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देश के लिए खतरा हैं ये गूंगे-बहरे बुद्धिजीवी

height– डॉ. दीपक आचार्य
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समाज और देश की  बुनियाद तभी तक मजबूत रह पाती है जब तक कि समझदार लोग सही और गलत के बारे में समाज का सटीक और स्पष्ट मार्गदर्शन करते रहें। यह काम बुद्धिजीवियों का है जो कि समाज-जीवन के कई क्षेत्रों में अपना दखल रखते हैं। जो मिट्टी और हवा इन्हें पालती-पोसती है, जो समाज इन्हें बड़ा करता है और जिस देश का ये अन्न-जल और नमक खाते हैं उस देश और देशवासियों के प्रति आत्मीय वफादारी के साथ मददगार बनना हर बुद्धिजीवी का प्रथम धर्म होना चाहिए।

साथ ही हर बुद्धिजीवी का यह भी फर्ज है कि समाज को अच्छे-बुरे, सही-गलत और उपयोगी-त्याज्य विचारों, वस्तुओं और लोगों के बारे में समय-समय पर मार्गदर्शन करता रहे ताकि समाज भटके नहीं और सामाजिक उन्नयन के साथ देश तरक्की की डगर पर चलता रहे।

ज्ञान और अनुभवों से समृद्ध बुद्धिजीवी रोशनी की वे मशालें हैं जिनके बूते समाज और देश नई ऊँचाइयों को छूने का माद्दा पैदा करते हैं और इन्हीं के भरोसे भावी दिशा और दशा तय करते हैं। हमारे ज्ञान और अनुभवों का तभी मूल्य है जब यह समाज के किसी न किसी रूप में काम आए। ज्ञान और अनुभव जब पेट भरने के साधन बन जाएं तब हमें बुद्धिजीवी कहने की बजाय पेटजीवी ही कहा जाना ज्यादा समीचीन होगा।

आज हर किसी को भ्रम है कि वही बुद्धिजीवी और सबसे श्रेष्ठ है। श्रेष्ठता और बौद्धिक उच्चता के सारे मानदण्ड हमने खो दिए हैं और सब कुछ स्वार्थ एवं व्यक्ति केन्दि्रत करके रख दिया है जहां वही श्रेष्ठ है जो हम चाहते हैं, जो हमारे काम का है। हम बुद्धिजीवी न किसी और को स्वीकार पाने की उदारता रखते हैं और न ही किसी को दिल से स्वीकार कर पाने का साहस।

हम सभी लोग बुद्धिजीवी कहे जरूर जा रहे हैं मगर हमारे में इतनी बुद्धि भी शेष नहीं बची है कि हम तसल्ली से कभी सोच भी सकें कि हम जो कर रहे हैं वह कितना उचित है, और हमें क्या करने की आवश्यकता है देश और समाज के लिए। पढ़ा-लिखा होने और बुद्धिजीवी होने में खूब फर्क है। आजकल हर पढ़ा-लिखा अपने आपको बुद्धिजीवी समझ बैठा है, भले ही समाज और देश के किसी काम का ना हो, उसका जीवन पूरी तरह आत्मकेन्दि्रत और नाकारा ही हो तथा समाज और देश की सेवा करने की बजाय शोषक की भूमिका में ही क्यों न हो।

बुद्धिजीवियों की किसम-किसम की जमातों के बीच आजकल बौद्धिक बल को बाहुबल की तरह अपने लाभों के लिए इस्तेमाल करने का विचित्र शगल चारों तरफ चल पड़ा है जहाँ हर कोई उधर छलांग मार लेता है जिधर उसी तरह के किसी आदमी कमी महसूस होने लगी हो। कमी न भी हो, तो ऎसे कामों का सृजन करवा ही देते हैं जिससे ये लोग कहीं न कहीं कुछ समय जमे रहकर अपना समय गुजार दें और उन कामों से फुरसत मिल जाए, जिन कामों के लिए समाज हमें तैयार करता है।

इन्हीं बुद्धिजीवियों में से अधिकांश की हालत ऎसी हो गई है कि उन्हें अपने बहुत बड़े आदमी और बुद्धिजीवी होने का महाभ्रम हो गया है। ये लोग हमेशा अपने ऊपर विद्वत्ता, पॉवर और अहंकारों के लबादे इस तरह ओढ़े रखते हैं कि इन्हें देख कर लगता है कि जैसे कि इनसे बड़ा सींसियर और गंभीर व्यक्तित्व दुनिया में कोई और है ही नहीं। हमेशा ऎसे गंभीर बने रहेंगे और दिखाएंगे जैसे कि दुनिया जहान का पूरा भार इन्हीं के माथे आ पड़ा हो या कि चौबीसों घण्टे इनके घरवालों से लेकर सारे नाते-रिश्तेदारों की मौत के गम में डूबे हुए रहते हों।

इस ओढ़ी हुई आडम्बरी प्रवृत्तियों और अपने आपको ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के मिथ्या स्तर पर ले जाकर सातवें आसमान पर स्थापित इन लोगों का आभामण्डल ही ऎसा हो जाता है कि इन्हें दूर से देखकर लगता है कि जैसे कोई नया ताबूत दफन करने के लिए आ गया हो।

अपने आस-पास नज़र घुमायें, तो ऎसे खूब सारे लोग देखने को मिल जाएंगे जिन्हें हमेशा अपने पदों और पॉवर की चादरों से लिपटे रहने की आदत पड़ गई हो। इन लोगों के शरीर और मनोभावों को देखकर ऎसा लगता है कि जैसे 108 डिग्री बुखार और भीषण शीत से ठिठुर रहे हों, और तीन-चार लोग पकड़ कर अस्पताल ले जा रहे हों।

कुछ लोग तो चौबीसों घण्टे अपने पद और पॉवर के अहंकार में रहते हैं। ईश्वर इनके घरवालों और साथ रहने वालों को सहनशीलता प्रदान करे जो लोग हर क्षण इन्हें झेलते रहते हैं। इन लोगों के साहस की तारीफ की जानी चाहिए। आमतौर पर अधिकांश बुद्धिजीवियों की हालत ऎसी ही हो गई है।

अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि जो श्रमजीवी नहीं हो सकता, शारीरिक श्रम से जी चुराता है, वह बुद्धिजीवी है, जो खुद कुछ नहीं करता,दूसरों पर हुकूमत करता है, उपदेश देता है, अपनी बड़ाई करता रहता है और निर्देशन करने की आदत का शिकार होता है।

हम अपने आस-पास की बात करें या कि दूरस्थ स्थानों की, बुद्धिजीवियों का यह रोग सर्वत्र विद्यमान है। हर बुद्धिजीवी अपने आपको महान समझकर पुरातात्विक धरोहर की तरह पड़ा रहेगा बिना कुछ किए-धरे। और बातें ऎसी करेगा जैसे कि उसका बस चले तो देश और दुनिया में चंद घण्टों में स्वर्ग उतर आए।

इससे भी बढ़कर बुद्धिजीवियों की एक और खासियत है द्रष्टा भाव। ये लोग समाज-देश और दुनिया में चाहे कुछ हो जाए, जब तक उन पर आँच न आए, तब गूंगे-बहरे और अधमरे होकर पड़े रहेंगे जैसे कि अचानक कोमा में चले गए हों। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनके लिए कोई अच्छा-बुरा नहीं होता। चाहे कुछ हो जाए, अच्छे को अच्छा कहने की उदारता नहीं है, बुरे को बुरा कहने का साहस नहीं। जैसे ही इनके स्वार्थ टकराने शुरू हो जाते हैं तब ये कुंभकर्ण की तरह बेहोशी और नींद से जगते हैं और तब जाकर पता चलता है कि इनमें साँसें अभी शेष रह गई हैं।

समाज और देश की दुरावस्था के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो ये गूंगे-बहरे और आत्मकेन्दि्रत स्वार्थी नालायक बुद्धिजीवी ही हैं जो अपने मार्गदर्शन धर्म से विमुख हो गए हैं। जिंदगी भर भोग-विलासिता और  नौकरियों, काम-धंधों में रमे रहने वाले, पराये माल पर गुलछर्रे उड़ाने वाले पराश्रित और परजीवी, जोंकिया कल्चर से भरे बुद्धिजीवियों की हालत तो इससे भी अधिक खराब हो गई है, जिन्हें श्मशान पहुंचने के क्षण तक भी ऎशो-आराम और पराये भोग-विलास चाहिए होते हैं।

खूब सारे बुद्धिजीवी तो ऎसे हैं जिन्होंने मनुष्य होने का धर्म, गर्व और गरिमा भुला दी है और ऎसे-ऎसे कामों में लगे हुए जो मनुष्य तो क्या पशु भी नहीं करते हैं। इस किस्म के बुद्धिजीवी अपने आपको किसी फरिश्ते से कम नहीं समझते। इनकी धारणा यही होती है कि आस-पास से लेकर पूरी दुनिया के लोग उनकी सेवा-चाकरी के लिए ही पैदा हुए हैं।

सब कुछ जानते-समझते हुए भी जो बुद्धिजीवी मूक पशुओं की तरह द्रष्टा भाव अपनाए बैठे हुए हैं, असल में वे ही सबसे बड़े जिम्मेदार हैं जिनकी वजह से समाज और देश को अपेक्षित मार्गदर्शन व संबलन प्राप्त नहीं हो पा रहा है।  पृथ्वी पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है। ऎसे में यह कामना तो की ही जानी चाहिए कि अब पृथ्वी का भार हरने को कोई अवतार होगा ही। हम बुद्धिजीवियों से वे श्रमिक और खेतिहर किसान ज्यादा उपयोगी और अच्छे हैं जो देश के काम तो आ रहे हैं।

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