government and publicकिसी संस्कृत के कवि ने कितना सुंदर कहा है :-

यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति,
यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति,
यद्कर्मणा करोति तदभि सम्पद्यते।

अर्थात मनुष्य जैसा विचारता है-ध्यान करता है, वैसा ही बोलता है, जैसा बोलता है-वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा फलोपभोग करता है।
इसका अभिप्राय है कि संसार के सारे व्यवहार-व्यापार का मूल हमारा अपना चिंतन है, मन में उठने वाले भाव हैं, भावों की पवित्रता या निकृष्टता से ही हमारा बाहरी जगत पवित्र या निकृष्ट बनता है। इसीलिए हम यज्ञोपरांत ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि-

पूजनीया प्रभो हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए।
छोड़ देवें छल कपट को मानसिक बल दीजिए।।

सारी वैदिक संस्कृति और उसका अणु-अणु भावों की पवित्रता की पूजा से भरा पड़ा है। क्योंकि भावों की पवित्रता से भावना की पवित्रता आती है, (जिसे विधि में च्बोनाफाइड इंटेशनज् कहा जाता है। यदि हमारी भावना अर्थात आशय पवित्र हो गया तो सब कुछ ठीक हो जाएगा) यही कारण है कि हमारे यहां व्यक्ति को मनुष्य बनाने वाली शिक्षा पर ध्यान दिया जाता था।

पर आज स्थिति दूसरी है। अपने राष्ट्रीय चरित्र की बात करें तो हमें पग-पग पर अपने दूषित-प्रदूषित चिंतन की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इत्यादि हमारे वैचारिक प्रदूषण की देन हैं, भाव प्रदूषण की देन हंै। हमारे भीतरी जगत में कहीं दुर्गंध है, तब बाहरी जगत में हमें दुर्गंध दिखाई दे रही है। सफाई अभियान की दिशा ही विपरीत है, क्योंकि भीतरी प्रदूषण को मिटाने के स्थान पर बाहरी प्रदूषण को मिटाने की दिशा बल पकड़ती जा रही है। दुर्गंध के स्रोत को बंद करने के स्थान पर बाहर से दुर्गंध को मिटाने का प्रयास हो रहा है, यह च्नूरा कुश्तीज् है जो यूं ही चलती आ रही है। हमारे राष्ट्रीय चरित्र में कुछ ऐसे दुर्गण सम्मिलित हो चुके हैं जिनसे सारे समाज की व्यवस्था ही प्रदूषित हो चुकी है। छोटी-छोटी बातें हैं, जिन्हें हम नित्य देखते हैं, कहीं स्वयं भी करते हैं और यदि हम उन्हें ही सुधार लें तो स्थिति में भारी परिवर्तन आ सकता है। जैसे, हम देखते हैं कि अपने घर के पास की नाली को हम साफ न करके उसे गंदी वस्तुओं से भरते रहते हैं, बच्चों को खुली नालियों में शौच के लिए बैठा देते हैं या उनसे गली में शौच करवाकर उसे गली की नाली में बहा देते हैं, दुर्गंधित नालियों में घर की सड़ी-गली चीजों को बहा देते हैं, खुले शौचालयों में (सार्वजनिक शौचालयों में विशेष कर) कभी भी फिनाइल का उपयोग नही करते हैं, अपने ही घरों के आसपास हम कूड़े का ढेर लगाते रहते हैं, प्लास्टिक की थैलियों को कभी भी जलाकर नष्ट नही करते हैं, अपितु उन्हें यूं ही फेंक देते हैं।

यदि हम इन छोटी छोटी बातों पर अपने स्तर से पहल करते हुए व्यवस्था करें कि हम अपनी घरेलू नाली को गंदगी से नही भरेंगे, उसमें घर की ऐसी व्यर्थ चीजों को नही डालेंगे, जो पानी को रोककर सड़ांध पैदा करेंगी, उल्टे ऐसी वस्तुओं को कूड़ेदान में डालकर या कहीं ऐसे स्थान पर रखकर जला देंगे-जहां से किसी अन्य को कोई परेशानी न हो, अपने बच्चों को खुले शौच नही कराएंगे, सार्वजनिक शौचालयों में फिनाइल की व्यवस्था ठीक करेंगे, और उसके लिए अपनी ओर से दबाव बनाएंगे किऐसी व्यवस्था तुरंत लागू हो, इत्यादि। यदि  हम इन बातों को अपना लें तो स्थिति में परिवर्तन आ सकता है। हम अपने वार्ड सदस्य, सभासद, विधायक, सांसद को चुनकर यह मान लेते हैं कि अब सारी च्सफाई व्यवस्थाज् उन्हीं का दायित्व है। जबकि उनसे पहले अपने प्रतिनिधि हम स्वयं हैं। हम उन पर दायित्व फेंकते हैं, उन्हें सौंपते नही हैं और फेंके हुए दायित्व का निर्वाह कभी भी गंभीरता से नही हो सकता। यदि दायित्व सौंपा जाएगा तो उसके प्रति आप भी गंभीर रहेंगे और सोचेंगे कि दायित्व का निर्वाह कैसे हो, उसमें हमारी जनता की और जनप्रतिनिधि की सहभागिता क्या हो, यह तय कर लिया जाए। यदि ऐसी गंभीरता हमारे भीतर आ जाए तो हम जनप्रतिनिधियों से अपने-अपने वार्ड या क्षेत्र की शिकायत करने के लिए प्रतिनिधि मंडल के रूप में जाना छोड़ देंगे और अपने मंडल को ही प्रतिनिधि बनाकर स्वयं शिकायतों के समाधान में जुट जाएंगे। तब आपका जन प्रतिनिधि स्वयं लज्जित होगा और आपके साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करेगा।

हम सरकारों पर अपने दायित्व फेंक देते हैं। यह कितनी गलत बात है कि अपने घर के सामने के नाले को रोकें हम और खुलवाने के लिए शिकायत करें नगरपालिका से। अपने घर के सामने की सडक़ को तोड़े हम और शिकायत करें संबंधित विभाग को। कब तक चलेगा यह खेल? तनिक सोचें, कि यदि हम नाली को बंद ही ना करते या सडक़ को तोड़ते ही नही तो क्या होता? हम व्यवस्था के एक अंग बन जाते तब। पर  हम व्यवस्था के अंग न बनकर उसमें एक व्यवधान बन गये। जिम्मेदार नागरिक की पहचान तो नही है यह। जब हम व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं तो उस समय हम यह मानते हैं कि देश की सरकार के साथ-साथ उसकी कार्यशैली भी बदलेगी और नौकरशाही में और उसके व्यवहार में भी भारी परिवर्तन आएगा। हम यह भूल जाते हैं कि व्यवस्था व्यक्ति से आरंभ होती है और व्यक्ति पर ही उसका अंत होता है। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन का अभिप्राय वह नही है जो हम मानते हैं अपितु इसका सीधा सा अभिप्राय है-व्यक्ति परिवर्तन। जब व्यवस्था के परिवर्तन की मांग उठने लगे, तो उस समय मानना चाहिए कि अब व्यक्ति प्रदूषित हो गया है इसलिए व्यक्ति परिवर्तन का समय आ गया है। क्योंकि व्यक्ति से व्यवस्था बनती है, व्यवस्था से व्यक्ति नही।

तनिक सोचें, भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाला व्यक्ति है, होटलों में सर्वथा त्याज्य पेय पदार्थों या भोज्य पदार्थों को भी नमक मिर्च मसाले इत्यादि से पुन: पीने-खाने योग्य बनाकर  आपको बीमारी परोसने वाला भी व्यक्ति है, होटल की वस्तुओं को खुला छोडऩा और उस पर मक्खियां बैठने देने वाला भी व्यक्ति है, वाहनों को स्टार्ट करते समय अनावश्यक ध्वनि कराना या पड़ोसी के घर के सामने गाड़ी का हॉर्न जानबूझकर बजाने वाला या उसके घर के सामने गाड़ी से धुंआ छुड़वाने वाला, जोर से घर में टी.वी. रेडियो संगीत आदि चलाकर पड़ोसियों को दुखी करने वाला, आबादी के बीच स्थित पार्क बगीचे आदि में कचरा डालने वाला भी व्यक्ति है।

बात यहीं समाप्त नही होती। आप किसी सरकारी कार्यालय में जाएं, अपना काम वहां किसी सरकारी बाबू को बतायें, तो अपनी सीट पर बैठा-बैठा वह ऊपर को मुंह कर अपने चश्मों में से बोलेगा-च्यह नही हो सकताज्। आप कहेंगे-च्कैसे हो सकता हैज्? बाबू बोलेगा-च्च्साहब से बात करेंगे तो बताएंगे।ज्ज् इस सौदेबाजी को करने वाले आप और वह बाबू दोनों ही व्यक्ति हैं, और वह च्साहबज् भी व्यक्ति है, जिसके च्अनुशासनज् ने आपको इस वार्ता के लिए विवश किया है।

इसीलिए हम कहते हैं व्यवस्था परिवर्तन का अभिप्राय व्यक्ति परिवर्तन से है। सरकार के गठन का अभिप्राय यह नही है कि अब सारे काम सरकार करेगी और हम निकम्मे होकर देखेंगे। हम ही सरकार होंगे, हम ही लोक होंगे और हम ही तंत्र बनेंगे-व्यवस्था में सहभागी बनेंगे और उस व्यवस्था से व्यक्ति-व्यक्ति को लाभान्वित करेंगे इस सोच का नाम व्यवस्था है। इसी सोच को बलवती करने के लिए सरकारों  का गठन होता है। एक प्रकार से सरकार गठन का काम है समाज की घड़ी को चलाये रखने के लिए सही समय पर उसमें चाबी भरते रहना। हर व्यक्ति को एक मोबाइल बना देना-च्आत्मदीपो भव:ज् अर्थात अपना दीपक, अपना मार्गदर्शक अपने आप बन जाओ- स्वयं सक्रियता से कार्य करो-जब तुम्हारी च्बैटरी डिस्चार्जज् हो जाएगी तो उसे च्रीचार्जज् करने का काम सरकार करेगी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सरकार ने अपने आपको हमारे लिए च्रिचार्जरज् न बनाकर च्टैक्स चार्जरज् बना लिया और हमने भी अपने आपको स्वतंत्र मानकर मर्यादाओं को तोडऩा अपनी शान का प्रतीक बना लिया। हम सभी जानते हैं कि पुलिस को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में आपकी गाड़ी चैक करने का अधिकार दिया जा सकता है। हम यह भी जानते हैं कि पुलिस ऐसा हमारी ही सुरक्षा व्यवस्था के लिए कर रही है, परंतु जैसे ही पुलिस हमारी गाड़ी को रेाकती है, तो हमें यह अपनी शान के  विरूद्घ बात लगती है, और हम पुलिस को बुरा भला कहने तक से भी नही चूकते। जब देश आजाद हुआ था तो १५ अगस्त १९४७ को सायं ५ बजे दिल्ली के इंडिया गेट पर नेहरूजी को झण्डा लहराना था, जहां पर विशिष्ट लोगों के बैठने की अलग व्यवस्था की गयी थी। तब अचानकएक भिखारी आया और उन विशिष्ट कुिर्सयों की ओर बैठने को चल दिया, तो पुलिस वाले ने उसे रोका तब वह कहने लगा तुम्हें पता नही है कि -च्अब हम आजाद हैं?ज्

आज उस भिखारी की सी स्थिति हमारी हो गयी है। हम स्वयं को अति विशिष्ट मानकर चलते हैं, और इसीलिए व्यवस्था में सहायक न बनकर बाधक बनते हैं। हम  भूल जाते हैं कि अतिविशिष्ट या विशिष्ट बनने से पहले दूसरों को विशिष्ट मानना पड़ता है, उन्हें बनने देना पड़ता है, उनकी अवधि पूर्ण होगी तो आप उनके स्थान पर आएंगे।  दादा बनने के लिए पहले बेटा और फिर पिता बनना अनिवार्य है। आप पहले दिन से ही च्दादाज् नही हो सकते। सरकार को चाहिए कि वह देश में राष्ट्रीय चरित्र को विकसित करने के लिए नैतिक शिक्षा अभियान चलाए और लोगों की भी जिम्मेदारी निश्चित करे कि इतना-इतना कार्य तुम करोगे क्योंकि तुम स्वयं व्यवस्था का एक अंग हो और जनता को चाहिए कि वह स्वेच्छा से श्रमदान करने और वैचारिक प्रदूषण को हटाने के लिए जमीनी काम करेगी लोगों में नैतिकता का प्रचार-प्रसार हो, व्यवस्था स्वयं समुन्नत हो उठेगी।

Comment:

mariobet giriş
mariobet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
celtabet giriş
celtabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş