आत्म मुग्धावस्था देती है खुमारी और भ्रम

aatm-saadhna1– डॉ. दीपक आचार्य
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हममें से खूब सारे लोगों की दो श्रेणियां मशहूर हैं। एक वे हैं जो कुछ न कुछ ज्यादा से ज्यादा पा जाने के फेर में लगातार कोल्हू के बैल या श्वानों की तरह हड़बड़ी में इधर-उधर दौड़-भाग कर रहे हैं, न रातों को नींद आती है, न दिन का कोई चैन।
भोग-विलास, संसाधनों और मुद्राओं के बाजार में अपने आपको सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित कारोबारी साबित करने के फेर में हर क्षण भिड़े हुए हैं।  दूसरे वे हैं जो करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन भगवान ने न अवसर प्रदान किए हैं और न सामथ्र्य। ऎसे में जितना बन पड़ता है उतना करते हैं और इसी में खुश हैं। इन सभी के अपने-अपने मोहपाश और इन्द्रधनुष हैं जिनके बीच जीते हुए इन्हें हर क्षण यही महसूस होता है कि उन्होंने सब कुछ पा लिया है और जो पा रहे हैं वही दुनिया का सच है।
ये लोग अपने पास जो कुछ है उसी में मस्त हैं। हालांकि इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि ये लोग संतोषी या संतृप्त हैं क्योंकि बहुत कुछ पा जाने की हड़बड़ाहट इनमें भी कोई कम नहीं है लेकिन इन्हें ऎसे झुनझुने हाथ लग गए हैं कि ये उन्हीं के साथ मस्त हो गए हैं इसलिए इनके अपने दायरे हो चले हैं।
जब इंसान के पास पाने के लिए समय कम होता है और काम ज्यादा उस समय दो ही रास्ते होते हैं। एक तो तनावोें के बीच जीते हुए सारे के सारे लक्ष्यों को पाने का उतावलापन, और दूसरा जितना हो सके उतने में ही मस्ती पाने के लिए कोशिशें करते रहना।
आजकल संचार सुविधाओं ने पूरी दुनिया मुट्ठी में कर डालने के साथ ही संसार को कुछ फीट की दीवारों में इतना कैद कर लिया है कि वह कभी टीवी के सामने बैठकर मस्ती के दरिया में नहाने लग जाता है और खुशी के मारे झूमने लगता है। कभी मोबाइल पर फेसबुक, व्हाट्सऎस या दूसरे-तीसरे संचार सेतुओं को चलाता हुआ मस्त हो उठता है। कभी चंद लोगों के साथ जिंदगी गुजार देता है और अपनी-परायी, सुख-दुःख की बातें कहता-सुनता हुआ समय बीता देता है।
आजकल आदमी के पास मनोरंजन और टाईमपास के संसाधनों का इतना जख्ीारा जमा हो गया है कि उसे लगता ही नहीं कि बाहर भी कुछ दुनिया है। उसे लगता है कि उसका सारा संसार चंद फीट की दीवारों और ढेरों उपकरणों के बीच ही बसा हुआ है और यहीं रहकर वह अपने आपको कभी चन्द्रमा पर पाता है, कभी मंगल पर होने का अहसास भी कर लेता है।
हर इंसान की फितरत होती है कि वह मन-मस्तिष्क से खाली हो, ऎसे में उसे जब उन्मुक्त  अभिव्यक्ति के कई सारे माध्यम मिल जाते हैं तब बेखौफ और उदार होकर वह अपनी सारी अनकही बाहर कह डालता है, और मुक्त हो जाता है चित्त के भीतर टकराते रहने वाले झंझावातों से।
आदमी के लिए सर्वाधिक खराब क्षण वह होता है जब वह अपने मन की बात को किसी से कह नहीं पाता, हालांकि इन बातों का न कोई तुक होता है न कोई वजन। लेकिन एक बार बाहर निकल जाने के बाद आदमी हलका महसूस करता है और यही हलकापन उसे ताजगी और नवीनता का अहसास कराता है।
कई लोग मौके-बेमौके बोलकर सब कुछ बाहर निकाल दिया करते हैं और रिक्त होकर मस्त हो जाते हैं, हमारे जैसे कई सारे लोग हैं जो लिखकर भडास बाहर निकाल दिया करते हैं और रिक्तता का अनुभव कर मस्त हो जाते हैं।
इस दृष्टि से आजकल फेसबुक और दूसरी तमाम प्रकार की सोशल साईट्स आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े और खास सभी के लिए सुकून देने वाली सिद्ध हो रही हैं जहाँ इंसान के लिए न विषयों की कोई सीमा है, न कोई वर्जना। जो जितना चाहे उतना वमन-विरेचन कर सकता है और अपने आपको हलका कर लेने का अभ्यास कर लेता है।
कई लोगों को इन सोशल साईटों ने तनाव मुक्त कर दिया है और खूब सारे लोग ऎसे हैं जिनके लिए घर बैठे टाईमपास और मस्ती का आनंद लूटने का इससे बढ़िया मंच कोई और हो ही नहीं सकता। बड़े-बड़े पत्रकारों और लेखकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के लिए तो ये मंच स्वर्णिम अवसर हैं जहां जो चाहो लिख लो, तत्काल पोस्ट कर लो और छपने का सुख भी तुरन्त पा ही लो। वरना कईयों के लिए जिंदगी भर यह तनाव बना रहता आया है कि उन्हें प्रकाशन या प्रसारण में स्थान अथवा मंच नहीं मिल पाता। यह मलाल भी कई सारे लोगों में तनाव का एक कारण रहता आया है। पर अब सब कुछ बदल गया है।
इधर गर्भाधान उधर प्रसूति का ऎसा सुख तो शायद देवताओं के भाग्य में नहीं रहा होगा कभी।  यही कारण है कि हम सारे के सारे लोग दूसरे सारे काम-धंधों को छोड़कर आत्म मुग्धावस्था पा चुके हैं। इसी को भगवानश्रीकृष्ण ने गीता में शायद स्थितप्रज्ञ कहा है।
यह आत्ममुग्धावस्था कई सारे तनावों और बाहरी आशाओं-आकांक्षाओं तथा अपेक्षाओं से हमें मुक्त रखती है। यह संभव है कि हमें अपने आपके बारे में भ्रम भी हो जाए लेकिन आत्ममुग्धावस्था का फायदा यह होता है कि हम सारे के सारे लोग अपने आप में ही खोये रहते हैं, किसी और के लिए कोई समस्या नहीं बनते।
हमारी जो इच्छाएं और वैचारिक विरेचन-वमन होता है वह निरन्तर होता रहता है इसलिए रोजाना हम दिल-दिमाग से रोजाना ही रिक्त हो जाया करते हैं और यही कारण है कि हमें ताजगी और मुक्ति का अहसास बना रहता है।
घर वालों के लिए भी हमारी आत्ममुग्धावस्था इसलिए सुकूनदायी होती है क्योंकि हम हमारे काम में ही इतने रमे रहते हैं कि घर वालों को छोटी-छोटी बातों के लिए कहने और सुनाने अथवा गुस्सा करने की हमारी आदत में काफी कमी हो जाती है।
घर वालों को यह भी संतोष रहता ही है हम कहीं बाहर नहीं होकर उनके आस-पास ही कहीं रमे हुए हैं। आजकल हमारी ही तरह आत्ममुग्ध रहने वाले लोगों की तादाद निरन्तर बढ़ती ही जा रही है।
हमारी यह आत्ममुग्धावस्था शांति, अहिंसा और मस्ती की जननी है और इस अवस्था में बने रहकर हम दुनिया और जगत के दूसरे लोगों पर बड़ा उपकार ही कर रहे हैं। हम सभी की यह आत्म मुग्ध अवस्था निरन्तर बनी रहे, इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इसमें हमारा भी भला है और दूसरे जीवों से लेकर जगत का भी।

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