पश्चिमी बंगाल में हुए म्युनिसिपल चुनावों के परिणाम क्या करते हैं संकेत ? – इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार      

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    ——————————————— यदि हम अब से पूर्व हुए २०१५ के पश्चिम बंगाल म्यूनिसिपल चुनाव के परिणाम पर जांच करें तो पता चलता है कि उस समय  २२५१ म्यूनिसिपल वार्ड में लेफ़्ट ३१०, कांग्रेस-१९०, भाजपा- ८१  निर्दलीय-९० को सीटें प्राप्त हुई थी। उत्सव में संपन्न हुए यह चुनाव स्वाभाविक लग रहे थे क्योंकि प्रतिपक्ष के पास कुल ७७ विधानसभा की सीटें थीं। इन विधानसभा सीटों में से कांग्रेस के पास ४२ और लेफ़्ट के पास ३५ थीं। २०२२ में  अनुष्टीत  म्यूनिसिपल चुनाव में भाजपा -६३, कांग्रेस-५८,लेफ़्ट-५५, निर्दलीय-२०। अन्य निर्दलीय विद्रोही टीएमसी थे।
  इस निर्वाचन में एक बात बड़ी विचित्र लगी कि टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने चुनाव फलो के आ जाने  पर यह टिप्पणी की कि बिपक्ष के पास न तो कार्यकर्ता थे न ही  कैंडिडेट।टीएमसी प्रवक्ता की यह टिप्पणी सत्य से कोशों दूर है। क्योंकि ५० म्यूनिसिपल कारपोरेसन में  ९ महीना पहले संपन्न हुवे बिधान सभा के चुनावों में ५० भाजपा के विजयी विधायक थे। उनके पास कार्यकर्ता नही होते व मतदाताओं का समर्थन नही प्राप्त होता तो भाजपा के ये ५० विधायक जीत नही सकते थे। हाँ, एक अन्तर ज़रूर था कि बिधान सभा के चुनाव पश्चिम बंगाल चुनाव आयोग के अंतर्गत सम्पन्न नही होकर भारत चुनाव आयोग के अंतर्गत सम्पन्न हुवे थे।
     टीएमसी की इस तरह जीत पर यही कहा जा सकता है ८८०० शिकायतों के बावजूद २ बूथ पर खाना पूर्ति का उपचुनाव करवाने की यह जीत निर्वाचन अधिकारी – राज्य पुलिस -टीएमसी गुंडावाहिनी की जीत है। क्योंकि जहां भाजपा के ५० विधायक थे उनमें १००० वार्ड में ४०वार्ड में ही वे सफल हो सके, ५० विधायक जितना भी नही पा सके। उत्तरबंगाल में जहा भाजपा के १७ विधायक थे व २५५ वार्ड में मात्र ८ पार्षद भाजपा के जीत पाये। जितने विधायक थे उतने भी नही जीत पाये। एक ताहेरपुर म्यूनिसिपल कारपोरेशन  में जहाँ टीएमसी जीत नही पाई वहाँ के थानाधिकारी को वहाँ से हटा दिया जाना.  आगामी पंचायत चुनाव में पुलिस को क्या करना है ? – इसका संकेत राज्य के पुलिस मन्त्री ने उसी तरह दे दिया जब म्यूनिसिपल चुनाव के पहले भरी सभा में पूर्व मिदनापुर के पुलिस सूपरिंटेंडेंट को आदेश दिया था। आगामी पंचायत चुनाव भी राज्य के म्यूनिसिपल चुनाव की तरह प्रहसन होंगे।
  पश्चिम बंगाल म्युनिसिपल चुनावों में जो कुछ भी हुआ है उसका एक साफ संकेत है कि वहां लोकतंत्र टीएमसी के गुंडाराज में कतई सुरक्षित नहीं है। इस बात को सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से लेना चाहिए। किसी भी प्रदेश को आप किसी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी के हवाले नहीं कर सकते। लोकतंत्र तभी सुरक्षित रह सकता है जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप कार्य संपन्न कराए जाएं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री किसी भी तरीके से लोकतंत्र का गला घोटने में संकोच नहीं करती हैं । उन्हें सत्ता चाहिए और जनादेश की उन्हें तनिक भी परवाह नहीं है । अब समय आ गया है जब देश के चुनाव आयोग को कठोरता के साथ ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाने ही होंगे। हमारी मांग है कि केंद्र सरकार भी अपनी शक्तियों का प्रयोग कर चुनाव सुधार की दिशा में कदम उठाए अन्यथा पश्चिम बंगाल की स्थिति आने वाले चुनावों में बहुत ही खतरनाक हो जाएगी। क्योंकि ऐसे संकेत देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा कर देंगे।

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