पुस्तक समीक्षा  : ‘है गौरवशाली इतिहास हमारा’

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आज जबकि देश में भारत के षड़यंत्रपूर्ण इतिहास लेखन की परत दर परत उठाई जा रही है और भारतीय हिंदू जनमानस के साथ किए गए षड़यंत्रपूर्ण खेल का पता चलता जा रहा है तब ‘है गौरवशाली इतिहास हमारा’ – नाम की यह पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत हुई है। शोध के रूप में लिखी गई यह पुस्तक समकालीन साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाएगी – ऐसा निश्चित रूप से माना जा सकता है।
इस पुस्तक के लेखक ‘उगता भारत’ के चेयरमैन श्री देवेंद्रसिंह आर्य हैं। विद्वान लेखक की यह पहली पुस्तक है । जिसमें उन्होंने कोरोना काल में मिले अवकाश का भरपूर लाभ उठाकर उसे देश व समाज के लिए समर्पित कर इस पुस्तक के रूप में हमें प्रदान किया है।
   लेखक द्वारा प्रस्तुत सामग्री के अध्ययनोपरांत यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारत के गौरव पूर्ण हिंदू इतिहास को एक षड्यंत्र के अंतर्गत हमारे समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है । यदि उसे विद्वान लेखक की शैली में लिखा जाए तो निश्चय ही हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों में गर्व और गौरव का बोध जागृत हो सकता है। लेखक का यह स्पष्ट मानना है कि हिंदू जाति को कायर कहना बहुत बड़ा पाप है । क्योंकि विश्व के ज्ञात इतिहास में केवल हिंदू समाज ही ऐसा है जिसने दीर्घकाल तक लंबा संघर्ष कर अपनी आजादी को बचाए रखने में सफलता प्राप्त की है। अनेकों विदेशी आक्रमणकारियों के अत्याचारों और नरसंहार के मर्मस्पर्शी दृश्य देखकर व झेलकर भी यदि हिंदू समाज आज जीवित है तो इसे उसके पूर्वजों का पुण्य प्रताप और पराक्रमी स्वभाव का स्वाभाविक परिणाम ही माना जाना चाहिए।
     लेखक लाला लाजपत राय जी की पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ की प्रस्तावना के इन शब्दों को आधार बनाकर अपनी पुस्तक का लेखन आरंभ करते हैं कि ‘जो जाति अपने पतन के काल में भी राजा कर्ण , गोरा और बादल, महाराणा सांगा और प्रताप, जयमल और फ़त्ता, दुर्गादास और शिवाजी, गुरु अर्जुन, गुरु तेग बहादुर गुरु गोविंद सिंह और हरी सिंह नलवा जैसे हजारों शूरवीरों को उत्पन्न कर सकती है, उस आर्य हिंदू जाति को हम कायर कैसे मान लें ?  जिस देश की स्त्रियों ने आरंभ से आज तक श्रेष्ठ उदाहरणों से को पेश किया है , जहां सैकड़ों स्त्रियों ने अपने हाथों से अपने भाइयों , पतियों और पुत्रों की कमर में शस्त्र बांधे हैं और उनको युद्ध में भेजा है, जिस देश की अनेकों  स्त्रियों ने स्वयं पुरुषों का वेश धारण कर अपने धर्म और जाति की रक्षा के लिए युद्ध क्षेत्र में लड़कर सफलता पाई, और अपनी आंख से एक बूंद भी आंसू नहीं गिराया , जिन्होंने अपने पातिव्रत्य धर्म की रक्षा के लिए दहकती प्रचंड अग्नि में प्रवेश किया , वह जाति यदि कायर है तो संसार की कोई भी जाति वीर कहने का दावा नहीं कर सकती।’
    वास्तव में इस पुस्तक का सार लाला लाजपत राय जी के इन शब्दों में ही छिपा हुआ है । जिसे विद्वान लेखक ने अपनी लेखनी के माध्यम से पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर स्वर्णिम अक्षरों से उत्कीर्ण किया है।  जिसके लिए उनका जितना भी धन्यवाद ज्ञापित किया जाए, उतना कम है। याद रहे कि जब कोई वीर योद्धा युद्ध क्षेत्र में अपने पराक्रम का पूर्ण उत्कृष्टता के साथ प्रदर्शन करता है तो इतिहास उसके चारों और खड़ा होकर उसकी जय – जयकार बोलता है। इसी प्रकार जब कोई साहित्यकार अपनी उत्कृष्ट भाषा शैली में अपने विषय को भाषा सौंदर्य की पूर्ण उत्कृष्टता के साथ प्रदर्शित और प्रकट करता है तो उस समय भी इतिहास उसके निकट आकर उस पर पुष्प वर्षा कर उसका मनोबल बढ़ाता है और उसके कार्य का अभिनंदन करता है।
वास्तव में ऐसा कार्य आने वाली पीढ़ियों को बीते हुए कल के गर्व और गौरव से परिचित कराता है। वह जितना ही स्पष्टता के साथ किसी पाठक के भीतर प्रकट होता जाता है, उतना ही संबंधित लेखक का किया गया परिश्रम और पुरुषार्थ सार्थक हो उठता है। प्रस्तुत पुस्तक के लेखक श्री आर्य के विषय में यह कहा जा सकता है कि उन्होंने इस पुस्तक के माध्यम से ऐसा ही परिश्रम और पुरुषार्थ कर जीवन की सार्थकता को निखारने का सफल प्रयास किया है।
   प्रोफेसर प्रमोद कुमार गोविल ने श्री आर्य की इस पुस्तक के संदर्भ में लिखा है कि ‘आर्य जी ने इतिहास के कई सवालों की बेबाक पड़ताल करके उन पर पड़ी धूल साफ करने की कोशिश की है। इस संदर्भ में लोगों की सहमति या असहमति का महत्व उतना नहीं होता, जितना उस विवेक और इरादे का होता है, जिससे कोई कलमकार पीछे मुड़कर देखने की जहमत उठाता है। जो बीत गया उसे बदला तो नहीं जा सकता, पर अतीत के झाड़न से वर्तमान की गर्द जरूर साफ की जा सकती है।’
      इस पुस्तक में धारा नगरी के राजा भोज, जब हुआ था कलयुग का आरंभ, संस्कृति रक्षक परमार शासक, गुर्जर सम्राट मिहिर भोज, महान क्रांतिकारी विजय सिंह ‘पथिक’, राम – भरत का वाक युद्ध, वृहत्तर भारत के बारे में , महाभारत काल के कुछ देश – प्रदेश और शहर,  हल्दीघाटी का युद्ध- महाराणा प्रताप और चेतक,  कुंभलगढ़ के बारे में,  कर्ण था एक महान ऋषि की संतान ,आर्यों का विदेश गमन,  भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण, दुल्ला भट्टी और लाहिड़ी, बलूचिस्तान का पाकिस्तान में जबरन विलय, हिंदुओं के अस्तित्व को गहरा संकट, पोरस और सिकंदर के युद्ध का परिणाम – जैसे कुल 17 अध्यायों  को सम्मिलित किया गया है। जिसमें अनेकों विलुप्त अध्यायों को समाविष्ट करने का सराहनीय प्रयास किया गया है। अनेकों तथ्यों और शोधपरक विवरणों से भरपूर यह पुस्तक कुल 143 पृष्ठों में लिखी गई है। जिसके प्रकाशक साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता जयपुर 302003 हैं। पुस्तक प्राप्ति के लिए 0141-2310785, 4022382 पर संपर्क किया जा सकता है। पुस्तक का मूल्य ₹300 है। इतिहास के प्रति जिज्ञासु, विद्यार्थियों शोधार्थियों और पाठकों के लिए पुस्तक संग्रहणीय है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :  उगता भारत

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