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राजनीति

आप सरकार में नहीं तो अब हम आपके मुलाजिम भी नहीं

नदीम

साल था 2001 और महीना था अगस्त का। यूपी में 13वीं विधानसभा अस्तित्व में थी, जो तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को ‘भूतपूर्व’ कर चुकी थी। पहले मायावती, फिर कल्याण सिंह और उसके बाद राम प्रकाश गुप्त। इनके बीच 24 घंटे के भी एक मुख्यमंत्री हुए थे, नाम था जगदंबिका पाल, जिनके कार्यकाल को सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी दर्ज न करने का आदेश दे रखा है। लेकिन जिस अगस्त 2001 की घटना का जिक्र यहां है, उस वक्त मुख्यमंत्री थे राजनाथ सिंह। राम प्रकाश गुप्त को हटाकर बीजेपी नेतृत्व ने यूपी की कमान उन्हें सौंपी थी। 13वीं विधानसभा के वि चौथे (पाल को मिलाकर पांचवें) मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार में मंत्री हुआ करते थे नरेश अग्रवाल। जब मायावती ने कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया था, तो बहुमत बनाए रखने को कल्याण सिंह ने नरेश अग्रवाल को कांग्रेस से तोड़ा था।

नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस के 22 विधायकों के साथ विद्रोह कर लोकतांत्रिक कांग्रेस के नाम से अलग पार्टी बना ली और सरकार के सहयोगी दल बन गए थे। सरकार ही उनके समर्थन पर थी, इस वजह से पहले कल्याण सिंह, उसके बाद राम प्रकाश गुप्त ने नरेश की घुड़कियां सुनने की आदत बना ली। लेकिन राजनाथ सिंह के साथ मोर्चा खुल गया। अगस्त 2001 में नरेश अपनी पार्टी का सम्मेलन हरिद्वार में पूरे सरकारी लाव-लश्कर के साथ कर रहे थे। पार्टी के सम्मेलन में भी उन्होंने अपने निशाने पर राजनाथ सिंह को ही रखा। राजनाथ सिंह ने नरेश के लखनऊ लौटने का इंतजार नहीं किया। उनकी बर्खास्तगी का पत्र राजभवन भेज दिया। नरेश को फोन लगा कर बताया भी- ‘मैंने आपको बर्खास्त कर दिया है।’ इस घटनाक्रम का रोमांच यहीं खत्म नहीं होता है बल्कि यहां से शुरू होता है।

एसपी-बीएसपी ने मानी चूक
बर्खास्तगी की कोई उम्मीद न करने वाले नरेश अग्रवाल ने हड़बड़ा कर लखनऊ वापसी के लिए जब अपने सरकारी ड्राइवर को बुलाया तो उसने नरेश को अपने साथ ले जाने से ही मना कर दिया, और बोला, ‘साहब, मैं ठहरा सरकारी मुलाजिम। आपका हमारा रिश्ता तभी तक था, जब आप मंत्री थे। अब आप मंत्री नहीं रहे तो मैं आपका मुलाजिम भी नहीं रहा?’ उसके बाद उसने खाली गाड़ी लखनऊ के लिए दौड़ा दी। कहा जाता है कि उसको ऐसा करने के लिए लखनऊ से एक बड़े अफसर का हुक्म हुआ था। नरेश को निजी गाड़ी से लखनऊ आने को मजबूर होना पड़ा। नरेश को अपने सहयोगी विधायकों पर पूरा भरोसा था। हरिद्वार से चलते वक्त उन्होंने मीडिया से दावा किया कि मेरे लखनऊ पहुंचने तक ही राजनाथ सिंह की सरकार है। लेकिन लखनऊ पहुंचने तक नरेश की पार्टी के बाकी विधायकों की निष्ठा भी बदल चुकी थी, उन्होंने राजनाथ सरकार को अपना समर्थन बनाए रखा। नरेश अकेले पड़ चुके थे। नरेश की पार्टी के विधायकों को ‘मैनेज’ करने के बाद ही राजनाथ सिंह ने इतना बड़ा कदम उठाया था।

वैसे बर्खास्तगी से पहले भी नरेश अग्रवाल की किस्मत दांव दे गई थी वर्ना उनके पास भी मुख्यमंत्री बनने का एक मौका आ सकता था। हुआ यह था कि जब इसी विधानसभा के कार्यकाल में कल्याण सिंह की सरकार को गिराकर जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री बने थे तो वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के ही हिस्सा थे। उन्हें एसपी-बीएसपी ने समर्थन दिया था। लेकिन सदन में बहुमत साबित करने के वक्त नरेश अग्रवाल और उनकी लोकतांत्रिक कांग्रेस पाल को अकेला छोड़कर फिर से कल्याण सिंह के साथ हो गई थी। कल्याण सिंह की सरकार जब बच गई तो एसपी और बीएसपी को अपनी चूक का अहसास हुआ। उस वक्त दोनों पार्टियों ने माना था कि अगर पाल के बजाय नरेश अग्रवाल पर दांव लगाया होता तो कल्याण सिंह की वापसी नहीं हो पाती। नरेश ने कल्याण सिंह के साथ वापसी इसी वजह से कर ली थी कि मुख्यमंत्री तो पाल बन रहे हैं, उन्हें क्या मिलेगा? सिर्फ मंत्री पद? जूनियर के कैबिनेट में मंत्री होने से बेहतर है, सीनियर की कैबिनेट का मंत्री होना।

इंदिरा का वह ‘डर’
यह 1977 का चुनाव था। देश में इमरजेंसी के बाद चुनाव हो रहे थे और संजय गांधी अमेठी से चुनाव लड़ रहे थे। सत्ता में बैठे लोगों को जनभावनाओं का अंदाजा नहीं होता क्योंकि उनके पास सूचनाएं पहुंचने का जो जरिया होता है, अधिकतर तो वह सरकारी फिल्टर से होकर से गुजरता है। अमेठी में जिस रोज वोट पड़ रहे थे, उसकी सुबह तक कांग्रेस आत्मविश्वास से भरी बताई जा रही थी। संजय गांधी अमेठी में ही थे और इंदिरा गांधी दिल्ली में। इंदिरा गांधी लगातार अमेठी के वोट प्रतिशत की जानकारी ले रहीं थी। दोपहर बाद तक उन्हें अपने राजनीतिक तर्जुबे से यह यकीन हो गया था कि अमेठी में स्थिति उनके पक्ष में नहीं हैं।

सुल्तानपुर जिले के एक पुराने कांग्रेसी बताते हैं- ‘दोपहर बाद उस वक्त सुल्तानपुर डीएम अफसर हुसैन के पास इंदिरा गांधी का फोन आया था। उन्होंने उनसे संजय की लोकेशन पूछी। डीएम ने बताया कि वह सरकारी गेस्ट हाऊस में हैं। इंदिरा गांधी ने उनसे कहा कि संजय से बोलो, जितनी जल्दी हो सके, मेनका गांधी को लेकर दिल्ली वापस आ जाएं। वहां रुकने की जरूरत नहीं। कुछ भी हो सकता है। संजय को बताया गया। संजय तैयार नहीं हुए। इंदिरा गांधी को सूचना दी गई तो उन्होंने उस अफसर से कहा कि गेस्ट हाऊस को छावनी में बदल दो। लेकिन शाम होते-होते संजय, मेनका के साथ दिल्ली रवाना हो गए।

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