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नौकरी की मजबूरी

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डॉ0 वेद प्रताप वैदिक

न्यायमूर्ति मार्कन्डेय काटजू के रहस्योद्घाटन से किसकी प्रतिष्ठा पर आंच आई हैं? क्या कांग्रेस पार्टी की? क्या सरकार की? क्या तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की, जिन्हें एक भ्रष्ट न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त करने की सिफारिश करनी पड़ी थी? सच्चाई तो यह है कि हमारी राजनीति के हमाम में सब नंगे पकड़े जाते हैं। कोई भी जज, कोई भी सरकार और कोई भी पार्टी आज इस स्थिति में नहीं है कि वह अपने सीने पर हाथ रखकर कह सके कि वह जो भी निर्णय करती है, जो भी नियुक्ति करती है, वह सदा गुण-दोष को जांचकर करती है और उसमें देश का हित सर्वोपरि होता है।

मद्रास हाईकोर्ट के एक जज को सर्वोच्च न्यायालय में यह जानते हुए नियुक्त किया गया था कि वह भ्रष्ट है। पहले उसकी नियुक्ति को जजों के ‘कालेजियम’ ने रद्द कर दिया था लेकिन कांग्रेस सरकार के जोर देने पर उसी जज को नियुक्त कर दिया गया, क्योंकि उस तमिल जज की पैरवी द्रमुक पार्टी ने जमकर की थी। इसी तमिल पार्टी के सहारे ही कांग्रेस की गठबंधन सरकार चल रही थी। यदि द्रमुक के आग्रह को मनमोहनसिंह सरकार नहीं मानती तो शायद वह खुद ही गिर जाती। अतः उसने अपनी जान बचाने के लिए यह बेहतर समझा कि अपनी एक उंगली कटा ले। उसे पक्का विश्वास था कि उसकी इस कटी उंगली को कोई देख नहीं पाएगा।

सचमुच पिछले दस साल में इसे कोई नहीं देख पाया। काटजू ने मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए और बाद में भी इसे सार्वजनिक नहीं किया। तब मुख्य न्यायाधीश रमेशचंद्र लाहौटी इसे सार्वजनिक क्यों करते? अब इसे सार्वजनिक करने की कौनसी मजबूरी काटजू को आन पड़ी थी, यह द्रमुक के करुणानिधि पूछ रहे हैं? वे प्रकारांतर से पूछ रहे हैं कि कहीं काटजू प्रेस परिषद के अध्यक्ष की अपनी नौकरी बचाने के लिए तो यह नहीं कर रहे हैं? कांग्रेस सरकार की पोल खुलने पर मोदी सरकार खुश क्यों नहीं होगी? यह सच हो सकता है लेकिन दो-टूक बातें कहने वाले काटजू को यह श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने न्यायपालिका में होने वाले भ्रष्टाचार को उघाड़ कर रख दिया है, वह भी ठोस उदाहरण देकर!

न्यायमूर्ति लाहौटी की सज्जनता और ईमानदारी पर कोई शक भी नहीं कर सकता है। लेकिन नौकरी की मजबूरी जैसी काटजू की रही है, वैसी ही लाहौटी की भी रही है। लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कोई मुख्य न्यायाधीश, कोई राष्ट्रपति, कोई प्रधानमंत्री और कोई मंत्री क्या यह दावा कर सकता है कि उसने अपने स्वामियों या नियुक्त करने वालों की अनुचित बात को सिरे से रद्द किया है? ऐसी हिम्मत करने वाला किसी पद को प्राप्त करने की कभी कोई कोशिश क्यों करेगा? हर पद आखिरकार एक नौकरी ही होता है। मैंने जिन पदों के नाम ऊपर गिनाए हैं, ये सब वास्तव में नौकरियां ही हैं। ये बिना खुशामद के प्रायः नहीं मिलतीं। यदि इन नौकरियों पर भी नियुक्ति शुद्ध गुण-दोष के आधार पर होंगी तो सारे निर्णय भी गुण-दोष के आधार पर होंगे। वहां किसी प्रधानमंत्री या बादशाह का दबाव भी निरर्थक होगा।

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