मनमोहन का ‘मौन’ और नरेन्द्र मोदी की ‘चुप्पी’

cl-1_0डा. मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी में क्या अंतर है? इतना कि डा. मनमोहन सिंह मित्रों से भी लाभ नही उठा पाए जबकि नरेन्द्र मोदी शत्रुओं से भी लाभ उठाने की कला में निपुण हैं। डा. मनमोहन सिंह के विषय में यह तथ्य सुविख्यात है कि उन्हें राजनीति में लाकर ऊंचाईयों तक पहुंचाने में अमेरिका का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। इसलिए डा. सिंह अमेरिका के प्रति कृतज्ञ रहे और यही कारण था कि कृतज्ञतावश वह अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने ‘अपना आपा’ भूल जाते थे। उन्हें ये पता ही नही रहता था कि वह एक महत्वपूर्ण देश के प्रधानमंत्री हैं और जिस देश का वह प्रतिनिधित्व कर रहे हैं कुछ उसके भी अपने हित हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हित का अर्थ राष्ट्रीय स्वाभिमान और अस्मिता से होता है। कृतज्ञ मनमोहन सिंह को अमेरिका ने अधिक तरजीह नही दी, इसलिए उसके लिए भारत उसका एक ‘पिछलग्गू देश’ बन गया। अमेरिका ने ये मान लिया कि वह भारत को जब जहां और जैसे प्रयोग करना चाहेगा, कर लेगा।
फलस्वरूप भारत के लिए कई अवसर ऐसे आये जब उसे या तो उपेक्षा का तिरस्कार झेलना पड़ा या देश के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों को वीजा पर रोक-टोक या अमेरिकी हवाई अड्डों पर कड़ी चैकिंग की अपमानजनक स्थितियों से निकलना पड़ा। मोदी भी उन्हीं व्यक्तित्वों में से एक रहे थे। डा. मनमोहन सिंह अपने मित्र से भी राष्ट्रीय स्वाभिमान को बचाने में असफल रहे। अब मनमोहन सिंह के स्थान पर मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: अमेरिका से अपने वीजा संबंधी कोई बातचीत नही की है। इसे न करने में ही उन्होंने विश्वशक्ति को ये अहसास करा दिया है कि भारत का अपना कोई स्वाभिमान है, अपनी कोई निजता है, अस्मिता है। अत: वे उस स्वाभिमान के साथ निजता और अस्मिता के साथ कोई समझौता नही करेंगे और अमेरिका के बिना भी देश को आगे लेकर चलेंगे। मोदी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ मस्ती और बेफिक्री भरे अंदाज में देश की बागडोर संभाली और पूर्ण गंभीरता के साथ देश की ‘बिगड़ी तस्वीर’ को सुधारने में लग गये। अब ‘राजनीतिज्ञ से एक चिकित्सक’ बने मोदी को ‘ऑप्रेशन थियेटर’ में लगे देख अमेरिका को आश्चर्यजनक परेशानी होने लगी। मोदी ने अरूणांचल प्रदेश में ब्रह्मोस मिसाइल तैनात कर दी, कोई शोर नही मचाया। पूर्वाेत्तर भारत में बढ़ रहे ईसाई मिशनरियों के हस्तक्षेप को और चीन की गतिविधियों को समझकर पूर्वोत्तर के लिए एक राष्ट्रवादी चैनल ‘अरूणप्रभा’ और पूर्वाेत्तर में सडक़ों का जाल बिछाने के लिए अच्छी खासी धनराशि का बजट में प्राविधान कर दिया इस पर भी कोई शोर नही किया। दिल्ली में 1965 के भारत पाक युद्घ के पश्चात से यूएनओ की एक टीम मध्यस्थता के नाम पर पड़ी भारत के पैसों से मौजमस्ती कर रही थी, यद्यपि 1972 में भारत-पाक ने अपने हर मसले को द्विपक्षीय आधार पर निपटाने के लिए शिमला-समझौता भी कर लिया था, परंतु ये टीम नही गयी। मोदी ने अपनी प्राथमिकताएं तय कीं और ‘आप्रेशन थियेटर’ में रहते-रहते ही अपने साथियों को निर्देश दिया कि ‘मरीज’ की भलाई के लिए इस टीम को देश से बाहर करो। टीम बाहर हो गयी।
ऐसे एक नही कई निर्णय हमने देखे और हमने ये भी देखा कि ‘चिकित्सक मोदी’ को अपने यहां बुलाने के लिए बड़े देशों में होड़ मच गयी। इसमें चीन, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, सहित कई देश सम्मिलित हैं। अब मोदी ब्रिक्स सम्मेलन से लौटे हैं और वहां वह अपने आपको आकर्षण का केन्द्र बनाने में सफल रहे हैं। उनकी सफलता से देश के स्वाभिमान के बुझते दीपक में फिर से तेल पड़ गया है, और वह फिर से जगमगाने लगा है। इस जगमगाते दीपक को देखकर अमेरिका मोदी के स्वागत के लिए तैयारियां करने लगा है। आगामी सितंबर माह में एक विशेष कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मोदी अमेरिका जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का रखवाला होने का दम भरने वाला अमेरिका अब अपने किये पर पछता रहा है, और अपने कथित नियमों में ढिलाई देकर कह रहा है कि वह भारत के नये नेतृत्व के साथ काम करने को तैयार है। पहली बार देश की जनता ने अपना नेता अपने आप चुना है तो उसका सुखद परिणाम भी सामने आ गया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘दुनिया के दादा’ हमारी बात को सुनने को कितने आतुर हैं? मोदी एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह अमेरिका की आतुरता को व्याकुलता की सीमा तक बढ़ाने में लगे हैं, इसलिए अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देकर भी अमेरिका जाने के प्रति अपने उतावलेपन को वह नही दर्शा रहे हैं। वह चुप हैं और जानते हैं कि शत्रु से चुप रहकर कैसे जीता जाता है? शत्रु उनकी चुप्पी के सामने अपनी चतुराई भूल रहा है, जबकि यही अमेरिका ‘मनमोहन के मौन’ के ऊपर बैठकर इतराया करता था। पर अब उसे पता चल गया है कि ‘चुप्पी’ जब पूर्णत: सावधान की मुद्रा में धारण की जाती है तो उसमें और ‘मौन’ में कितना अंतर हो जाता है। ‘मौन’ को जीतने वाला ‘चुप्पी’ को तोड़ भी नही पा रहा है, इसे कहते हैं- राष्ट्रहितों के प्रति पूर्णत: सजग और सावधान नेतृत्व। मासूम गाजियाबादी ने सच ही तो कहा है-
उसे किसने इजाजत दी गुलों से बात करने की,
सलीका तक नही जिसको चमन में पांव रखने का।

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