़ैद दाँत कहते थे) शब्द की नकल करने की कोशिश भी करते थे। रेडियो सीलोन ने अमीन सायानी और तबस्सुम जैसे महान उदघोषकों को सुनने का मौका दिया। तबस्सुम की चुलबुली आवाज आज भी जस की तस है, मुझे बेहद आश्चर्य होता है कि आखिर ये कैसे होता है? उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस का दोपहर साढ़े तीन बजे आने वाला फ़रमाइशी कार्यक्रम हम अवश्य सुनते थे। “ये ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है, पेश-ए-खिदमत है आपकी पसन्द के फ़रमाइशी नगमें…”, जिस नफ़ासत और अदब से उर्दू शब्दों को पिरोकर “अज़रा कुरैशी” नाम की एक उदघोषिका बोलती थीं ऐसा लगता था मानो मीनाकुमारी खुद माइक पर आन खड़ी हुई हैं।

“क्रिकेट और फ़िल्मों ने मेरी जिन्दगी को बरबाद किया है”, ऐसा मेरे पिताजी कहते हैं… तो भला क्रिकेट और कमेंट्री से मैं दूर कैसे रह सकता था। इस क्षेत्र की बात की जाये तो मेरी पसन्द हैं जसदेव सिंह, नरोत्तम पुरी और सुशील दोषी। तीनों की इस विधा पर जबरदस्त पकड़ है। खेल और आँकड़ों का गहरा ज्ञान, कई बार जल्दी-जल्दी बोलने के बावजूद श्रोता तक साफ़ और सही उच्चारण में आवाज पहुँचाने की कला तथा श्रोताओं का ध्यान बराबर अपनी तरफ़ बनाये रखने में कामयाबी, ये सभी गुण इनमें हैं। फ़िलहाल इतना ही…

अगले भाग में विविध भारती और टीवी के कुछ उदघोषकों पर मेरे विचार (भाग-2 में जारी………)

लेखक का ब्‍लॉग:https://blog.sureshchiplunkar.com/

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