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क्यों हर किसी को शह और मात देने की स्थिति में हैं मोदी ?

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी जिस राजनीति के जरिये सत्ता साध रहे हैं, उसमें केन्द्र की राजनीति हो या क्षत्रपों का मिजाज । दोनों के सामने ही खतरे की घंटी बजने लगी है कि उन्हे या तो पारंपरिक राजनीति छोड़नी पडेगी या फिर मुद्दों को लेकर पारपरिक समझ बदलनी होगी । लेकिन मजेदार सच यह है कि मोदी और आरएसएस एक लकीर पर कितनी दूर कैसे चले और दोनों में से कौन किसे कब बांधेगा यह देखना समझना दिलचस्प हो चला है। आरएसएसएस की ताकत है परिवार। और परिवार की ताकत है बीजेपी की सत्ता। आरएसएस के परिवार में बीजेपी भी है और किसान संघ से लेकर भारतीय मजदूर संघ समेत 40 संगठन। तो चालीस संगठनों को

हमेशा लगता रहा है कि जब स्वयंसेवक दिल्ली की कुर्सी पर बैठेगा तो उनके अनुकूल वातावरण बनेगा और उनका विस्तार होगा। लेकिन सत्ता को हमेशा लगता है कि सामाजिक शुद्दिकरण के लिये तो परिवार की सोच ठीक है लेकिन जब सियासत साधनी होगी तो परिवार को ही सत्ता के लिये काम करना चाहिये यानी उसे बदल जाना चाहिये। इस उहोपोह में एकबार सत्ता और संघ की कश्मकश उसी इतिहास को दोहरा रही है जैसे कभी अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी ने सोच समझ कर दीन दयाल उपाध्याय के दिन को मजदूरों से जोडकर श्रमेव जयते का नारा दिया । और इस नारे को ही मजदूरों के बीच काम करने वाले संघ परिवार संगठन भारतीय मजदूर संघ ने खारिज कर दिया। बीएमएस के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय की माने तो मजदूरो को लेकर प्रधानमंत्री ने मजदूर संगठनों से कोई बात की ही नहीं यहा तक की बीएमएस से भी नहीं तो फिर मजदूरों को लेकर समूचा रास्ता ही औघोगिक घरानों के हित साधने के लिये मोदी सरकार बना रही है।

अगर संघ परिवार के मजदूर संघठन के तेवर देखें तो ब्रजेश उपाध्याय बिलकुल उसी तर्ज पर सरकार की मजदूर नीतियों का विरोध कर रहे है जैसे 2001 में हंसमुखभाई दवे ने वाजपेयी सरकार के एफडीआई को लेकर किया था। या फिर वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्री यशंवत सिन्हा का विरोध स्वदेशी जागरण मंच संभाले दत्तापंत ठेंगडी ने 2001-02 के दौरान इस हद तक खुलकर किया था कि तब सरकार को वित्त मंत्री बदलना पड़ गया था । लेकिन तब के स्वयंसेवक वाजपेयी के पीएम होने और अब के पीएम मोदी के होने का फर्क भी आरएसएस समझ रहा है। इसलिये बीएमएस का मजदूर नीतियों को लेकर विरोध या किसानों को लेकर सरकार की खामोश निगाहो से परेशान किसान संघ की खामोशी कोई गुल खिला सकती है यह सोचना भी फिलहाल चमकते हुये सूरज को विरोध का दीया दिखाने के ही समान होगा। क्योंकि जिस आरएसएस को लोग भूल रहे थे नरेन्द्र मोदी की पीएम बनने के बाद उसी आरएसएस को लेकर गजब का जुनुन देश में शुरु हुआ है। आलम यह हो चला है कि तीन साल पहले जहा आरएसएस की साइट पर सिर्फ दो से तीन हजार लोग ही दस्तक देते थे, वह आज की तारिख में हर महींने आठ हजार तक पहुंच गई है । असल में संघ से प्रेम की यह रफ्तार अयोध्या आंदोलन के दौर में भी नहीं थी। और यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस दौर में

अयोध्या आंदोलन समूचे देश की राजनीति को प्रभावित कर रहा था, उस वक्त आरएसएस का सदस्य बनने के बदले विश्व हिन्दू परिषद का सदस्य बनने की होड़ देश में लगी थी। और 1990-92 के दौरान ही दो लाख लोगों ने विहिप का दरवाजा खटखटाया था। इसी तरह 1996 से 1999 तक के दौरान बीजेपी को लेकर आम लोगों में गजब का जुनुन था और आरएसएस से ज्यादा बीजेपी के सदस्य बनने की होड़ देशभर में शुरु हुई थी। उस वक्त बीजेपी ने सदस्य बनाने की मुहिम भी शुरु की थी। तमाम राजनीतिक दल से अलग दिखने की सोच तब बीजेपी में थी लेकिन जब स्वयंसेवक प्रचारक वाजपेयी पीएम बने तो अलग दिखने की सोच सबसे पहले आरएसएस की ही ढही। लेकिन मौजूदा मोदी सरकार को लेकर आरएसएस की उड़ान सपनों के भारत को संजोने और बनाने की है। और पहली बार आरएसएस के भीतर के छुपे हुये राजनीतिक गुण को ही 2014 के लोकसभा चुनाव में उडान मिली है तो वह अब खुल कर राजनीतिक बिसात बिछाने से भी नहीं कतरा रहा है और यह संकेत देने भी देने लगा है कि बीजेपी की सत्ता के पीछे असल ताकत संघ परिवार की है।

इसलिये पहली बार आरएसएस का कार्यकारी मंडल लखनऊ में बैठकर यूपी की सियासी बिसात को समझना भी चाहता है और किस रास्ते हिन्दू वोटरों में अलख जगाना है और वीएचपी सरीखे संगठन के जरीये विराट हिन्दुत्व का समागम राजनीतिक तौर पर कैसी बिसात बिछा सकता है इसे भी टटोल रहा है। यानी पहली बार सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस खुद की सक्रियता चुनाव में वोटरों की तादाद को बढाने से लेकर हिन्दुत्व सक्रियता को राजनीतिक पटल पर रखने में जुटा है वही चौबिस घंटे तीनसौ पैसठ दिन राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दल अभी भी चुनावी जीत हार को उसी खाके में रख रहे है जहां जीत हार सिर्फ संयोग है । और तमाम दल मान यही रहे हैं कि हर बार तो कोई जीत नहीं सकता है तो कभी काग्रेस जीती कभी बीजेपी कभी क्षत्रपों का राज आ गया। यानी राजनीति बदल रही है और पारंपरिक राजनीति छोडनी होगी, इसे राजनीतिक दल मान नहीं रहे हैं तो कोई दल या कोई नेता नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के हालात में भी नहीं आ पा रहा है। और बदलती राजनीति का खुला नजारा हर किसी के सामने है। क्योंकि पहली बार अपने बूते देश की सत्ता पर काबिज होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तेवर के साथ गांव,किसान,मजदूर से लेकर कारपोरेट और औघोगिक घरानों को भी मेकइन इंडिया से जोडने की बात भी कही और राज्य के चुनाव का एलान होते ही महाराष्ट्र और हरियाणा के गली कूचों में रैली करनी शुरु की उसने अर्से बाद बदलती राजनीति के नये संकेत तो दे ही दिये। मसलन नेता सत्ता पाने के बाद सत्ता की ठसक में ना रहे बल्कि सीधे संवाद बनाना ही होगा। राष्ट्रीय नीतियों का एलान कर सरकार की उपलब्धियों का खांका ना बताये बल्कि नीतियों को आम लोगों से जोडना ही होगा और -विकास की परिभाषा को जाति या धर्म में बांटने से बचना होगा। ध्यान दें तो लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में हर बडे राजनेता या राजनीतिक दल का संकट यही हो चला है कि वोटर अपने होने का एहसास नेताओं के बात में कर नहीं पा रहा है जबकि मोदी वोटरों को जोडकर संवाद बनाने में लगातार जुटे हैं। यानी चुनावी जीत की मशीन भी कोई केन्द्र सरकार हो सकती है कोई पीएम हो सकता है, इसका एहसास पहली बार देश को हो रहा है। इससे कांग्रेस की मुश्किल है कि वह सेक्यूलर राग के आसरे अब सत्ता पा नहीं सकती है । क्षत्रपों की मुश्किल है जातीय समीकरण के आसरे वोटबैंक बना नहीं सकते हैं। राजनीतिक गठबंधन की मुश्किल है कि जीत के आंकड़ों का विस्तार सिर्फ राजनीतिक दलों के मिलने से संभव नहीं होगा । और यह तीनो आधार तभी सत्ता दिला सकते है जब देश के सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को समझते हुये राजनीति की जाये ।

ध्यान दें तो नरेन्द्र मोदी ने बेहद बारीकी से अपने भाषणों में उस आर्थिक सुधार को ही निशाने पर लिया है, जिसने मंडल-कंमल की राजनीति को बदला। जिसने भारत को बाजार में बदल दिया । यानी बीते 20 बरस की राजनीति के बाद से भारत में हर सरकार की सियासी अंटी से सिर्फ घोटाले और भ्रष्ट्रचार ही राजनीति के बाजार में सबसे महत्वपूर्ण हो गये। और इस दौर का आक्रोष ही नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों में कुछ इस तरह से छलका जिससे लोगो में भरोसा जागा। और शायद राजनीतिक तौर तरीके यही से बदलने शुरु हो गये हैं। क्योंकि कांग्रेस ही नहीं बल्कि शरद पवार हो या चौटाला। उद्दव ठाकरे हों या फिर यूपी-बिहार के क्षत्रप । ध्यान दें तो बीते बीस तीस बरस की इनकी राजनीति में कोई अंतर आया नहीं है जबकि इस दौर में दो पीढियां वोटर के तौर पर जन्म ले चुकी हैं। और मोदी फिलहाल इसे साधने में मास्टर साबित हो रहे हैं, इससे इंकार किया नहीं जा सकता । ध्यान दें तो सत्ता संभालने के 140 दिनों के भीतर बतौर पीएम ऐलानो की झडी जिस अंदाज में कालाधन, गंगा सफाई,जजों की नियुक्ती,जनधन योजना, -ई गवर्नेस-, स्कील इंडिया, डिजिटल इंडिया, -मेक इन इंडिया,आद्रर्श गांव .स्वच्छ भारत और श्रमेवजयते की लगायी उससे मैसेज यही गया कि कमोवेश हर तबके के लिये कुछ ना कुछ । हर क्षेत्र को छूने की कवायद। बिगडे हुये सिस्टम को संवारने की सोच और सियासत साधने के तरीके। यानी मोदी ने हर नारे के आसरे पीछली सरकारों के कुछ ना करने पर अंगुली उठाकर अपने तरफ उठने वाली हर अंगुली को रोका भी। सवाल यह उठ रहे हैं कि नारों की जमीन क्या वाकई पुख्ता है या फिर पहली बार प्रधानमंत्री खुद ही विपक्ष की भूमिका निभाते हुये हर तबके की मुश्किलों

को उभार रहे है और कुछ करने के संकेत दे रहे हैं।

ध्यान दें तो कांग्रेस अभी भी खुद को विपक्ष मानने के हालात में नही आया है । हो सकता है इतिहास में सबसे निचले पायदान पर पहुंची कांग्रेस अभी भी सदमें में हो या फिर इस खुशफहमी में हो कि उनकी नीतियों का नाम बदल कर नरेन्द्र मोदी दिलों को जीतना चाह रहे हैं। लेकिन समझना यह भी होगा कि प्रधनामंत्री मोदी बिना किसी बैग-बैगेज के पीएम बने है तो वह हर दबाब से मुक्त है इसलिये एलान करते वक्त नरेन्द्र

मोदी नायक भी है और एलान पूरे कैसे कब होंगे इसके लिये कोई ब्लू प्रिंट ना होने के कारण खलनायक भी है । लेकिन शरद पवार, उद्दव ठाकरे या चौटाला सरीखे नेता अगर मोदी को खलनायक कहेगें तो वोटरों के लिये तो मोदी नायक खुद ब खुद हो जायेगें क्योंकि मौजूदा वक्त में विपक्ष किसी भूमिका में है ही नहीं। शायद इसीलिये जब मजदूरो के लिये श्रममेव जयते का जिक्र पीएम मोदी करते है तो यह हर किसी को अनूठा भी लगाता है लेकिन मौलिक सवाल और कोई नहीं आरएसएस की शाखा बीएमएस यह कहकर उठाती है कि मजदूरों की मौजूदगी के बगैर श्रममेव जयते का मतलब क्या है । असल खेल यही है कि संघ परिवार ही मोदी की उस सियासत को साधेगा जिस सियासत में होने वाले हर एलान की जमीन पोपली है । और संघ चाहता है कि मोदी पोपली जमीन को भी पुख्ता करते चले। यानी पहली बार देश के बदले हुये राजनीति हालात के सामने कैसे हर राजनीति दल सरेंडर कर चुका है और जिस संघ ने मोदी को विजयी घोड़े पर बैठाया वहीं विरोध भी कर रहा है । तो संकेत साफ है पहली बार मोदी को राजनीतिक चुनौती देने वाला या चुनौती देते हुये दिखायी देने वाला भी कोई नहीं है इसलिये अब मोदी वर्सेस आल की थ्योरी तले गठबंधन के आसरे चुनावी जीत की बिसात को ही हर राज्य , हर राजनीति दल देख रहा है। और यही मोदी की जीत है।

लेखक इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं

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