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पंजाब की राजनीति से लगता है कांग्रेस और अकाली दल देर तक के लिए विदा हो गए हैं

 अजय कुमार

राजनीतिक विश्लेषकों ने चेतावनी देनी शुरू कर दी थी कि विधानसभा चुनावों के बीच कांग्रेस के भीतर पंजाब की राजनीति में कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह किसी और को देना एक नासमझी भरा फैसला होगा, लेकिन इन आवाजों को सुना ही नहीं गया।

पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे। यह तो तय माना जा था कि कांग्रेस की सत्ता जा रही है और आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने वाली है। कांग्रेस में पिछले दो-तीन वर्षों से जिस तरह से पार्टी नेताओं के बीच आपस में सिर-फुटव्वल चल रहा था, उसकी यह परिणति होनी ही थी, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं था। लेकिन आप की इतने शानदार तरीके से वापसी होगी, इसका अनुमान तो बड़े से बड़ा राजनैतिक पंडित नहीं लगा पाया था। कांग्रेस ने एक दलित को मुख्यमंत्री बनाकर जो सियासी दांव चला था, वह भी काम नहीं आया। कांग्रेस की हार के सबसे बड़े खलनायक की बात की जाए तो सबसे पहला नाम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू का आता है, जो पहले सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह की नाक में दम करे रहे और बाद में उनकी जगह बनाए गए सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को भी सिद्धू ने काम नहीं करने दिया। इससे भी बड़ी बात यह थी कि सिद्धू के सिर पर गांधी परिवार का हाथ था, जो सब कुछ जानते-समझते और देखते हुए भी चुप्पी साधे रहा। गांधी परिवार की तरफ से कभी यह प्रयास ही नहीं किया गया कि पंजाब कांग्रेस का विवाद सुलझ सके।

पंजाब में कांग्रेस की बुरी हार पर उसके सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने हार का ठीकरा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू पर फोड़ते हुए उन्हें आत्मघाती हमलावर बताया। वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने यहां तक कह दिया कि पंजाब की हार नेताओं की नाकामी है। इस दौरान उन्होंने सिद्धू की नाराजगी पर भी कहा कि कांग्रेस के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि जब केंद्रीय नेतृत्व (प्रियंका गांधी) एक मंच पर बैठी हों और प्रदेश अध्यक्ष (नवजोत सिद्धू) लोगों को संबोधित करने से इनकार कर दें।
कांग्रेस की दुर्दशा की घंटी तभी से बजने लगी थी जब नवजोत सिद्धू भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। उसी समय से राजनीतिक विश्लेषकों ने चेतावनी देनी शुरू कर दी थी कि विधानसभा चुनावों के बीच कांग्रेस के भीतर पंजाब की राजनीति में कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह किसी और को देना एक नासमझी भरा फैसला होगा, लेकिन इन आवाजों को सुना ही नहीं गया। थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो पता चलता है कि पंजाब में एक स्वतंत्र नेता के रूप में राज कर रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह को रोकने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका ने नवजोत सिंह सिद्धू को लगभग खुली छूट दे रखी थी। सिद्धू ने कैप्टन अमरिंदर सिंह पर लगभग एक साल तक बिना किसी रोक-टोक, अधूरे वादों और भ्रष्टाचार को लेकर हमला बोला। यहां तक कि सिद्धू ने एक यूट्यूब चैनल तक लॉन्च कर दिया और उस पर कैप्टन अमरिंदर सरकार की आलोचना करने लगे। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सरकार के खिलाफ़ सत्ता विरोधी लहर का माहौल बनाया और फिर चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री के रूप में पदोन्नत होने के बाद भी इसे आगे बढ़ाया। इतना ही नहीं सिद्धू के पाकिस्तानी नेताओं से संबंध और उनके पक्ष में दिए गए बयानों को भी गांधी परिवार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया।
उधर पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में कांग्रेस की हार के बाद सोनिया गांधी का बड़ा बयान सामने आया है। सोनिया गांधी ने कहा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का बचाव करना उनकी गलती थी। बता दें कि अमरिंदर सिंह ने चुनाव से ठीक पहले पंजाब सीएम के पद से इस्तीफा दे दिया था और कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी थी। इसके बाद उन्होंने नई पार्टी (पंजाब लोक कांग्रेस) बनाई और बीजेपी संग गठबंधन करके पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 लड़ा, हालांकि, पार्टी कोई कमाल नहीं कर सकी। कांग्रेस की CWC मीटिंग में रविवार को बात उठी थी कि अगर कैप्टन को पद से हटाया जाना था तो पहले हटाना था। इस पर सोनिया गांधी ने कहा कि मैं कैप्टन साहब को बचाती रही, यह मेरी गलती थी।
बहरहाल, पंजाब में इतिहास लिखा गया है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक साथ कई रिकॉर्ड बना दिए। आम आदमी पार्टी ने पंजाब की 117 में से 92 सीटों पर जीत हासिल करके किसी भी दूसरी पार्टी को मुकम्मल विपक्ष बनने तक का मौका नहीं दिया। यह 56 साल में किसी एक पार्टी की सबसे बड़ी जीत है, जबकि आजादी के बाद आप ने सूबे में तीसरी सबसे बड़ी जीत हासिल की है।
पंजाब में सियासी फेरबदल के कयास तो पहले से थे, लेकिन नतीजों ने बदलाव की नई परिभाषा तय कर दी है। यहां आप ने न सिर्फ बहुमत के आंकड़े को पीछे छोड़ दिया, बल्कि विनिंग सीट्स का ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया कि कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा समेत उसके सहयोगी मिलकर भी आप के लगभग चौथाई हिस्से तक ही पहुंच पा रहे हैं।
1966 में हरियाणा के अलग होने के बाद पिछले 56 साल में यह पंजाब में किसी एक राजनीतिक पार्टी की सबसे बड़ी जीत है। इससे पहले, 1992 में पंजाब में आतंकवाद के दौरान कांग्रेस ने अपने बूते 87 सीटें जीती थीं, लेकिन उस समय शिरोमणि अकाली दल ने चुनाव का बहिष्कार किया था। इसके बाद 1997 के चुनाव में अकाली दल और BJP ने मिलकर 93 सीटें जीती थीं। उस समय अकाली दल को 75 और BJP को 18 सीटों पर जीत मिली थी। पंजाब में बंपर जीत हासिल करने वाली आप वोट प्रतिशत के मामले में भी सबसे आगे है। उसे कुल पड़े वोट में से 44% हिस्सा मिला। वहीं, कांग्रेस को 23% वोट मिले। इधर, अकाली दल ने 18.4% वोट तो हासिल किए, लेकिन पार्टी कुल 5 सीटें भी नहीं जीत पाई।

शानदार जीत से गदगद पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर पंजाब में मोहल्ला गवर्नेंस के संकेत दिए हैं। भगवंत मान ने विधायक दल की बैठक में साफ कहा कि विधायक और अधिकारी अपनी गतिविधियों को गांव की ओर शिफ्ट करें। आम आदमी पार्टी को वोट देने वालों को उनके दरवाजे पर सुविधाएं दी जाएं। पंजाब के मुख्यमंत्री भले ही भगवत मान बने, लेकिन यह भी तय हो गया है कि सुपर सीएम के तौर पर अरविंद केजरीवाल का सिक्का पंजाब में चलता रहेगा। इसकी बानगी तब देखने को मिली जब पंजाब जीतकर दिल्ली पहुंचे भगवंत मान ने पैर छूकर केजरीवाल का आशीर्वाद लिया।
उधर पंजाब में विधायक दल की बैठक में भगवंत मान ने कहा कि मैं इसे लेकर सख्त हूं कि आप चंडीगढ़ में नहीं रहोगे। हम वार्ड और मोहल्ला की सरकार देंगे। पंजाब सरकार में मुख्यमंत्री समेत कुल 17 मंत्री बनाए जाने हैं। भगवंत मान ने विधायकों को लॉबिंग नहीं करने का संदेश दिया और कहा कि मैं सभी विधायकों को मंत्री समझकर ही बर्ताव करूँगा। आम आदमी पार्टी की सरकार कमर कसने जा रही है, पंजाब को आइडियल प्रदेश बनाकर आम आदमी पार्टी अन्य राज्य में भी अपनी पार्टी का विस्तार करने का सपना पाले हुए है।

साभार प्रस्तुति

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