वेद ईश्वरीय वाणी है। वेद का पढ़ना पढ़ाना व सुनना सुनाना सब मनुष्यों का परम धर्म है। वेदों में उत्तम आचरण के ग्रहण करने का उपदेश परमात्मा ने मनुष्यों के लिए किया है। ईश्वर का जीवों के प्रति कृतज्ञता का भाव ही हमें कृतघ्नता के महापाप से बचाता है। फलस्वरुप हम ईश्वर के दंड से भी बचते हैं। कर्म व कर्तव्यों के वेद यजुर्वेद के १६ वें अध्याय में नमः शब्द का अनेक बार प्रयोग किया गया है। नमः शब्द के महर्षि दयानंद सरस्वती ने अनेक युक्ति संगत प्रकरण अनुसार अर्थ किये हैं। सामान्य अर्थ में नमः शब्द का अर्थ अन्न आदि से सत्कार ही किया है। यजुर्वेद के १६ वें अध्याय के प्रथम मंत्र में नमः शब्द का उल्लेख तीन बार मिलता है। मंत्र इस प्रकार है।

नमः रूद्र मन्यवउतो त इषवे नमः।बाहुभ्यामुत ते नमः|| १||
अर्थ दुष्टों व शत्रुओं को रुलाने वाले शत्रु को मारने वाले वीर पुरुष के लिए नमः अर्थात उसका सत्कार।
फिर मंत्र ८ में ‘नमो अस्तु नीलग्रीवाय’ पद का उल्लेख मिलता है। जिसका अर्थ है हजारों भ्रत्यों के कार्यों को देखने वाले पराक्रमी सेनापति के लिए नमः उसको हमारा नमस्कार। मंत्र १७ में ‘नमो हिरण्यबाहवे’ पद व संपूर्ण मंत्र का अर्थ ऋषि ने इस प्रकार किया है , जो मनुष्य श्रेष्ठ जनों का सत्कार, भूखों को भोजन , पशुओं की रक्षा चोरों से करते हैं, उनके लिए हमारा नमस्कार हो।
यजुर्वेद के १६ वें अध्याय के ६६ मंत्रों में अधिकांश में नमः शब्द का उल्लेख है। जो शिष्टाचार सत्कार नम्रता का सूचक है। इस अध्याय को शिष्टाचार का अध्याय भी कहते हैं। इस अध्याय के सभी मंत्रों में कृषक के लिए नमस्कार तो कहीं राजा के लिए तो कहीं सभापतियों के लिए, वृक्ष लगाने वालों के लिए, जल स्थान तालाबों पोखर आदि की रक्षा करने वाले मनुष्य के लिए, राष्ट्र के रक्षक सैनिकों के लिए तो कहीं कारीगरों शिल्पियों के लिए , ग्रहस्थियों के लिए, सन्यासियों के लिए, यहां तक कि गाय आदि पशुओं से लेकर , कुत्ते आदि तक के लिए व उनके पालने वालों के लिए नमः शब्द का उल्लेख किया गया है, अर्थात उन सभी के लिए नमस्कार। उनके प्रति सत्कार अन्न आदि से उनका सम्मान करने का उपदेश परमात्मा ने हम मनुष्यों के लिए किया है।
वेद सहजीवन व सह अस्तित्व के सम्मान की उदात् और महान शिक्षा हमें देते हैं। वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। यजुर्वेद कर्म का वेद है। कर्म क्षेत्र में वही व्यक्ति सफल होता है जिसके अंदर नम्रता सभी जीवों के प्रति सम्मान का भाव होता है। अभिमानी, स्वार्थी, लालची व्यक्ति कभी भी कर्तव्य के पद पर आरूढ नहीं हो सकता।समाज में आदर्श मानदंड स्थापित नहीं कर सकता। ऐसा व्यक्ति समाज घातक ही कहलाता है।
वेद भगवान हमें समाज कंटक नहीं, समाज के पथ प्रदर्शक व समाज के सहयोगी बनने की शिक्षा देते हैं। आओ, मिलकर सभी जन यह दिव्य संकल्प लें कि ईश्वर की वाणी वेद का श्रवण मनन करेंगे, स्वाध्याय करेंगे, वेद रूपी गौ के अमूल्य ज्ञान रूपी दुग्ध का दोहन कर पान करेंगे ।अपने जीवन को सफल व सार्थक बनाएंगे।

*ईश्वर वेद व ऋषि भक्त*
वानप्रस्थी देव मुनि
पूर्व नाम सुखवीर प्रधान ग्राम पल्ला तहसील दादरी जिला गौतम बुध नगर।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *