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भारतीय संस्कृति

सार्थक जीवन जीने की करें नई पहल


ललित गर्ग

इस दुनिया में सबसे ज्यादा मूल्यवान है जीवन। और भी बहुत सारी वस्तुएं हैं जिनका मूल्य है किन्तु तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो सबसे अधिक मूल्य है जीवन का। जीवन के होने पर सब कुछ है। जीवन न हो तो कुछ भी नहीं है। जिसके होने पर अन्य सबका अस्तित्व सामने आता है, उसका मूल्य कितना हो सकता है, इसको हर कोई समझ सकता है। दुनिया में जीना और मरना लगा रहता है। बड़ी बात यहां आने या जाने की है भी नहीं। जो बात खास है, वह ये कि इस बीच किसने, जिंदगी को कैसे जिया। कुछ लोग होते हैं, जिनके किए कामों की उम्र उनके शरीर की उम्र से बड़ी होती है। कवि कुंवर नारायण अपनी कविता में कहते हैं, ‘समय हमें कुछ भी साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता, पर अपने बाद अमूल्य कुछ छोड़ जाने का भरपूर अवसर देता है।’
जीवन को अविस्मरणीय एवं यादगार बनाने के लिये व्यक्ति के सम्मुख मुख्य प्रश्न है- वह जीता कैसे है? जीना एक बात है और कैसे जीना बिल्कुल दूसरी बात है। यदि वह कलात्मक ढंग से जीता है तो जीवन बहुत सार्थक और सफल बन जाता है। यदि वह जीवन को जीना नहीं जानता, जीने की कला को नहीं जानता तो जीवन नीरस, बोझिल और निरर्थक जैसा प्रतीत होने लग जाता है। इसलिए आवश्यक है सकारात्मक सोच। जीवन के प्रति हर क्षण जागरूक होना।

जीवन में अच्छा या बुरा, सब होता रहता है। मायने इसी बात के हैं कि आपके जेहन में क्या चल रहा है? आप क्या सोच रहे हैं? अपनी सोच के अलावा किसी और चीज पर हमारा काबू भी नहीं होता। हमारे ज्यादातर दुख हमारी अपनी उम्मीदों से पैदा होते हैं। जो हो रहा होता है, उसके लिए हमारे दिमाग में कोई और ही तस्वीर होती है। नतीजा ये कि ‘जो है’ से ज्यादा हम ‘जो होना चाहिए’ उसी पर सोचते रह जाते हैं। यही कारण है कि वर्तमान की जीवनशैली अच्छी नहीं मानी जा रही है। भागदौड़, स्पर्धा, उतावली, हड़बड़ी आदि ऐसे तत्व जीवन में समा गये हैं जो जीवन को सार्थक नहीं बना रहे हैं। शरीर स्वस्थ रहे, यह जीवन का लक्ष्य है। दूसरा लक्ष्य है मन स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे। तीसरा लक्ष्य है भावनाएं स्वस्थ रहें, निर्मल रहे। निषेधात्मक विचार न आएं, विधायक भाव निरंतर बने रहें, मैत्री और करुणा का विकास होता रहे। ये सब जीवन के उद्यान को हरा-भरा बनाने के लिए जरूरी है।
आज चारों ओर से एक स्वर सुनाई दे रहा है- वर्तमान की जीवनशैली अच्छी नहीं है, उसमें परिवर्तन होना चाहिए, वह बदलनी चाहिए। किन्तु जीवनशैली कैसे बदले? यह एक बड़ा प्रश्न है। हम अपने मन की कम जीते हैं, दूसरों की परवाह ज्यादा करते हैं। यही वजह है कि हम अकसर नाखुश दिखते हैं। तो क्या करें? कहा जाता है कि हमेशा अच्छे मकसद के लिए काम करें, तारीफ पाने के लिए नहीं। खुद को जाहिर करने के लिए जिएं, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। ये कोशिश ना करें कि लोग आपके होने को महसूस करें। काम यूं करें कि लोग तब याद करें, जब आप उनके बीच में ना हों।
पारिवारिक और सामुदायिक जीवन में अनेक व्यक्ति साथ होते हैं। ऐसे में रुचि भेद, विचार भेद, चिंतन भेद स्वाभाविक है। सब लोग एक रुचि वाले और एक दृष्टि से सोचने वाले हों, यह संभव नहीं है। जहां इस तरह के भेद हों वहां टकराव और संघर्ष भी होंगे। इससे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रश्न है- क्या आदमी सदैव संघर्ष का ही जीवन जीयेगा? सदा लड़ता-झगड़ता और मरता-मारता ही रहेगा? नहीं, इसका एक दूसरा पक्ष भी है, जहां अनेक है, वहां सह-अस्तित्व भी है, साथ में रहना है, साथ में जीना है। विरोध है किन्तु विरोध नहीं भी है। सह-अस्तित्व के बीज भी उसी भूमि में बोये हुए हैं। हम उन सह-अस्तित्व के बीजों को अंकुरित करने का प्रयत्न करें। सह-अस्तित्व के लिए आवश्यक है- एक-दूसरे की भावना को समझें, एक-दूसरे के विचारों का मूल्यांकन करें। मैं अपने विचारों को सत्य मानता हूं, दूसरा अपने विचारों को सत्य मानता है, झगड़ा तब शुरू होता है, जब दूसरे के विचारों को असत्य बताया जाता है। इस संदर्भ में हमें चिंतन करना होगाµ‘तुम अपने विचारों को सत्य मानो, किन्तु दूसरे के विचारों में भी सच्चाई खोजने का प्रयत्न करो। यदि यह मार्ग उपलब्ध हो जाता है तो सह-अस्तित्व की आधार-भूमि निर्मित हो जाती है। यह सूत्र हमारे सामने जीवन की सार्थकता को प्रस्तुत करता है, जीवन को आनंदमय बना देता है।
कितनी ही बार हम ऐसी बातों पर चिंता कर रहे होते हैं, जिनकी वास्तव में जरूरत ही नहीं होती। हम जरूरत से ज्यादा तनाव लेते हैं और बेवजह सोचते रहते हैं। दिक्कत यह है कि हम एक साथ सब साध लेना चाहते हैं। जहां खुद को धीमा करने की जरूरत होती है, हम बेचैन हो जाते हैं। लेखिका जे के रोलिंग कहती हैं, ‘कितनी ही बार प्रश्न जटिल होते हैं और उनके जवाब बेहद आसान।’
जो व्यक्ति आत्मिक धरातल पर नहीं जीता, आत्मा की अनुभूति नहीं करता, वह जीवन को यादगार कैसे बनाएगा? जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने का एक सूत्र है – संवेदनशीलता। दूसरों को कष्ट देते समय यह अनुभूति हो रही कि यह कष्ट मैं दूसरों को नहीं, स्वयं को दे रहा हूं। यही संवेदनशलीता है। जिस समाज में संवेदनशीलता नहीं होती, वह समाज अपराधियों, हत्यारों या क्रूरता के खेल खेलने वालों का समाज बन जाता है। उसे सभ्य और शिष्ट समाज नहीं कहा जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि समाज में संवेदनशीलता का विकास हो। व्यक्ति हो या वस्तु, भावनाओं से जुड़ी चीजें हमारे लिए खास होती हैं। उनका पास होना हर कमी को दूर कर देता है। तब मन हर समय कुछ और पाने के लिए बेचैन नहीं रहता। मन पर काबू होता है तो एक भी सुख देता है, वरना भंडार भी रीते ही लगते हैं। अमेरिकी लेखक लियो बुचाग्लिया कहते हैं, ‘एक गुलाब मेरा बगीचा हो सकता है और एक व्यक्ति मेरी दुनिया।’
इंसान अपनी सोच का गुलाम होता है, जबकि सब अच्छा होगा, यह सोच लेने से ही सब ठीक नहीं हो जाता। ना ही बुरा सोचते रहने से ही सब बुरा हो जाता है। सोच का असर पड़ता है, पर अंत में जो बात मायने रखती है वो यह कि आप करते क्या हैं? लेखक विलियम आर्थर वार्ड कहते हैं, ‘निराशावादी हवा की गति की शिकायत करता है। आशावादी उसके बदलने की उम्मीद रखता है, लेकिन यथार्थवादी हवा के साथ नाव का तालमेल बिठाता है।’
हर इंसान खुद को खुश और स्वस्थ रखने के लिए क्या-क्या नहीं करता। कुछ कोशिशों का फायदा भी होता है, पर ज्यादातर हम खुद को बहलावे में ही रख रहे होते हैं। भीतर कुछ होता है और बाहर कुछ और दिखाते हैं। यही वजह है कि खुशी टिकती नहीं और बेचैनियां कम नहीं होतीं। मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉयड ने कहा था, ‘स्वयं के साथ पूरी तरह ईमानदार बने रहना ही सबसे अच्छी आदत है।’ इसी से एक नए वातावरण की सृष्टि होती है, जीवन सुखद बनता है। 

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