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लोगों को मुफ्त की आदत डाल कर देश के नेता कहीं देश को आर्थिक कंगाली की ओर तो नहीं ले जा रहे हैं ?


 ललित गर्ग

विडम्बना एवं विसंगति की हदें पार हो रही हैं। ये मुफ्त एवं खैरात कोई भी पार्टी अपने फंड से नहीं देती। टैक्स दाताओं का पैसा इस्तेमाल करती है। हम ‘नागरिक नहीं परजीवी’ तैयार कर रहे हैं। जब ये आर्थिक समीकरण फेल होगा तब ये मुफ्त खोर पीढ़ी बीस तीस साल की हो चुकी होगी।

भारत की राजनीति में खैरात बांटने एवं मुफ्त की सुविधाओं की घोषणाएं करके मतदाताओं को ठगने एवं लुभाने की कुचेष्टाओं में सभी राजनीतिक दल लगे हैं। महज राजनीतिक लाभ एवं वोट बैंक को प्रभावित करने के उद्देश्य से मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना सरकारों के आर्थिक असंतुलन के साथ ही आत्मघाती उपक्रम है। केंद्र सरकार को उन राज्यों को चेताना चाहिए जो कर्ज चुकाने की क्षमता खोते चले जाने के बाद भी मुफ्त की योजनाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे उत्पन्न गंभीर आर्थिक संकट को नजरअंदाज करना राजनीतिक अपरिपक्वता का द्योतक है, वही अवसरवादी एवं स्वार्थ की राजनीति को पनपाने का जरिया है। इस तरह की मुफ्त की संस्कृति एवं जनधन को खैरात में बांटने से किस तरह किसी देश में राजनीतिक संकट खड़ा करने के साथ कानून एवं व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है, इसका ताजा उदाहरण है श्रीलंका। वहां की स्थितियां जिस तेजी से बिगड़ रही हैं, वे भारत के लिए भी चिंता का विषय बन गई हैं।

भारत में यह कैसा लोकतांत्रिक ढ़ांचा बन रहा है जिसमें पार्टियां अपनी सीमा से कहीं आगे बढ़कर लोक-लुभावन वादे करने लगी हैं, उसे किसी भी तरह से जनहित में नहीं कहा जा सकता। बेहिसाब लोक-लुभावन घोषणाएं, अपने आर्थिक संसाधनों से परे जाकर और पूरे न हो सकने वाले आश्वासन पार्टियों को तात्कालिक लाभ तो जरूर पहुंचा सकते हैं, पर इससे देश के दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक हालात पर प्रतिकूल असर पड़ने की भी आशंका है। प्रश्न है कि राजनीतिक पार्टियां एवं राजनेता सत्ता के नशे में डूब कर इतने आक्रामक कैसे हो सकते हैं? यह स्थिति चिन्ताजनक है। इसी तरह की स्थितियों से श्रीलंका में आर्थिक हालात बिगड़ने और महंगाई के बेलगाम हो जाने के कारण एक ओर जहां जनता का अंसतोष बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक अस्थिरता भी गहराती जा रही है। करीब-करीब हर जरूरी वस्तु के आसमान छूते दामों से नाराज श्रीलंका की जनता सड़कों पर उतर रही है और वहां के राष्ट्रपति को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे करें तो क्या करें? 
श्रीलंका के बेकाबू होते हालात भारत के लिये एक सबक है, क्योंकि पिछले कुछ दौर से भारत में हर दल में मुफ्त बांटने की संस्कृति का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। लोकतंत्र में इस तरह की बेतुकी एवं अतिश्योक्तिपूर्ण घोषणाएं एवं आश्वासन राजनीति को दूषित करते हैं, जो न केवल घातक है बल्कि एक बड़ी विसंगति का द्योतक हैं। किसी भी सत्तारुढ़ पार्टी को जनता की मेहनत की कमाई को लुटाने के लिये नहीं, बल्कि उसका जनहित में उपयोग करने के लिये जिम्मेदारी दी जाती है। इस जिम्मेदारी का सम्यक् निर्वहन करके ही कोई भी सत्तारुढ़ पार्टी या उसके नेता सत्ता के काबिल बने रह सकते हैं।
श्रीलंका की आर्थिक स्थिति जिन कारणों से बिगड़ी, उनमें चीन से कठोर शर्तों पर लिया गया कर्ज तो जिम्मेदार है ही, इसके अलावा वे लोकलुभावन नीतियां भी उत्तरदायी हैं, जो आर्थिक नियमों को धता बताती थीं। कर्ज के बढ़ने और विदेशी मुद्रा भंडार खाली होते जाने के बाद भी इन नीतियों को आगे बढ़ाकर श्रीलंका ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का ही काम किया। यह ठीक है कि भारत श्रीलंका के हालात पर नजर रखे हुए है, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। इसी के साथ ही उन कारणों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, जिनके चलते श्रीलंका गहरे संकट में धंस गया। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब शीर्ष अधिकारियों के साथ एक बैठक की तो कई अफसरों ने यह कहा कि कुछ राज्यों की ओर से मुफ्त वस्तुएं और सुविधाएं देने का जो काम किया जा रहा है, वह उन्हें श्रीलंका जैसी स्थिति में ले जा सकता है। इन अफसरों की मानें तो कर्ज में डूबे राज्य मुफ्तखोरी वाली योजनाएं चलाकर अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर रहे हैं।
प्रश्न है कि क्या सार्वजनिक संसाधन किसी को बिल्कुल मुफ्त में उपलब्ध कराए जाने चाहिए? क्या जनधन को चाहे जैसे खर्च करने का सरकारों को अधिकार है? तब, जब सरकारें आर्थिक रूप से आरामदेह स्थिति में न हों। यह प्रवृत्ति राजनीतिक लाभ से प्रेरित तो है ही, सांस्थानिक विफलता को भी ढकती है और इसे किसी एक पार्टी या सरकार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। केजरीवाल सरकार ने अभियान चलाकर आम आदमी की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये सरकार की तथाकथित योजनाओं को बताने में खर्च कर दिये हैं कि किस तरह उन्होंने दिल्ली को चमका दिया है। किस तरह मुफ्त पानी-बिजली देने के नाम पर सरकारी खजाना खाली कर रहे हैं। जबकि दिल्ली के हालात किसी से छिपे हुए नहीं हैं। इस तरह का बड़बोलेपन एवं मुफ्त की संस्कृति को पढ़े-लिखे बेरोजगारों ने अपना अपमान समझा। कई बार सरकारों के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वे अपने लोगों के अभाव, भूख, बेरोजगारी जैसी विपदाओं से बचा सकें। लेकिन जब उनके पास इन मूलभूत जनसमस्याओं के निदान के लिये धन नहीं होता है तो वे मुफ्त में सुविधाएं कैसे बांटते हैं? क्यों करोड़ों-अरबों रुपये अपने प्रचार-प्रसार में खर्च करते हैं?

अर्थव्यवस्था और राज्य की माली हालत को ताक पर रखकर लगभग सभी पार्टियों व सरकारों ने गहने, लैपटॉप, टीवी, स्मार्टफोन से लेकर चावल, दूध, घी तक बांटा है या बांटने का वादा किया है। यह मुफ्तखोरी की पराकाष्ठा है। मुफ्त दवा, मुफ्त जाँच, लगभग मुफ्त राशन, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त विवाह, मुफ्त जमीन के पट्टे, मुफ्त मकान बनाने के पैसे, बच्चा पैदा करने पर पैसे, बच्चा पैदा नहीं (नसबंदी) करने पर पैसे, स्कूल में खाना मुफ्त, मुफ्त जैसी बिजली 200 रुपए महीना, मुफ्त तीर्थ यात्रा। जन्म से लेकर मृत्यु तक सब मुफ्त। मुफ्त बाँटने की होड़ मची है, फिर कोई काम क्यों करेगा? मुफ्त बांटने की संस्कृति से देश का विकास कैसे होगा? कैसे सरकारों का आर्थिक संतुलन बनेगा? पिछले दस सालों से लेकर आगे बीस सालों में एक ऐसी पूरी पीढ़ी तैयार हो रही है या हमारे नेता बना रहे हैं, जो पूर्णतया मुफ्त खोर होगी। अगर आप उनको काम करने को कहेंगे तो वे गाली देकर कहेंगे, कि सरकार क्या कर रही है?
विडम्बना एवं विसंगति की हदें पार हो रही हैं। ये मुफ्त एवं खैरात कोई भी पार्टी अपने फंड से नहीं देती। टैक्स दाताओं का पैसा इस्तेमाल करती है। हम ‘नागरिक नहीं परजीवी’ तैयार कर रहे हैं। जब ये आर्थिक समीकरण फेल होगा तब ये मुफ्त खोर पीढ़ी बीस तीस साल की हो चुकी होगी। जिसने जीवन में कभी मेहनत की रोटी नहीं खाई होगी, वह हमेशा मुफ्त की खायेगा। नहीं मिलने पर, ये पीढ़ी नक्सली बन जाएगी, उग्रवादी बन जाएगी, पर काम नहीं कर पाएगी। यह कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं? यह कैसी विसंगतिपूर्ण राजनीति है? राजनीति छोड़कर, गम्भीरता से चिंतन करने की जरूरत है।
वर्तमान दौर की सत्ता लालसा की चिंगारी इतनी प्रस्फुटित हो चुकी है, सत्ता के रसोस्वादन के लिए जनता और व्यवस्था को पंगु बनाने की राजनीति चल रही है। राजनीतिक दलों की बही-खाते से सामाजिक सुधार, रोजगार, नये उद्यमों का सृजन, खेती को प्रोत्साहन, ग्रामीण जीवन के पुनरुत्थान की प्राथमिक जिम्मेवारियां नदारद हो चुकी हैं, बिना मेहंदी लगे ही हाथ पीले करने की फिराक में सभी राजनीतिक दल जुट चुके हैं। जनता को मुफ्तखोरी की लत से बचाने की जगह उसकी गिरफ्त में कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में लगे हैं। लोकतंत्र में लोगों को नकारा, आलसी, लोभी, अकर्मण्य, लुंज बनाना ही क्या राजनीतिक कर्त्ता-धर्त्ताओं की मिसाल है? अपना हित एवं स्वार्थ-साधना ही सर्वव्यापी हो चला है? इन स्थितियों के कारण श्रीलंका जैसे हालात विभिन्न राज्यों में बनने की आहट सुनाई देने लगी है।
बेरोजगारी, व्यापार-व्यवसाय की टूटती सांसें एवं किसानों की समस्याओं को भी हल करने में ईमानदारी बरतने की बजाय सरकारें इसी तरह के लोक-लुभावन कदमों के जरिए उन्हें बहलाती रही हैं। ऐसी नीतियों पर अब गंभीरता से गौर करने की जरूरत है। अपने राज्य की स्त्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना हरेक सरकार का अहम दायित्व है, लेकिन उनकी मुकम्मल सुरक्षा मेट्रो या बस में मुफ्त यात्रा की सुविधा में नहीं, बल्कि अन्य सुरक्षा उपायों के साथ टिकट खरीदकर उसमें सफर करने की आर्थिक हैसियत हासिल कराने में है। हकीकत में मुफ्त तरीकों से हम एक ऐसे समाज को जन्म देंगे जो उत्पादक नहीं बनकर आश्रित और अकर्मण्य होगा और इसका सीधा असर देश की पारिस्थितिकी और प्रगति, दोनों पर पड़ेगा। सवाल यह खड़ा होता है कि इस अनैतिक राजनीति का हम कब तक साथ देते रहेंगे? इस पर अंकुश लगाने का पहला दायित्व तो हम जनता पर ही है।

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