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हिन्दी के लिए दिखावा नहीं समर्पण है जरूरी

hindi-day-20120913हम सभी के लिए आज गर्व का दिवस है क्योंकि आज हिन्दी दिवस है। हिन्दी दिलों को जोड़ने और आत्मीय भावों का निरन्तर संचार करने वाली भाषा है जिसकी अहमियत हर आम और खास भारतवासी को समझने की जरूरत है।  हिन्दी हमारे रग-रग  और जन मन में रची-बसी भाषा है जिसका अब तक इतना उन्नयन हो जाना चाहिए था कि इसके लिए अब हिन्दी दिवस मनाने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी। हिन्दी के लिए इतन वर्षों बाद भी हमें हिन्दी दिवस मनाने की जरूरत यह साफ-साफ बता देती है कि अभी हम हिन्दी को अपेक्षित प्रतिष्ठा नहीं दिला पाए हैं और यही कारण है कि आज हम सभी को हिन्दी दिवस मनाने के लिए सब कुछ करना पड़ रहा है। हिन्दी के उत्थान और विकास का सबसे बड़ा दायित्व उन लोगों का है जो हिन्दी के नाम पर बड़े-बड़े पदों, अकादमियों और प्रतिष्ठित स्थानों पर कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं अथवा हिन्दी के नाम पर कमा खा रहे हैं। हम जैसे खूब सारे लोग हैं जो हिन्दी को अपनाकर अपनी नौकरी और पदों को गौरवान्वित कर रहे हैं, पुरस्कारों और अलंकरणों तथा अभिनंदन पाने की हौड़ में सदा आगे ही आगे बढ़े रहते हैं लेकिन हमने हिन्दी के लिए क्या कुछ किया, यह बात सामने आते ही हम फिसड्डी दिखने लगते हैं अथवा शरमा कर किसी कोने में दुबक जाते हैंं। असल में आम आदमी हिन्दी के अपेक्षित विकास के न हो पाने में उतना दोषी नहीं है जितने हम बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने हिन्दी के सहारे जाने क्या से क्या पा लिया है लेकिन जहां कभी हिन्दी के लिए कुछ करने का मौका आता है, हिन्दी सेवा के लिए आगे बढ़ना होता है वहां हम उतना कुछ नहीं कर पा रहे हैं जितना हम हिन्दी से लाभ प्राप्त कर रहे हैं। हम सभी को हिन्दी के नाम पर महान विद्वान, चिंतक, लेखक, साहित्यकार, हिन्दी सेवी और इससे भी अधिक जाने क्या-क्या होने का भ्रम है, सुनने का शौक है लेकिन जहाँ हिन्दी विकास के लिए आयोजन करने, हिन्दी के पक्ष में बोलने और अपना पक्ष रखने अथवा हिन्दी के लिए किसी भी प्रकार के समर्पण की जरूरत होती है वहाँ हम कुछ नहीं करना चाहते। हिन्दी के सहारे जीने वाले लोग भी हिन्दी के लिए उतने समर्पित नहीं कहे जा सकते जितने होने चाहिएं। जिन लोगों की आजीविका ही हिन्दी पर टिकी है वे भी प्रोफेशनल होते जा रहे हैं और दूसरों के भरोसे बैठे हैं कि हिन्दी के लिए कोई दूसरा कुछ करे। हिन्दी के लिए प्रोत्साहन और व्यापकता के अभाव के कारण हम आज विकास के अपेक्षित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं यह हमें अच्छी तरह समझना होगा।

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