हे मनुष्य! याद रख, तू आनंद लोक का वासी है

बिखरे मोती-भाग 87

कर्म करो ऐसे सदा,
मीठी याद बन जाय।
तू पंछी उस देश का,
जाने कब उड़ जाये ।। 885 ।। 
व्याख्या : हे मनुष्य! यह जीवन क्षणभंगुर है। इसका कोई भरोसा नही है। तू पृथ्वी पर कर्म-क्रीड़ा करने के लिए आनंद लोक से आया है। इसलिए यहां पर ऐसे कर्म कर ताकि तेरे जाने के बाद लोगों के दिलों में  सर्वदा तेरी मीठी यादें रहें। लोग ये कहें-वह इंसानी चोले में फरिश्ता आया था।
याद रख, तू आनंद लोक का वासी है, न जाने कब मृत्यु का झपट्टा लग जाये और तू पंछी की तरह अनायास ही उड़ जाएगा।
रिश्तों में उलझाव को,
मत नही अधिकबढ़ाय।
समय पहले सुलझाय ले,
फिर पीछे पछताय ।। 886 ।।
मुसीबत में भी न लोप हो,
अधरों की मुस्कान।
पराक्रमी और साहसी,
पुरूषों की पहचान ।। 887 ।।
किस्मत, कृपा, कर्म से,
जीवन बने महान।
अदने से आला हो गये,
बने इतिहास की शान ।। 888।।
व्याख्या : हमारे ऋषि मुनियों ने जीवन में उत्कर्ष अथवा अपकर्ष को तीन भागों में बांटा है-चालीस प्रतिशत किस्मत (भाग्य अथवा प्रारब्ध)
चालीस प्रतिशत कर्म (पुरूषार्थ) और बीस प्रतिशत कृपा (परमपिता परमात्मा, सदगुरू, माता-पिता और अन्य कोई सुहृदय व्यक्ति इत्यादि के द्वारा कृपा हो सकती है)
प्राय: देखा गया है कि कर्म ही भाग्य रेखा बनकर हमें सुख देते हैं। भाग्य के संदर्भ में एक इतिहास प्रसिद्घ दृष्टांत देखिये महानंद का बेटा चंद्रगुप्त था जो मुरा नाम की दासी के गर्भ से जंगल में पैदा हुआ था, किंतु उसकी अप्रतिम प्रतिभा से प्रभावित होकर आचार्य चाणक्य उसे अपने गुरूकुल में ले आये थे। आगे चलकर यही बालक चंद्रगुप्त भारत का चक्रवर्ती सम्राट बना था। यह भाग्य का खेल नही तो  और किसका चमत्कार था?
दूसरा दृष्टांत कर्म के संदर्भ में देखिये। प्राय: देखा जाता है कि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो संपन्न घरानों में पैदा होते हैं, किंतु आलसी-व्यसनी हो जाते हैं और पढ़ नही पाते हैं। जबकि दूसरी तरफ ऐसे भी बच्चे देखने को मिलते हैं जो घोर गरीबी में पैदा होते हैं।  पढऩे के लिए पुस्तक पैसा कुछ नही होता है, किंतु अपने पुरूषार्थ (कर्म) से वे एक दिन राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष तक बने हैं जैसे-अब्राहिम लिंकन, जार्ज  वाशिंगटन तथा लालबहादुर शास्त्री इत्यादि। यह कर्म का चमत्कार नही तो और क्या है?
तीसरा दृष्टांत देखिए-एक छोटा सा बच्चा अलेक्जेंडर जिसे विश्व आज सिकंदर के नाम से जानता है। बचपन में जंगल में भेड़ बकरियां चराता था। अनायास उसकी भेंट जंगल में महान दार्शनिक अरस्तू से हुई जो सिकंदर के गुरू कहलाये। गुरू की कृपा ऐसी हुई कि उसने उसकी सोयी हुई शक्ति को यह कहकर जगा दिया-सिकंदर! तुम भेड़ बकरियां चराने के लिए पैदा नही हुए हों। तुम्हारे हृदय में पराक्रम और साहस का असीम सागर मुझे इठलाता हुआ दिखाई देता है। तुम्हारी आंखों में ‘विश्व विजेता’ का ख्वाब तैरता हुआ मुझे दिखाई देता है। इनमें जो शेर की सी घूर है यह तुम्हारी दृढ़ संकल्प शक्ति की परिचायक है। इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हारे घोड़ों  की टापों से दिशायें गुंजायमान हो जाएं  और तुम विश्व विजेता बनो। गुरू की कृपा ने भेड़ बकरी चराने वाले बच्चे को ‘सिकंदर महान’ बना दिया, मुकद्दर का सिकंदर बना दिया। इसे गुरू कृपा का चमत्कार नही कहेंगे तो और क्या कहेंगे? कृपा की शक्ति महान है।
क्रमश:

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