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साल भर बना रहना चाहिए हिन्दी का ध्यान

hindiहम सभी ने जाने कितनी औपचारिकताओं के साथ हिन्दी दिवस मना लिया और खुश हो गए चलो एक आयोजन निपटा। हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा को छोड़ दें तो आज हम सभी ने हिन्दी के नाम पर कहीं पूरा और कहीं आधा दिन समर्पित कर दिया है।

हिन्दी दिवस और हिन्दी के प्रति हम कृतज्ञ लोगों ने जितनी श्रद्धा और आस्था के साथ आज हिन्दी के प्रति सम्मान व्यक्त किया है, श्रद्धा अभिव्यक्त की है वह अपने आप में ऎसा कर्म है जिसकी औपचारिकता का निर्वाह हम जाने कितने सालों से यों ही करते आ रहे हैं।

हिन्दी को जहाँ होना चाहिए था वहाँ वह अब तक नहीं पहुंच पायी है। इस स्थिति के लिए कोई और नहीं बल्कि हम ही जिम्मेदार हैं। हिन्दी के प्रति जो समर्पण हमारा कल दिखा है वह हमेशा और पूरे साल बना रहना चाहिए तब तो कुछ बात है वरना एक दिन हिन्दी दिवस मनाकर हिन्दी के प्रति अपनी कृतज्ञता की इतिश्री कर लेना अपने आप में वो दुःखद पहलू है जो हमारे लिए कई वर्ष से यों ही महज औपचारिक बना हुआ है।

हिन्दी एकमात्र माध्यम है जिसके जरिये हम हर क्षेत्र में उन्नति और तरक्की का शिखर प्राप्त कर सकते हैं। हमें  इस सत्य को किसी न किसी पैमाने पर स्वीकार करना ही पड़ेगा कि हिन्दी  सर्वव्यापक और सर्वग्राही होती, यह अपेक्षित आदर-सम्मान के साथ स्वीकारी जाती तो आज देश का नक्शा ही बदला हुआ नज़र आता है और हमारी तरक्की की रफ्तार कुछ और ही होती।

हिन्दी के प्रति समर्पण की यह भावना हम साल भर बनाए रखें यही संकल्प हम ले लें तो साल भर के भीतर इतना कुछ परिवर्तन हम अपनी आँखों से देख सकते हैं जितना पिछले कई दशकों से नहीं हो पाया।

सौभाग्य है कि देश का नेतृत्व आमजन की भाषा के प्रति संवेदनशील है और उसका भी अपना यही लक्ष्य है कि हिन्दी को यथोचित सम्मान प्राप्त हो और आगे बढ़े।

इसके लिए हमें कुछ बातें रोज करनी होंगी। अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करें।

कागज-पत्रों में हिन्दी भाषा का प्रयोग करें।

शेखी बघारने के लिए गौरे और काले अंग्रेजों से उनकी आंग्ल भाषा में बातें भले करें किन्तु सच्चे भारतवासी के साथ हिन्दी भाषा का प्रयोग करे, खासकर उत्तर भारतीयों के लिए।

जो लोग हिन्दी के नाम पर कमा खा रहे हैं उन्हें चाहिए कि वे साल भर में अपना मूल्यांकन करें कि हिन्दी के लिए उन्होंने बीते हुए साल किस प्रकार समर्पण किया और इसकी क्या उपलब्धियां सामने आयीं। शालों, साफों, पगड़ियों, उपरणों और अभिनंदन पत्रों से प्राप्त सम्मान हिन्दी का सम्मान नहीं है बल्कि हमारी अपनी ही ऎषणापूर्ति करने के साधन मात्र हैं ये सब।

आम लोगों से जुड़े हुए सारे काम हिन्दी में हों।

जो भी विज्ञापन जारी हों वे हिन्दी में हों, सर्कुलर और कानून हिन्दी में हों तथा आम आदमी को उसके लायक सूचनाएं हिन्दी में उपलब्ध हों।

जब तक हमारे जीवन में हिन्दी के प्रति समर्पण का मूल्यांकन नहीं होगा, वैयक्तिक समर्पण नहीं होगा तब तक हो सकता है हिन्दी दिवस सदियों तक मनाने के बाद भी कुछ हासिल न हो पाए।

आज हिन्दी के सामने क्षेत्रीय बोलियों और भाषाओं से लेकर काले अंगे्रेजों तक की ढेरों चुनौतियां हैं जिनका मुकाबला सिर्फ हिन्दी की औपचारिक श्रद्धा से नहीं हो सकता।

हिन्दी के लिए हमारा समर्पण जरूरी है और यह समर्पण सिर्फ बातों और वादों से नहीं होने वाला बल्कि कल हमने जो-जो बातें कहते हुए हिन्दी के प्रति अपार श्रद्धा व्यक्त की है उनमें से एकाध बात का ही साल भर के लिए पालन कर लें तो हिन्दी हमारे प्रति कृतज्ञ होगी और उसका मान-सम्मान बढ़ेगा ही बढ़ेगा।

खूब सारे लोग ऎसे हैं जो हिन्दी के नाम पर हिन्दी दिवस समारोहों में इतना अधिक बोल जाते  हैं कि लगता है दुनिया में एकमात्र वे ही हैं जिन्हें हिन्दी की सेवा के लिए भगवान ने पैदा किया है और ये हिन्दी अवतार और उपासक न होते तो हमारी हिन्दी होती ही नहीं।

हम अपने दिल पर हाथ रखकर गंभीरता से सोचें कि हममें से  कितने लोग ऎसे हैं जो हिन्दी के नाम पर साल भर में धेला भी खर्च करते हैं क्या, हिन्दी के नाम पर आकाशवाणी, दूरदर्शन और दूसरे सभी प्रकार के माध्यमों, समारोहों, कवि सम्मेलनों, काव्य गोष्ठियों, मंच संचालन और भाषण से लेकर लेकर दूसरों के लिए लिखने-पढ़ने और पढ़ाने वाले हममें से कितने ऎसे हैं जो अपने खर्च पर हिन्दी के नाम पर कितने आयोजन साल भर में करते हैं। तब हम हिन्दी सेवियों की पोल अपने आप खुल जाएगी।

हममें से कुछ को छोड़कर सारे के सारे हिन्दी सेवी और अपने आपको साहित्य के शिखर पुरुष मानने वालों की स्थिति यह है कि हम आयोजन से पहले लिफाफों के वजन के बारे में पूछते हैं, बिना धेला लिए कहीं कुछ नहीं करते। अपने आपको कहते हैं  सरस्वती पुत्र, और हमारी गतिविधियों को देख लें तो सारी की सारी लक्ष्मी पुत्रों से कम नहीं हैं। इससे भी एक कदम आगे बढ़कर देखें तो कितने ही ऎसे हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि खुमारी न हो तो जीभ भी चिपकी रहती है, आँखें तक भी नहीं खुलती।

ऎसा ही चलता रहा तो दिन दूर नहीं जब समारोहों और कार्यक्रमों का उद्घाटन सरस्वती की बजाय कुबेर और लक्ष्मी की प्रतिमाओं पर पुष्पहार चढ़ाकर व उनके समक्ष दीप जलाकर करना शुरू करना पड़ेगा क्योंकि हमारे रचनाकर्म की धुरी सरस्वती और ज्ञान की बजाय लक्ष्मी और मुद्राओं पर केन्दि्रत हो गईं है।

अपने आपको हिन्दीसेवी, हिन्दीप्रेमी और सरस्वती पुत्र, साहित्यकार आदि कहलाने वाले लोगों को दस मिनट यही सोचने के लिए निकालने होंगे कि जो उन्हें कहा जा रहा है अथवा जो वह कहलाना चाह रहे हैं वह सत्य है क्या? उनकी आत्मा से जो जवाब आएगा वह सकारात्मक तो नहीं ही होगा, इस बात की पक्की गारंटी है।

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