बिखरे मोती : आत्मा के दिव्य गुणों का वर्धन कीजिए

आत्मा के दिव्य गुणों का वर्धन कीजिए:-

भक्ति में बाधक राग और द्वेष

जब तक राग और द्वेष हैं,
मन में रहे तनाव।
भक्ति को बाधित करें,
टिके न भगवद् – भाव॥1638॥

परमात्मा का प्रिय, कोई बिरला ही होता है:-

प्रभु प्यारे को सब चुनें,
प्रभु चुनें कोई एक।
उस पर कृपा सब करें,
जिस पर करें शिवेक॥1139॥

सागर में सृष्टि सुन्दरतम:-

सुन्दर सृष्टि सिन्धु में,
निरख नैन हों दंग।
नीले सागर में भरे,
कैसे अनुपम रंग॥1640॥

आत्मा के दिव्य गुणों का वर्धन कीजिए:-

आत्मा के गुणों को बढ़ा,
दिव्यता चेरी होय,
जीवन बिता अध्यात्म में,
मत इसे वृथा खोय॥1641॥

व्याख्या:- मानव-योनि ऐसी योनि है जिसमें जरा – सी चूक मानव को दानव बना सकती है और यदि मानव आत्मा को मलविक्षेप का परिमार्जन करे और आत्मा के दिव्य गुणों का वर्धन करे तो वह दिव्यता को प्राप्त होता है, मनुष्यत्त्व से देवत्त्व को प्राप्त होता है, यहां तक कि भगवन्ता को प्राप्त होता है। उसके आभामण्डल का आभूषण दिव्यता होती है, यश, तेज,लक्ष्मी पराक्रम और सामर्थ्य उसके पीछे- पीछे चलते हैं।उसकी वाणी गण्या, प्रशस्या और प्रभावी होती है,उसके चेहरे की सोम्यता दर्शनीय और वन्दनीय होती है।
अब प्रश्न उठता है कि आखिर आत्मा के वे कौन से दिव्य गुण हैं,जिनसे मनुष्य देवत्त्व और भगवत्ता को प्राप्त करता है। आत्मा के दिव्य गुण निम्नलिखित हैं:- शान्ति, प्रेम, आनन्द, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, ज्ञान, (विद्या) धैर्य, शौर्य, साहस, उत्साह,स्नेह, श्रद्धा, न्याय, निष्ठा, दया, करुणा, तप, त्याग, तितिक्षा, उपरति, मैत्री, दम (संयम), आस्था, विश्वास,सुचिता, पवित्रता, ऋजुता (कुटिलता रहित होना, सरलता) मार्दवता (अन्तः करण की कोमलता) उदारता, दानशीलता, निर्भीकता,निष्पक्षता, परोपकारिता, कृतज्ञता, क्षान्ति, समवेदना, सद्भावना, गुणग्राहकता, कृतज्ञता, कर्तव्य-बोध, आत्मनिष्ठा और ब्रह्मनिष्ठा होना इत्यादि, ऐसे दिव्य गुण है, जो मनुष्य को देवत्त्व और भगवत्ता को प्राप्त कराते हैं।
आत्मा के ये दिव्यगुण मानस के मानसरोवर में मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्राप्त कराने के लिए प्रभु ने अनमोल मोती प्रदान किए हैं। महर्षि रमण ने अध्यात्म की परिभाषा देते हुए कहा था – “आत्मा का अपने स्वभाव में लौटना, उसमें रमण करना ही अध्यात्म कहलाता है।” इसी संदर्भ में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं -‘ स्वभावोअध्यात्म मुच्यते।’ गीता 8/3 इसलिए है मनुष्य! मानव- जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है। इसे व्यर्थ मत गवा, इसे अध्यात्म में व्यतीत कर जीवन के अन्तिम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कर को प्राप्त कर ताकि तेरा मानव-जीवन सफल और सार्थक सिद्ध हो सके।
क्रमशः

Comment: