पुस्तक समीक्षा : ”है गौरवशाली इतिहास हमारा”

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है गौरवशाली इतिहास हमारा : लेखक-देेवेन्द्र सिंह आर्य, प्रकाशक-साहित्यगार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर-302003, मूल्य-300/-रू., समीक्षक-सुमतिकुमार जैन, प्र. सं.-जगमग दीपज्योति (मा.) पत्रिका, महावीर मार्ग, अलवर  (राज.) 301001
किसी ने सही कहा है-भारत एक ऐसी मुँह बोलती तस्वीर है जो जन-मन को खुशहाली के हजार सन्देश देता है। यह राष्ट्र है दुनियां तक पहँचने का आरंभिक बिन्दु, किसी ने ठीक ही कहा है-“India is a city of the world and the in a city. विविध गर्वोत्तियाँ और गरिमा प्रधान देश है ‘भारतÓ यहाँ के किस-किस रूप का वर्णन करें? यहाँ की जिन्दगी जीवंत तस्वीर है। खेतों को सींचती मानवता की पोषक नदी, बाँध, जल, सरोवर, देश की दीवारों की बुलन्दियाँ दर्शाते गढ़-किले, महल-हवेलियाँ, बुर्ज, कानों में मिश्री घोलती वेदों की ऋचाएं-उपनिषद, धर्म-कर्म-आस्था, पूजा-पर्व, तीर्थ परम्पराएं, अनेकता में एकता का सतरंगी सांस्कृतिक गुलिस्ता, सभी एक से बढ़कर एक हैं। ऐसे महान राष्ट्र के प्रति श्री देवेन्द्र सिंह आर्य की नवीन पुस्तक ‘है गौरवशाली इतिहास हमारा का प्रकाशन हुआ है।
शब्दों में गुंथी, भाषाओं में चित्रित, गौरवशाली इतिहास और हमारे पूर्वजों की समृद्ध विरासत के उन स्थलों का चित्ताकर्षक झरोखा है जिसका कण-कण यहां की महिमा-गाथा का वर्णन करते हैं। किसी भी देश की महानता उसकी भौगोलिक-प्राकृतिक सीमाओं का विस्तार अथवा ऐतिहासिक घटनाएं ही मूलत: उसके आधारभूत मानदण्ड नहीं होते अपितु देश की अपेक्षाकृत गरिमामयी छवि प्रस्तुति के लिए वे सभी साक्ष्य तथा प्रमाण होते हैं जिनके समग्र-सक्रिय सहयोग से देश की गरिमामयी छवि में अधिकाधिक अभिवृद्धि की जा सके साथ ही भारत पर थोपी गई ‘साँप से चमत्कृत करने वाले देशÓ जैसे भ्रामक छवि को तोड़कर विश्व के समक्ष भारत की मौलिक, सही व सुन्दर प्रस्तुति के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत के मौलिक स्वरूप से अवगत कराया जा सके ताकि विश्व मानचित्र में भारत की प्रतिष्ठित गरिमामयी पहचान की मुहर चस्पा सके। जब भी किसी ऐतिहासिक भवन या किले का दौरा करते हैं तो उसमें मरत,े सिमटते इतिहास को देखें तो आत्मा चीत्कार कर उठती है। यही नहीं आज जब हम म्यूजियम-संग्रहालयों में इस देश के शूरवीरों के वस्त्र देखते हैं जिन्हें हम स्वयं उठा भी नहीं सकते, वो भाले-तलवारें देखते हैं जिनसे आज कोई लड़ नहीं सकता तो हम अपनी पुरानी विरासत, शौर्य गाथाओं से परिचित तो हो सकते हैं, उस ज्वलंत मार्मिकता को महसूस तो कर सकते हैं। यद्यपि की वर्तमान इतिहासकारों ने भारत के इस गौरवशाली इतिहास की उपेक्षा की है, उसका सही रूप वर्णन नहीं किया है और हिन्दू जाति को कायर कहते हुए हजारों वर्ष तक उसके गुलाम रहने की घोषणा का महापाप किया है उनके लिए लाला लाजपत राय जी ने अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी की प्रस्तावना में लताड़ा है कि जो जाति अपने पतन के काल में भी राजा कर्ण, गौरा और बादल, महाराणा सांगा और प्रताप, गुरु अर्जुन, गुरु तेगबहादुर आदि हजारों शूरवीरों को उत्पन्न कर सकती है वह कैसे कायर हो सकती है जिस देश की स्त्रियों ने श्रेष्ठ उदाहरणों को पेश किया है और अपने भाईयों, पतियों और पुत्रों की कमर में शस्त्र बांधे और युद्ध में भेजा, यही नहीं अनेक स्त्रियों ने स्वयं पुरुषों का वेष धारण कर युद्ध क्षेत्र में लड़कर सफलता पाई, अपने पतिव्रत धर्म की रक्षा के लिए दहकती अग्नि में प्रवेश किया वह जाति यदि कायर है तो संसार की कोई भी जाति वीर कहलाने का दावा नहीं कर सकती। मैं तो समझता हूँ कि ऐसे वाक्य कहने वाले शायद कायर का अर्थ ही नहीं जानते या वे स्वयं ही इस रूप में हैं। श्री देवेन्द्र सिंहजी ने इन सब परिस्थितियों को उजागर करने का प्रयास कर भारत का गौरवशाली इतिहास की एक झाँकी दी है और इसी भाव विचार को लेकर यह पुस्तक रची गयी है। यह उनका निश्चित ही साहसिक एवं श्लाघ्य प्रयास है।
इन्होंने पुस्तक को 17 अध्यायों में क्रमश ‘धारा नगरी के राजा भोज से ‘पोरस और सिकन्दर के युद्ध का परिणाम तक वर्णन किया है। वहीं लेखक ने अपने लेखकीय निवेदन में हर स्थिति, परिस्थिति व मुस्लिमों के द्वारा किये आक्रमण, ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रवेश आदि पर खुलासा अभिव्यक्तियां दी हैं तथा उस समय के वीर राजाओं ने किस प्रकार अपने देश को बचाये रखा, का भी खुलकर चित्रण किया है। लेखक ने यह बात भी स्पष्ट की है कि स्वतंत्रता के पश्चात इस देश की शिक्षा नीति में, इस देश के अतीत को उत्कीर्ण कर उसे लागु न करके पूर्व की अपमानित और तिरस्कृत नीतियों को वर्णित रखी गई, वर्तमान पीढ़ी इसी को पढ़ती रही। लेखक का मानना है कि यदि युवा पीढ़ी भारत के अछूते इतिहास के पन्नों को खोजे पड़ताल कर उन पर शोध और अनुसंधान करें तो उसे इस देश की महानता का सही आकलन प्राप्त हो सकता है।
लेखक श्री आर्य जी ने अपने विभिन्न अध्यायों में स्वयं यात्रा कर उनके वास्तविक रूप को जिस प्रकार प्रगट किया है, वह देश की महानता में चार चांद लगाता है। हर लेख में जो गहनता, हृदयस्पर्शी वर्णन व्यक्त किया गया है, उसका हर पृष्ठ, हर पंक्ति, हर कण-कण देश की वास्तविकता को उजागर करता है और देश की गरिमामयी स्थिति का वर्णन करता है।
श्री देवेन्द्र सिंह आर्य की यह पुस्तक ऐसे सद्प्रयासों की पुस्तक है जिसमें इतिहास के कईं सवालों की बेबाक पड़ताल कर उन पर पड़ी धूल साफ करने की कोशिश की है जो हमें उस काल में ले जाकर खड़ा कर देती है जब मार्ग में दुर्दांत दस्यु और लुटेरों ने किस प्रकार हमारी विरासत को मिटाने का प्रयास किया। अन्त में जो बीत गया उसे बदला तो नहीं जा सकता पर अतीत के झाड़ने से वर्तमान की गरद जरुर साफ की जा सकती है, अतीत की गुफाओं में प्रवेश करके गुजरे जमाने के शौर्य, पराक्रम, प्रतिशोध, सत्ता अण-वेषण और उत्कट जिजीविषा से परिचित हो सकता है। अनेकों अनैतिक प्रसंगों का खुलासा वर्णन पाठक को नई दिशा, नया वर्तमान, नये युग देने का लेखक का यह प्रयास सफलता की सीढ़ी बन सकता है। कृति में गति है, रोचकता है और संवेदना भी है। ऐसी सुन्दर प्रस्तुति के लिए लेखक निश्चित बधाई के पात्र हैं।

सुमति कुमार जैन

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