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क्यों मीडिया को शीशे के घर में कैद करना चाहती है सत्ता?

mediaपुण्य प्रसून बाजपेयी

साल भर पहले जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द इस्तेमाल किया तो संकेत तभी मिल गये थे कि सत्ता बदलते ही सत्ता के निशाने पर मीडिया तो होगा। लेकिन उस वक्त यह अंदेशा बिलकुल नहीं था कि मीडिया नामक संस्थान की साख को भी खत्म करने की दिशा में कदम बढेंगे। क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में राडिया कांड से चंद बडे नाम वाले पत्रकारों के संग क्रोनी कैपटलिज्म का खेल जब खुलकर उभरा तो मीडिया की साख पर बट्टा तो लगा लेकिन यह भरोसा भी जागा की देश में सत्ता बदलेगी तो मीडिया के भीतर पत्रकारों की अहमियत बढ़ेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द कहकर दागी पत्रकारों को संकेत दे दिये हैं। लेकिन नई सत्ता ने साल भर के भीतर ही खुले संकेत दे दिये कि मीडिया की निगरानी सत्ता को बर्दाश्त नहीं है। खास बात यह है कि पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर देश में प्रधानमंत्री का चुनाव हुआ। और जनादेश भी ऐतिहासिक आया । तो झटके में लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था ही

प्रधानमंत्री की जीत के सामने हार गई । यानी प्रधानमंत्री ने सिर्फ पूर्व की सत्ता को ही नहीं हराया बल्कि उस लोकतांत्रिक ढांचे को भी हरा दिया जो सत्ताधारी राजनीतिक दल के भीतर लोकतंत्र को जिन्दा रखता । मंत्रिमडलीय समूह मान्यता देता। यानी असर ऐसा हुआ कि सत्ता संभालने के बाद न्यूज ट्रेडर की जो परिभाषा प्रधानमंत्री ने दी उसी परिभाषा को हर मंत्री और हर नेता को अपनाना पड़ा।

क्योंकि हर मंत्री, हर नेता ही नहीं बल्कि राजनीतिक दल का आस्त्तिव ही जब प्रधानमंत्री की जीत पर टिक गया तो फिर कामकाज करने को लेकर विजन भी उसी लकीर पर जा टिका जिसमें जनादेश की मान्यता हमेशा बरकरार रहे । या फिर पांच बरस तक देश का नजरिया लोकतांत्रिक जनादेश के उसी नजरिये को कंघे पर उठाये रहे जो 16 मई 2014 को आया । सवाल है कि जब जनादेश अमूर्त नहीं था तो जनादेश को लेकर पांच बरस तक का नजरिया एक सरीखा कैसे हो सकता है। और मीडिया जो खुद को लेकर भी नजरिया बदलता रहा है उसका नजरिया सत्ता को लेकर पांच बरस तक एक सरीखा कैसे रह सकता है। मुश्किल यह नहीं है सत्ता और मीडिया टकराते रहे हैं। मुश्किल यह है कि मीडिया को लेकर सत्ता का ताना बाना मीडिया को भी उसी बिजनेस मॉडल में ला खड़ा कर रहा है जहा सरकार के निर्णय सीधे मीडिया हाउस के जीवन-मरण को प्रभावित करें। और पत्रकार के सामने सत्ता के अनुकुल रहने के अलावे कोई दूसरा रास्ता ना बने। यह इमरजेन्सी नहीं है । यह सामाजिक-आर्थिक तौर पर पत्रकार और मीडिया हाउस को खत्म करने वाले हालात हैं। जहां पत्रकार को सत्ता से नहीं उस समाज से लड़ना है जो जनादेश की आगोश में पांच बरस तक उग्र कैडर के तौर पर मदहोश रहना चाहता है। क्योंकि सत्ता ने ही समाज के इस तबके को उकसाया है। पहले जीत के लिये लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ उकसाया। फिर जीत बरकरार रखने के लिये संसदीय ढांचे से ज्यादा महत्व देकर इस कैडर को अपने बूते खड़े होने दिया। और यही एकाकी सत्ता की ताकत 16 मई 2014 से पहले अपने ही पारंपरिक नेताओ को दिल्ली में हराती है । और 16 के जनादेश में उन तमाम राजनीतिक दलों को, जो सत्तादारी बनते ही सरोकार खत्म कर लूट में ही लगे रहें। वैसे समझना यह भी होगा कि समाज का यह तबका लुपंन नहीं है। बल्कि उसी संसदीय और लोकतांत्रिक ढांचे से गुस्से में है जिसे पहले के सत्ताधारियो ने अपने अंटी में बांध कर देश में लूट मचायी । यानी जिस संसदीय राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिये समाज के भीतर का एक वर्ग बेचैन रहा, गुस्से में रहा उसने सामने कोई वैचारिक मंच उभरा नहीं या कहें हर वैचारिक मंच फेल साबित हुआ तो उसने मई 2014 की जीत में ही अपने गुस्से को ठंडा किया। और उस हालात से आंखे मूंद ली कि जिस मंच को जनादेश के साथवोटरों ने मई 2014 में तैयार किया और जिन्हे मंच तले दफ्न किया कही वह दुबारा पांच बरस के बाद फिर से तो नहीं उभर आयेंगे। यानी मौजूदा सत्ता फेल हुई तो एक बार फिर मनमोहन सिंह का गणित, नेहरु-गांधी परिवार का बिना जिम्मेदारी सत्ता संभालने का गुरुर। क्षत्रपों का जातीय समीरण । भ्रष्टाचार और आपराध तले चुनाव जीतने का मंत्र । सबकुछ दुबारा जीवित होकर कही ज्यादा तेवर के साथ उभरेगें । क्योकि मई 2014 की सत्ता भटक रही है । और भटकती सत्ता को यह बर्दाश्त नहीं है कि कोई उसे बताये कि वह भटक क्यों रही है। असर इसी का है कि न्यूज ट्रेडर की जो परिभाषा 16 मई 2014 से पहले सुनायी दी वह मई 2015 बीतते बीतते बदल गयी। राडिया टेपकांड के नायक नायिका भी सत्ता को भाने लगे और मीडिया हाउस के मौजूदा लाट में से सत्ता ने ही चुन चुन कर पत्रकार होने का तमगा देना शुरु कर दिया । यानी बेहद बारिकी से पहले मीडिया हाउस को जनादेश का आईना दिखाया गया ।

फिर मीडिया हाउस की सफलता-असलता का पैमाना उसे सत्ता के जरीये खबरों को दिखाने या ना दिखाने के दायरे में लाकर मापने की कोशिश की गई। फिर सत्ता के हर एलान के साथ मीडिया हाउस का नाम लेकर जोड़ने या ना जोडने की सामाजिक मान्यता या गैर मान्यता की एक दीवार खड़ी की गई। फिर मीडिया को ही सत्ता के अनुकूल या प्रतिकूल होने की व्याख्या देश के खिलाफ होने या ना होने से जोड़ी गई। और एक वक्त के बाद सत्ता ने खुद को खामोश कर उन संस्थानों के जरीये मीडिया पर वार करना शुरु किया जहा सत्ता का कैडर पद संभाल कर खुद को संस्थान बना चुका था। प्रसार भारती का नजरिया मीडिया को लेकर क्या होगा। फिल्म सेंसर बोर्ड क्या सोचता है । उच्च शिक्षा सस्थान [ आईआईटी-आईआईएस सरीखे ] क्यों स्वतंत्र हो । एम्स के हालात हैं कैसे । नेहरु युवक केन्द्र कहीं युवाओं को भटका तो नहीं रहा। विदेश नीति में बड़बोलापन तो नहीं। कश्मीर को लेकर दिल्ली की नीति सही हा या नहीं। आर्थिक नीतियां बेरोजगारी तो पैदा नहीं कर रही। भुखमरी और गरीबी क्यों बढ़ रही है। किसान की खुदकुशी के आंकड़े लगातार बढ़ क्यों रहे हैं। यानी किसी भी क्षेत्र को लेकर कोई खबर कोई पत्रकार करें या मीडिया हाउस करें तो झटके में सत्ता और कैडर का नजरिया उसे देशद्रोही करार देने में नहीं चुकेगा। क्योंकि सत्ता ने यह मान लिया है कि जनादेश का मतलब वह खुद ही देश है। और पांच बरस तक उससे कोई सवाल पूछने का हकदार नहीं है क्योंकि देश ने उसे ताकत दी है। यानी बतौर नागरिक तो दूर लोकतंत्र की जरुरत के लिहाज से भी कोई नौकरशाह, कोई जज या कोई पत्रकार भी अगर सत्ता की नीतियों या निर्णय को लेकर सवाल खड़ा करें तो वह उन्हीं सस्थानों के बीच खारिज किया जायेगा जो प्रतीकात्मक तौर पर लोकतंत्र को जीते हैं।

क्योंकि तमाम सस्थानों की कमान एक सरीखे विचारवानो के हाथ में दी गई। मुश्किल इतनी भर नहीं है कि सत्ता खुद को ही देश मान लें मुश्किल यह भी है कि देश जिस ताने बाने से बना है और टिका उस ताने बाने को ही सत्ता यह कहकर गलत करार देने लगे कि कि देश का मतलब तो हिन्दू राष्ट्र है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। यानी जिन्हें पद चाहिये वह राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के रंग में रंगे और नहीं रंग सकते तो रंगे होने का ढोग तो कर ही ले। क्योंकि पहली बार विवेकानंद इस्टीट्यूट या सूर्या फाउंडेशन ही बौद्दिक तौर पर सबसे सक्षम नहीं है बल्कि बीजेपी शासित राज्यों में डीएम और कलेक्टर को राज्यों के संघ प्रमुख के इशारों पर काम भी करना पडा रहा और नियुक्ति भी हो रही है। यानी जो धुन जातीय आधार पर क्षत्रपों ने सिस्टम को भ्रष्ट्र बनाने में लगायी उसका व्यापक रुप राष्ट्रीय स्तर पर अब नजर आ रहा है। असर इसी का है यादवो की ही यूपी में चलती है और लालू के नीतिश से गलबहिया डालते ही फिर से पुराने दिन बिहार में लौटने का खौफ हो चला है इसे कहने वाली बीजेपी की धार कुंद पड़ जाती है क्योंकि वह भी अपने कटघरे में उसी रास्ते पर है। लेकिन असल सवाल यही से मीडिया का भी खड़ा होता है और पत्रकारिता के तरीके का भी। बिजनेस माडल से इतर सोशल मीडिया भी ताकतवर तो है लेकिन यूपी के शाहजहापुर में यूपी का ही एक मंत्री पत्रकार की हत्या के आरोप में फंसने पर भी लाल बत्ती पर इसलिये घूमता है क्योकि सत्ता के सामने मीडिया बिखरा हुआ है। अपने अंतर्द्न्दो में पत्रकार फंसा हुआ है। और सत्ता भी मीडिया के सामने ही इस ठसक को दिखाने से नही चूकता कि दाग तो मीडिया पर भी है । यह अदा यूपी की सरकार भी दिखाती है और दिल्ली में केन्द्र सरकार की महिला मंत्री भी। यानी पहली बार सत्ता अपने तरीको से मीडिया को भी शीशे के घर में ला खडा करना चाह रही है जहा से कोई पत्रकार उसपर पत्थर ना फेकें ।

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