महान् संन्यासी स्वामी सर्वानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित संस्मरण- “महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ के व्यक्तित्व विषयक कुछ संस्मरण”

ओ३म्

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महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ (जन्म 18-1-1912 मृत्यु 20-1-1989) वैदिक धर्म, ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के निष्ठावान अनुयायी एवं वेद, यज्ञ एवं साधना के प्रचारक थे। उनका जीवन धर्म, संस्कृति के प्रचार एवं यज्ञ-योग-साधना को समर्पित था। उन्होंने वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के द्वारा देश के विभिन्न भागों में जाकर यज्ञ एवं योग आदि का प्रचार किया था। उनके जन्म चरित्र से आज हम स्वामी सर्वानन्द सरस्वती जी द्वारा प्रस्तुत विचारों वा श्रद्धांजलि को प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे उनके जीवन, गुणों एवं कार्यों पर प्रकाश पर पड़ता है। स्वामी सर्वानन्द सरस्वती जी की श्रद्धांजलि प्रस्तुत है।

कई वर्ष पहले (सन् 1990 से पूर्व) की बात है कि महात्मा दयानन्द जी महाराज जम्मू से लौटते हुए दयानन्द मठ, दीनानगर में पधारे। उनके साथ जो सज्जन थे उनका नाम स्मरण नहीं रहा, जो उनके विशेष भक्त थे। महात्मा जी से मेरा यह पहला परिचय था। उनकी भव्य, सौम्य आकृति का मुझ पर एक विशेष प्रभाव पड़ा। उनकी बातों में, उनके विचारों में, उनकी आकृति में एक विशेष माधुर्य देखा। उस दिन के प्श्चात् हम दोनों का सम्बन्ध घनिष्ठ ही होता गया। मेरे हृदय में उनके लिए एक विशेष स्थान बन गया। वैदिक यति-मण्डल की सदस्यता महात्मा जी ने सहर्ष स्वीकार की और वैदिक यति-मण्डल के कार्यकर्ता प्रधान अन्त तक रहे। महात्मा जी ने वैदिक-यति-मण्डल की एक बैठक वैदिक साधना आश्रम, देहरादून में बुलाई। उस समय आश्रम में यज्ञ तथा उत्सव चल रहा था। महर्षि निर्वाण शताब्दी (अक्टूबर सन् 1883ं) अजमेर में मनाई जाए, वैदिक यति-मण्डल की यह इच्छा थी। सार्वदेशिक सभा के अधिकारियोें का विचार देहली में करने का था। उस समय वहां वैदिक यति-मण्डल ने निश्चय किया कि महर्षि ने अपना पंचभौतिक शरीर अजमेर में ही छोड़ा था, इसलिये निर्वाण शताब्दी वहीं मनाई जाए। यह बहुत बड़ा कार्य था। इसके लिए महात्मा जी ने सबको बहुत प्रोत्साहन दिया।

श्री स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती ने महर्षि निर्वाण शताब्दी के लिए कई लाख रुपया एकत्रित करने का निश्चय किया। श्री स्वामी सत्यप्रकाश जी सरस्वती महाराज ने भोजन सामग्री एकत्रित करने का कार्य लिया। श्री महात्मा दयानन्द जी महाराज से प्रार्थना की गई कि आप यज्ञ कार्य सम्भालने की कृपा करें। महात्मा जी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। कई लोगों ने यज्ञ के लिए अन्य बड़े विद्वानों के नाम प्रस्तुत किये और बहुत बल दिया कि यज्ञ कराने वाले बड़े विद्वान आर्यसमाज में विद्यमान हैं और यज्ञ विधियों के विशेषज्ञ भी हैं। यह बहुत बड़ा यज्ञ है जो उन्हीं विद्वानों के द्वारा किया जाना चाहिए। किन्तु वैदिक यति-मण्डल के सदस्यों, विशेषकर श्री स्वामी ओमानन्द जी महाराज ने कहा कि महात्मा दयानन्द जी की वेद में जो निष्ठा और श्रद्धा है वह अन्यों में दिखाई नहीं देती और महात्मा जी के द्वारा यज्ञों का बहुत प्रचार होता आ रहा है। इसलिये यह निर्वाण शताब्दी (अक्टूबर, 1883ं) का बृहद् यज्ञ महात्मा जी ही करेंगे। महात्मा जी ने यज्ञ सम्बन्धी सब भार अपने ऊपर लेने का निश्चय किया। अपने अनेक श्रद्धालु भक्तों को यज्ञ के लिए प्रेरित करते हुए महात्मा जी अजमेर में होने वाले इस यज्ञ के लिए अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए अजमेर पहुंच गये और निर्वाण शताब्दी से एक मास पूर्व आपने चारों वेदों का यज्ञ आरम्भ कर दिया।

इस यज्ञ में कई मन घी और बहुतसी सामग्री लगी, जो महात्मा जी ने अपने प्रभाव से वहां एकत्रित होती रही। महात्मा जी ने यज्ञ के साथ ऋषि लंगर भी आरम्भ कर दिया था, जिसमें सैकड़ों आदमी प्रतिदिन भोजन करते थे। शताब्दी के आरम्भिक कुछ दिनों में हजारों लोग शताब्दी के लिए पहुंच गये जो सभी महात्मा जी के ऋषि लंगर में भोजन करते रहे क्योंकि अभी शताब्दी के प्रबन्धकों ने ऋषि लंगर प्रारम्भ नहीं किया था। यह यज्ञ और लंगर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से हुआ। यह सब महात्मा जी के व्यक्तित्व का प्रभाव था। दयानन्द आश्रम केसरगंज अजमेर में भव्य यज्ञशाला के निर्माण में भी इन्हीं का विशेष हाथ था। अजमेर में बहुत से लोग पुष्कर देखने गये। वहां महर्षि दयनन्द जी ने मन्दिर में एक छोटीसी कोठरी में कुछ समय निवास किया था। उसे भी भव्य बनाने के लिए महात्मा जी ने धन की अपील की और पर्याप्त धन एकत्रित हो गया जिससे उस कुटिया को नया सुन्दर रूप दिया गया। निर्वाण शताब्दी के अन्त में बहुत सी भोजन सामग्री जो बच गई थी, अजमेर की कई संस्थाओं को दान दी गई और 18000/- रुपया नकद परोपकारिणी सभा को दिया। निर्वाण शताब्दी की सफलता में उनका बहुत बड़ा योगदान था। श्री महात्मा जी ने हजारों नास्तिकों को आस्तिक तथा यज्ञ के श्रद्धालु बनाया। बहुत दीर्घकाल तक सहस्रों लोगों के हृदय में उनकी स्मृति बनी ही रहेगी तथा वे लोग महात्माजी के स्मरण मात्र से अनेक दोषों से बचे रहेंगे। ऐसे महापुरुष जीवन में मनुष्य समाज में सच्ची सेवा कर जाते हैं और अपने जीवन का साफल्य भी।

स्वामी सर्वानन्द सरस्वती जी वैदिक यति मण्डल के अध्यक्ष रहे। उनके द्वारा महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ जी पर प्रस्तुत उपर्युक्त विचार पढ़कर हमारी महात्मा दयानन्द जी के प्रति श्रद्धा में विस्तार हुआ। हम देहरादून के तपोवन के वर्ष में दो बार होने वाले वृहदयज्ञों, ग्रीष्म एवं शरदुत्सव, में सम्मिलित होते थे। महात्मा दयानन्द द्वारा ही आश्रम के सभी वेदपारायण यज्ञ कराये जाते थे। यज्ञ के मध्य में वह यज्ञ के महत्व सहित मन्त्रों के अर्थों पर भी प्रकाश डालते थे। महात्मा जी बहुत भावुक हृदय के थे। बोलते बोलते अनेक बार उनकी आंखें भर आती थी। श्रद्धालु श्रोता भी उनकी इस स्थिति से प्रभावित होकर स्वयं भी भावविभोर हो जाते थे। हमारा सौभाग्य है कि हमें महात्मा जी द्वारा कराये गये अनेक यज्ञों में सम्मिलित होने सहित उनसे वार्तालाप करने और उनके उपदेशों का श्रवण करने का अवसर मिला। कुछ दिनों से हम महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ जी की जीवनगाथा को देख रहे थे। आज हमें स्वामी सर्वानन्द महाराज जी की इन पंक्तियों को प्रस्तुत करने इच्छा हुई। इससे पाठकों को महात्मा दयानन्द जी के व्यक्तित्व की एक झलकी दिखेगी। महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ जी की सुपुत्री माता सुरेन्द्र अरोड़ा वर्तमान में देहरादून में रहती हैं। वह वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून सहित स्थानीय आर्यसमाज की संस्थाओं की यज्ञ एवं उत्सव आदि गतिविधियों में भी उपस्थित होती हैं। वैदिक साधन आश्रम तपोवन में आयोजित सभी उत्सवों में महिला सम्मेलन आयोजित किया जाता है, जिनकी संयोजिका माता सुरेन्द्र अरोड़ा जी ही होती हैं। माता सुरेन्द्र अरोड़ा जी अत्यन्त स्वाध्यायशील एवं विदुषी महिला हैं। उन्होंने कुछ समय पाणिनी कन्या विद्यालय, वाराणसी में भी संस्कृत व्याकरण का अध्ययन किया। महात्मा प्रभु आश्रित जी की प्रेरणा से एक याज्ञिक परिवार में उनका विवाह हुआ था। वह व उनके पति यज्ञ के अनन्य प्रेमी रहे। यह दम्पति अपने निवास पर विद्वान आचार्यों से वृहद यज्ञों का अनुष्ठान कराते रहे और स्वयं भी दैनिक यज्ञ आदि कृत्यों को करते रहें व अब भी माता जी करती हैं। वृहद यज्ञों में आर्थिक सहयोग भी करती हैं। हमें वर्तमान में भी आर्यसमाजिक संस्थाओं में माता सुरेन्द्र अरोड़ा जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिलता रहता है। महात्मा जी के जीवन के कुछ पक्षों से परिचित कराने के लिए हमने यह पंक्तियां प्रस्तुत की हैं।

यह भी बता दें की महात्मा दयानन्द वानप्रस्थ जी की जीवन गाथा फरवरी 1990 ईसवी में वैदिक भक्ति साधन आश्रम रोहतक से प्रकाशित हुई थी। इसकी 1100 प्रतियां प्रकाशित की गईं थी। इस पुस्तक के लेखक थे श्री हरकृष्ण लाल ओबराय जी। पुस्तक के लेखक ने इस पुस्तक को उन सहस्रों परिवारों को समर्पित किया है जिन्होंने महात्मा जी से प्रेरणा पाकर अपने जीवन को यज्ञमय बनाया। पुस्तक में महात्मा प्रभु भिक्षु जी द्वारा लिखित प्रकाशकीय भी है। पूर्वपीठिका नाम से पुस्तक लेखक ने कई पृष्ठों में इस पुस्तक लेखन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला है। पुस्तक की भूमिका श्री फतहसिंह एम.ए. डी.लिट्, शोध निदेशक, वेद-संस्थन, सी-22 राजौरी गार्डन, नई दिल्ली ने लिखी है। जिन बन्धुओं को महापुरुषों व महात्माओं की जीवन पढ़ना प्रिय हो, वह इस पुस्तक को पढ़कर लाभान्वित हो सकते हैं। हमने महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी जी को साक्षात् देखा है। वह वस्तुतः उच्च कोटि के साधक, भक्तहृदय, सन्त एवं यज्ञों में अटूट श्रद्धा व निष्ठा रखने वाले महात्मा थे। उनके कार्यों से वैदिक धर्म एवं संस्कृति के प्रचार में बहुत सहायता मिली। उनके प्रेरणादायक जीवन की विस्तृत जानकारी पुस्तक को पढ़कर ही प्राप्त की जा सकती है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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