Categories
भारतीय संस्कृति

प्राचीन काल की तरह भारत को शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाएंगे तो छात्र बाहर नहीं जाएंगे

 प्रह्लाद सबनानी

एक अन्य अनुमान के अनुसार न केवल यूक्रेन बल्कि आज विश्व के लगभग 85 देशों में 11 लाख से अधिक भारतीय शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रतिवर्ष जाते हैं और इन छात्रों की पढ़ाई पर देश की लगभग 10,000 करोड़ की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा (अमेरिकी डॉलर) खर्च होते हैं।

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी एवं महान संस्कृति मानी जाती है एवं भारत में शिक्षा को अत्यधिक महत्व देकर इसे प्रकाश का स्त्रोत मानकर मानव जीवन के विभिन क्षेत्रों को आलोकित किया जाता रहा है एवं यहां आध्यात्मिक उत्थान तथा भौतिक एवं विभिन्न उत्तरदायित्वों के विधिवत निर्वहन के लिये शिक्षा की महती आवश्यकता को सदा स्वीकार किया गया है। इस नाते प्राचीन काल से लेकर भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सभ्यताओं में से एक मानी जाती रही है।

भारत के विभिन्न वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों में यह बताया भी गया है कि ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है जो उसे समस्त तत्वों के मूल को जानने एवं जीवन की समस्त कठिनाईयों तथा बाधाओं को दूर करने में सहायता प्रदान करता है तथा सही कार्यों को करने की विधि बताता है। भारत में ज्ञान को मोक्ष का साधन भी माना गया है। प्राचीन भारतीयों का यह दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गयी बुद्धि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है।
प्राचीन भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम में 4 वेद, 6 वेदांग, 14 विधायें, 18 शिल्प, 64 कलायें, आदि समाहित होते थे। चीन के हुएनसांग तथा अल्वेरूनी द्वारा लिखित साहित्य के माध्यम से उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्राचीन काल में भारत में ज्योतिष की शिक्षा एवं व्याकरण का बहुत अधिक प्रचलन था। विभिन्न राजदरबारों में ज्योतिषियों को प्रमुख स्थान दिया जाता था तथा विभिन्न शिक्षा केन्द्रों में धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों के साथ ही लौकिक विषयों की शिक्षा भी सुचारू रूप से प्रदान की जाती थी। तक्षशिला, पाटलीपुत्र, कान्यकुब्ज, मिथिला, धारा, तंजोर, काशी, कर्नाटक, नासिक आदि शिक्षा के प्रमुख वैश्विक केंद्र थे जहां विभिन्न देशों से छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। कालांतर में नालन्दा विश्वविद्यालय (450 ई), वल्लभी (700 ई), विक्रमशिला (800 ई), आदि शिक्षण संस्थाएं भी स्थापित हुई थीं। तक्षशिला विश्वविद्यालय (400 ई के पूर्व) विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में से एक रहा है एवं चाणक्य इस विश्वविद्यालय के आचार्य रहे हैं। इन वैश्विक शिक्षा केंद्रों में विद्यार्थी अध्ययन करके स्वतन्त्र रूप से जीविकोपार्जन करने हेतु धन अर्जन करने योग्य बन जाते थे।

परंतु पिछले 1000 वर्षों के दौरान अरब से विदेशी आक्रांताओं एवं अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय शिक्षा पद्धति को तहस नहस कर दिया गया एवं तक्षशिला, नालंदा एवं पाटलीपुत्र जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में स्थापित भव्य पुस्तकालयों में जमा लाखों पुस्तकों को जला दिया गया एवं भारतीयों में यह भावना कूट कूट कर भर दी गई कि भारतीय संस्कृति तो जाहिलों की संस्कृति है एवं अरबी एवं अंग्रेजी संस्कृति कहीं अधिक महान हैं। इस सबका परिणाम यह हुआ कि भारतीय शिक्षा पद्धति एक तरह से खत्म ही हो गई। हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत में भारतीय शिक्षा पद्धति को पुनः प्रतिस्थापित किए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए थे परंतु ऐसा कुछ हुआ नहीं और आज इसका परिणाम यह हुआ है कि आज कई भारतीयों द्वारा विदेशों में जाकर शिक्षा ग्रहण की जा रही है। यह जानकर आश्चर्य होता है कि यूक्रेन जैसे छोटे से देश में आज लगभग 18,000 से अधिक भारतीय डॉक्टर बनने हेतु वहां पर पढ़ाई कर रहे हैं।
एक अन्य अनुमान के अनुसार न केवल यूक्रेन बल्कि आज विश्व के लगभग 85 देशों में 11 लाख से अधिक भारतीय शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रतिवर्ष जाते हैं और इन छात्रों की पढ़ाई पर देश की लगभग 10,000 करोड़ की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा (अमेरिकी डॉलर) खर्च होते हैं। आजादी के बाद के लगभग 67 वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र, चिकित्सा सहित, पर विशेष ध्यान ही नहीं दिया गया, इसके कारण यूक्रेन जैसे छोटे से देश में इतनी बड़ी संख्या में भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण करने के लिए जा रहे हैं एवं युद्ध की स्थिति होने पर भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। यह तो तब है जब पिछले 7 वर्षों के दौरान देश में चिकित्सा स्नातक एवं स्नातकोत्तर सीटों की संख्या में 80 प्रतिशत की वृद्धि की गई है एवं मेडिकल महाविद्यालयों की संख्या 54 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 596 तक पहुंच गई है। अब तो देश के प्रत्येक जिले में कम से कम एक चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित करने हेतु युद्ध स्तर पर कार्य किया जा रहा है। दूसरे, भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षा बहुत महंगी है, इसके कारण भी भारतीय यूक्रेन जैसे छोटे छोटे देशों की ओर रूख कर रहे हैं। भारत में जहां निजी क्षेत्र के चिकित्सा महाविद्यालयों में एमबीबीएस का कोर्स करने के लिए 80-100 लाख रुपए खर्च होते हैं वहीं यूक्रेन जैसे छोटे देशों में यह कोर्स पूरा करने में 20-30 लाख रुपए ही खर्च होते हैं।

भारत में चिकित्सा का कोर्स पूरा करने के लिए सरकारी एवं निजी क्षेत्र के चिकित्सा महाविद्यालयों में आवेदक उम्मीदवारों की तुलना में उपलब्ध सीटों की संख्या बहुत कम है। चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करने के लिए भारत में लगभग 16 लाख छात्र परीक्षा देते हैं जबकि उपलब्ध सीटों की संख्या लगभग 140,000 के आसपास है। इस प्रकार इतनी बड़ी संख्या में जिन छात्रों का चयन नहीं हो पाता है वे यूक्रेन जैसे छोटे छोटे देशों की ओर चिकित्सा क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाने को मजबूर होते हैं।   
यूक्रेन की घटना ने भारत में शिक्षा क्षेत्र की सोचनीय स्थिति को उजागर कर दिया है। चिकित्सा महाविद्यालयों का कम होना, चिकित्सा के क्षेत्र में सीटों की संख्या कम होना, शिक्षा का तुलनात्मक रूप से बहुत महंगा होना, आदि कमियां मुख्य रूप से उजागर हुई हैं। इन कमियों को तुरंत दूर कर शिक्षा के क्षेत्र को वापस पटरी पर लाकर देश के आर्थिक विकास को भी गति दी जा सकती है। कई विकसित देशों जैसे अमेरिका, कनाडा, यूके, जर्मनी आदि में पूरे विश्व से लाखों की संख्या में विद्यार्थी पढ़ने के लिए जाते हैं एवं इन देशों में भारी राशि प्रतिवर्ष खर्च करते हैं इससे इन देशों की अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। अकेले अमेरिका एवं कनाडा में ही प्रतिवर्ष दो लाख से अधिक विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने हेतु केवल भारत से पहुंचते हैं, इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में लगभग एक लाख, ब्रिटेन में लगभग 50,000 विद्यार्थी प्रतिवर्ष शिक्षा अर्जन के लिए भारत से पहुंचते हैं। इसके ठीक विपरीत, प्राचीन भारत में विदेशों से विद्यार्थी शिक्षा अर्जन के लिए भारत आते थे। क्या भारत में शिक्षा व्यवस्था में सुधार कर पुनः विदेशों को भारत में शिक्षा अर्जन हेतु आकर्षित नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए हमें भारत की शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने होंगे और भारतीय संस्कृति की मजबूत जड़ों की ओर पुनः लौटना होगा। विकसित देशों में बसे लोग आज भौतिकवादी नीतियों से बहुत परेशानी महसूस कर रहे हैं। आज अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों की आधी से ज़्यादा आबादी मानसिक रोग से पीड़ित है और वे इन मानसिक बीमारियों से निजात पाना चाहते हैं। जिसका हल केवल भारतीय प्राचीन संस्कृति को अपना कर ही निकाला जा सकता है। 

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betnano
betnano
betnano
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpas giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
hitbet giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş