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आइये जाने ह्रदय रोग के ज्योतिष कारण एवं उनका निवारण

पं0 दयानंद शास्‍त्री

सभी जानते हैं कि कुण्डली का छठा भाव रोग का होता है तथा छठे भाव का कारक ग्रह मंगल होता है। द्वितीय (मारकेश), तृतीय भाव, सप्तम भाव एवं अष्टम भाव(मृत्यु) का है। हृदय स्थान की राशि कर्क है और उसका स्वामी ग्रह चन्द्रमा जलीय है। हृदय का प्रतिनिधित्व सूर्य के पास है जिसका सीधा सम्बन्ध आत्मा से है। यह अग्नि तत्त्च है। जब अग्नि तत्त्व का संबंध जल से होता है तभी विकार उत्पन्न होता है। अग्नि जल का शोषक है। जल ही अग्नि का मारक है।पूरे विश्व में हृदय के दौरे से मरने वाले लोगों की संख्या अन्य रोगों से मरने वालों की संख्या से अधिक है। अकेले अमेरिका जैसे विकसित देश में ही पांच लाख लोग हृदय रोग से प्रतिवर्ष मर जाते हैं। ये आंकड़े तो तब हैं जब 1963 से अब तक हृदय रोग से होने वाली मौतें 50 प्रतिशत तक कम हो गई हैं हृदय रोग, हृदय की मांसपेशी को रक्त कम या न मिलने से उत्पन्न होता है। इसमें केवल आॅक्सीजन का कम मिलना ही नहीं बल्कि अन्य पोषक तत्वों का न मिलना, हृदय की मांसपेशी की क्रियाओं के उपरांत उत्पन्न कार्बन डाइ आॅक्साइड का रक्त में से निष्कासन न होना भी शामिल है। 90 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों में रक्त के बहाव की कमी का कारण ऐथेरोस्कलेरोसि होता है।

 कई वर्षों से धीरे-धीरे एथेरोस्क्लोरि¬सिस के थक्के धीरे-धीरे शरीर की छोटी, बड़ी सभी धमनियों को ग्रस्त करते रहते हैं। जब ये थक्के कोरोनरी धमनियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं, तब हृदय रोग के लक्षण धीरे-धीरे या फिर अचानक भी महसूस होते हैं। जिन्हें मधुमेह रोग हो या कभी हृदय का दौरा पड़ा हो या फिर उम्र ज्यादा हो, उन्हें जब हृदय का दौरा पडता है तो उनमें से शायद ही 50 प्रतिशत लोग अस्पताल तक पहुंच पाते हैं। इलाज: सीधा है, और वह है किसी हृदय चिकित्सा केंद्र या फिर किसी अस्पताल में भर्ती होना और अपने आप को चिकित्सकों की मर्जी पर छोड़ देना।

 बचाव:—

 एक बार हृदय का दौरा पड़ जाए तो शायद आपके ग्रह अच्छे हों अथवा कोई चमत्कार हो कि आप बच जाएं, अन्यथा बचना असंभव है।

हृदय रोग से बचने के लिए क्या-क्या करें:—-

भोजन ऐसा करें जो पूर्णतः शाकाहारी हो।

जहां तक हो सके, अंकुरित पदार्थ कच्चा ही या भाप द्वारा पकाकर खाएं।

सोयाबीन या इससे बने पदार्थों जैसे, दूध, दही, पनीर आदि का नित्य सेवन करें। या फिर दाल के स्थान पर सोयाबीन की बड़ी इस्तेमाल करें।

प्रत्येक समय भोजन के साथ एक-एक फल अवश्य लें।

प्रतिदिन कम से कम दो से तीन प्रकार की हरी सब्जियां लें।

रात्रि के भोजन में पत्तेदार सब्जी या साग जरूर लें।

प्रतिदिन 500 से 600 ग्राम तक सलाद अवश्य लें।

प्रतिदिन 20 से 25 ग्राम तक मेवा अवश्य लें।

अंकुरित कर 5 ग्राम मेथी अगर अनुकूल हो तो खाएं। 20 ग्राम तक अलसी के बीज अवश्य खाएं।

गेहूं की घास या ज्वारे नियम से प्रतिदिन खाएं। शकरकंद  का सेवन करें।

प्रतिदिन ऊंट की तरह पानी पीएं।

अप्राकृतिक पेय पदार्थ, पेप्सी, कैंपा कोला, कोका कोला इत्यादि न पीएं।

डिब्बा बंद पदार्थ, अधिक नमक युक्त पदार्थ न खाएं।

मांस, मछली, अंडा आदि न खाएं और न किसी को खाने दें।

धूम्रपान तथा शराब का सेवन न करें।

गुस्सैल व्यक्तित्व को हंसमुख व्यक्तित्व में बदलने का प्रयास करें।

समय समय पर मधुमेह रोग का पता लगाने हेतु  रक्त जांच कराते रहें।

खाली न बैठें, क्योंकि खाली दिमाग गुस्से, शैतान, चिंता तथा हृदय रोग का घर होता है

आइये जाने ह्रदय रोग के ज्योतिषीय कारण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लग्न कुण्डली के प्रथम भाव के नाम आत्मा, शरीर, होरा, देह, कल्प, मूर्ति, अंग, उदय, केन्द्र, कण्टक और चतुष्टय है। इस भाव से रूप, जातिजा आयु, सुख-दुख, विवेक, शील, स्वभाव आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। लग्न भाव में मिथुन, कन्या, तुला व कुम्भ राशियाँ बलवान मानी जाती हैं।

इसी प्रकार षष्ठम भाव का नाम आपोक्लिम, उपचय, त्रिक, रिपु, शत्रु, क्षत, वैरी, रोग, द्वेष और नष्ट है तथा इस भाव से रोग, शत्रु, चिन्ता, शंका, जमींदारी, मामा की स्थिति आदि बातों का अध्ययन किया जाता है। प्रथम भाव के कारक ग्रह सूर्य व छठे भाव के कारक ग्रह शनि और मंगल हैं।

जैसा कि स्पष्ट है कि देह निर्धारण में प्रथम भाव ही महत्वपूर्ण है ओर शारीरिक गठन, विकास व रोगों का पता लगाने के लिए लग्न, इसमें स्थित राशि, इन्हें देखने वाले ग्रहों की स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अलावा सूर्य व चन्द्रमा की स्थिति तथा कुण्डली के 6, 8 व 12वां भाव भी स्वास्थ्य के बारे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

मंगल जब चन्द्र राशि में चतुर्थ भाव में नीच राशि में बैठता है तब वह अपने सत्त्व को खो देता है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु, शनि जब एक दूसरे से विरोधात्मक सम्बन्ध बनाते हैं तो विकार उत्पन्न होता है।

हृदय रोग में सूर्य(आत्मा व आत्मबल) अशुद्ध रक्त को फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को पहुंचाता है, चन्द्रमा रक्त, मन व मानवीय भावना, मंगल रक्त की शक्ति, बुध श्वसन संस्थान, मज्जा, रज एवं प्राण वायु, गुरु फेफड़े व शुद्ध रक्त, शुक्र मूत्र, चैतन्य, शनि अशुद्ध रक्त, आकुंचन का कारक है।

जिन व्यक्तियों का मंगल अच्छा नहीं होता है, उनमें क्रोध और आवेश की अधिकता रहती है। ऐसे व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर भी उबल पड़ते हैं। अन्य व्यक्तियों द्वारा समझाने का प्रयास भी ऐसे व्यक्तियों के क्रोध के आगे बेकार हो जाता है। क्रोध और आवेश के कारण ऐसे लोगों का खून एकदम गर्म हो जाता है। लहू की गति (रक्तचाप) के अनुसार क्रोध का प्रभाव भी घटता-बढ़ता रहता है। राहू के कारण जातक अपने आर्थिक वादे पूर्ण नहीं कर पाता है। इस कारण भी वह तनाव और मानसिक संत्रास का शिकार हो जाता है।

मकर राशि में 28 अंश पर मंगल उच्चा के होते हैं तथा कर्क राशि में नीच के होते हैं। मंगल वीर, योद्धा, खूनी स्वभाव और लाल रंग के हैं। अग्नि तत्व व पुरूष प्रधान तथा क्षत्रिय गुणों से युक्त है। यह राशि मस्तिष्क, मेरूदण्ड तथा शरीर की आंतरिक तंत्रिकाओं पर विपरीत प्रभाव डालती है। लग्न में यह राशि स्थित हो तथा मंगल नीच के हो या बुरे ग्रहों की इस पर दृष्टि हो तो ऎसा जातक उच्चा रक्तचाप का रोगी होगा। आजीवन छोटी-मोटी चोटों का सामना करता रहेगा। सीने में दर्द की शिकायत रहती है और ऎसे जातक के मन में हमेशा इस बात की शंका रहती है कि मुझे कोई जहरीला जानवर ना काट ले। परिणाम यह होता है कि ऎसे जातक का आत्म विश्वास कमजोर हो जाता है और उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है जो अनावश्यक रूप से विविध प्रकार की मानसिक बीमारियों का कारण होती है।

कुंडली में सूर्य की अवस्था हृदय की स्थिति की सूचक होती है। सूर्य समस्त सृष्टि में ऊर्जा एवं ताप का स्रोत है और यही कारण है कि वह जैविक देह में हृदय का सूचक है।

हृदय रोग की संभावना उस समय बढ़ जाती है जब सूर्य दुष्प्रभावित हो रहा हो। इसके अतिरिक्त सूर्य की राषि सिंह भी महत्वपूर्ण है । हृदय रोग मुख्यतः दो स्वरूपों में दृष्टिगोचर होता है पहला हृदयघात जो कि अकस्मात होता है तथा उसका किसी प्रकार का पूर्वाभास रोगी को नहीं होता और दूसरी समस्या वाल्व संबंधी । हृदय में अनेक छोटे छोटे सूराख सदृश वाल्व हाते हैं जो  रुधिर के एकतरफा बहाव को नियंत्रित करते हैं ।

ये वाल्व प्रत्येक हार्ट धड़कन के साथ ही बंद होते हैं तथा रुधिर के पुनरागमन को बाधित करते हुए रक्तचाप को भी नियंत्रित करते हैं । इन वाल्व में उत्पन्न सिकुड़न या इनका बंद होना जानलेवा हो जाता है। हृदय की तरफ जाने वाली सभी धमनियों की स्थिति बुध द्वारा प्रदर्षित होती है तथा शरीर के किसी भी अंग में कोई सिकुड़न या खराबी का कारण शनि होता है ।

व्यक्ति के मस्तिष्क की अवस्था मंगल द्वारा प्रदर्षित होती है तथा रक्त एवं रक्त चाप चंद्रमा एवं कर्क राषि द्वारा देखे जाते हैं। हृदयाघात के अधिकांश प्रकरणों में देखा जा सकता है कि इसका मूल कारण कोई आकस्मिक मानसिक आघात होता है।

इस प्रकार के प्रकरणों में सूर्य एवं चंद्रमा पर मंगल का दुष्प्रभाव देखा गया है । मंगल एवं चंद्रमा संयुक्त रूप से व्यक्ति की मानसिक अवस्था के द्योतक होते हैं।

यदि मंगल युति अथवा दृष्टि से चंद्रमा को दुष्प्रभावित कर रहा हो तो व्यक्ति में असामान्य रक्तचाप की शिकायत देखने में आती है तथा जब यह सूर्य को भी प्रभावित करें और दषा, अंतर्दषा एवं गोचरवष इन तीनों का सामूहिक प्रभाव हो तब व्यक्ति किसी मानसिक आघात से पीड़ित होकर हृदयाघात की अवस्था में चला जाता है ।

इस प्रकार का आघात शनि, राहु एवं केतु भी उत्पन्न कर सकते हैं बषर्ते वे सूर्य एवं चंद्रमा को दुष्प्रभावित कर रहे हों ।

छठे भाव में स्थित ग्रह या उसके स्वामी तथा बाधक स्थानाधिपति या बाधक भाव में उपस्थित ग्रह की दषा, अंतर या प्रत्यंतर में युति कब होती है।

यदि इसके साथ ही प्रबल मारकेष भी किसी रूप में कार्यरत हो रहा है, तो मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्ट होगा, किंतु एकादषेष या एकादष भाव में उपस्थित ग्रह की भी किसी रूप में दषा, अंतर या प्रत्यंतर हो तो व्यक्ति निःसंदेह उपचार से निरोग हो जाएगा।

यदि दषानाथ, अंतरनाथ या प्रत्यंतरनाथ केतु या शनि हो अथवा केतु से युत कोई ग्रह हो तो ऐसी अवस्था में शल्य चिक्त्सिा के योग बनते हैं, किंतु शल्य चिकित्सा द्वारा रोग ठीक होने के लिए आवष्यक है कि शनि अथवा केतु कंुडली में सकारात्मक अवस्था में उपस्थित हो, अन्यथा शल्य चिकित्सा सफल नहीं हो पाती है तथा अन्य पीड़ाएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। बुध पर यदि शनि एवं केतु का प्रभाव हो तो एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी हो सकती है

हृदय रोग के अनेक ज्योतिष योग हैं जोकि इस प्रकार हैं-

—पंचमेश द्वादश भाव में हो या पंचमेश-द्वादशेश दोनों ६,८,१२वें बैठे हों, पंचमेश का नवांशेश पापग्रह युत या दृष्ट हो।

—-पंचमेश या पंचम भाव सिंह राशि पापयुत या दृष्ट हो।

—-पंचमेश व षष्ठेश की छठे भाव में युति हो तथा पंचम या सप्तम भाव में पापग्रह हों।

—-चतुर्थ भाव में गुरु-सूर्य-शनि की युति हो या मंगल, गुरु, शनि चतुर्थ भाव में हों या चतुर्थ या पंचम भाव में पापग्रह हों।

—पंचमेश पापग्रह से युत या दृष्ट हो या षष्ठेश सूर्य पापग्रह से युत होकर चतुर्थ भाव में हो।

—वृष, कर्क राशि का चन्द्र पापग्रह से युत या पापग्रहों के मध्य में हो।

—-षष्ठेश सूर्य के नवांश में हो।

—चतुर्थेश द्वादश भाव में व्ययेश के साथ हो या नीच, शत्राुक्षेत्राी या अस्त हो या जन्म राशि में शनि, मंगल, राहु या केतु हो तो जातक को हृदय रोग होता है।

—-शुक्र नीच राशि में हो तो उसकी महादशा में हृदय में शूल होता है। द्वितीयस्थ शुक्र हो तो भी उसकी दशा में हृदय शूल होता है।

—पंचम भाव, पंचमेश, सूर्यग्रह एवं सिंह राशि पापग्रहों के प्रभाव में हों तो जातक को दो बार दिल का दौरा पड़ता है।

—-पंचम भाव में नीच का बुध राहु के साथ अष्टमेश होकर बैठा हो, चतुर्थ भाव में शत्राुक्षेत्राीय सूर्य शनि के साथ पीड़ित हो, षष्ठेश मंगल भाग्येश चन्द्र के साथ बैठकर चन्द्रमा को पीड़ित कर रहा हो, व्ययेश छठे भाव में बैठा हो तो जातक को हृदय रोग अवश्य होता है।

—–राहु चौथे भाव में हो और लग्नेश पापग्रह से दृष्ट हो तो हृदय रोग जातक को अवश्य होता है।

—-चतुर्थ भाव में राहु हो तथा लग्नेश निर्बल और पापग्रहों से युत या दृष्ट हो।

—-चतुर्थेश का नवांश स्वामी पापग्रहों से दृष्ट या युत हो तो हृदय रोग होता है।

—-लग्नेश शत्राुक्षेत्राी या नीच राशि में हो, मंगल चौथे भाव में हो तथा शनि पर पापग्रहों की दृष्टि हो या सूर्य-चन्द्र-मंगल शत्राुक्षेत्राी हों या चन्द्र व मंगल अस्त हों यापापयुत या चन्द्र व मंगल की सप्तम भाव में युति हो तो जातक को हृदय रोग होता है।

—-शनि तथा गुरु पापगहों से पीड़ित या दृष्ट हों तो जातक को हृदय रोग एवं शरीर में कम्पन होता है।

शनि या गुरु षष्ठेश होकर चतुर्थ भाव में पापग्रह से युत या दृष्ट हो तो जातक को हृदय व कम्पन रोग होता है।

—-तृतीयेश राहु या केतु के साथ हो तो जातक को हृदय रोग के कारण मूर्च्छा रोग होता है।

——चतुर्थ भाव में मंगल, शनि और गुरु पापग्रहों से दृष्ट हों तो जातक को हृदय रोग के कारण कष्ट होता है।

—-स्थिर राशियों में सूर्य पीड़ित हो तो भी हृदय रोग होता है।

अधिकांश सिंह लग्न वालों को हृदय रोग होता है।

—-षष्ठेश की की बुध के साथ लग्न या अष्टम भाव में युति हो तो जातक को हृदय रोग का कैंसर तक हो सकता है।

—षष्ठ भाव में सिंह राशि में मंगल या बुध या गुरु हो तो हृदय रोग होता है।

—–छठे भाव में कुम्भ राशि में मंगल हो तो हृदय रोग होता है। छठे भाव में सिंह राशि हो तो भी हृदय रोग होता है।

—चतुर्थेश किसी शत्राु राशि में स्थित हो और चौथे भाव में शनि व राहु या मंगल व शनि या राहु व मंगल या मंगल हो एवं शनि या पापग्रह से दृष्ट हो तो हृदय रोग होता है।

—-सूर्य पापप्रभाव से पीड़ित हो तभी हृदय रोग होता है।

हार्टअटैक के लिए राहु-केतु क पाप प्रभाव होना आवश्यक है। हार्ट अटैक आकसिम्क होता है।

हृदय रोग होगा या नहीं यह जानने के लिए कुछ ज्योतिष योगों को समझने- जानने का प्रयास करते हे।

इन योगों के आधार पर आप किसी की कुण्डली देखकर यह जान सकेंगे कि जातक को यह रोग होगा या नहीं। कुछ प्रमुख हृदय रोग संबंधी ज्योतिष योग इस प्रकार हैं—-

—— सूर्य-शनि की युति त्रिाक भाव में हो या बारहवें भाव में हो तो यह रोग होता है।

—– अशुभ चन्द्र चौथे भाव में हो एवं एक से अधिक पापग्रहों की युति एक भाव में हो।

—- केतु-मंगल की युति चौथे भाव में हो।

—- अशुभ चन्द्रमा शत्रु राशि में या दो पापग्रहों के साथ चतुर्थ भाव में स्थित हो तो हृदय रोग होता है।

— सिंह लग्न में सूर्य पापग्रह से पीड़ित हो।

—- मंगल-शनि-गुरु की युति चौथे भाव में हो।

—- सूर्य की राहु या केतु के साथ युति हो या उस पर इनकी दृष्टि पड़ती हो।

—- शनि व गुरु त्रिक भाव अर्थात्‌ ६, ८, १२ के स्वामी होकर चौथे भाव में स्थित हों।

—-राहु-मंगल की युति १, ४, ७ या दसवें भाव में हो।

—– निर्बल गुरु षष्ठेश या मंगल से दृष्ट हो।

—– बुध पहले भाव में एवं सूर्य व शनि षष्ठेश या पापग्रहों से दृष्ट हों।

—- यदि सूर्य, चन्द्र व मंगल शत्रुक्षेत्री हों तो हृदय रोग होता है।

—- चौथे भाव में राहु या केतु स्थित हो तथा लग्नेश पापग्रहों से युत या दृष्ट हो तो हृदय पीड़ा होती है।

—- शनि या गुरु छठे भाव के स्वामी होकर चौथे भाव में स्थित हों व पापग्रहों से युत या दृष्ट हो तो हृदय कम्पन का रोग होता है।

— लग्नेश चौथे हो या नीच राशि में हो या मंगल चौथे भाव में पापग्रह से दृष्ट हो या शनि चौथे भाव में पापग्रहों से दृष्ट हो तो हृदय रोग होता है।

—- चतुर्थ भाव में मंगल हो और उस पर पापग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो रक्त के थक्कों के कारण हृदय की गति प्रभावित होती है जिस कारण हृदय रोग होता है।

—– पंचमेश षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश से युत हो अथवा पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें में स्थित हो तो हृदय रोग होता है।

—- पंचमेश नीच का होकर शत्रुक्षेत्री हो या अस्त हो तो हृदय रोग होता है।

—- पंचमेश छठे भाव में, आठवें भाव में या बारहवें भाव में हो और पापग्रहों से दृष्ट हो तो हृदय रोग होता है।

—- सूर्य पाप प्रभाव में हो तथा कर्क व सिंह राशि, चौथा भाव, पंचम भाव एवं उसका स्वामी पाप प्रभाव में हो अथवा एकादश, नवम एवं दशम भाव व इनके स्वामी पाप प्रभाव में हों तो हृदय रोग होता है।

—- मेष या वृष राशि का लग्न हो, दशम भाव में शनि स्थित हो या दशम व लग्न भाव पर शनि की दृष्टि हो तो जातक हृदय रोग से पीड़ित होता है।

—- लग्न में शनि स्थित हो एवं दशम भाव का कारक सूर्य शनि से दृष्ट हो तो जातक हृदय रोग से पीड़ित होता है।

— नीच बुध के साथ निर्बल सूर्य चतुर्थ भाव में युति करे, धनेश शनि लग्न में हो और सातवें भाव में मंगल स्थित हो, अष्टमेश तीसरे भाव में हो तथा लग्नेश गुरु-शुक्र के साथ होकर राहु से पीड़ित हो एवं षष्ठेश राहु के साथ युत हो तो जातक को हृदय रोग होता है।

—- चतुर्थेश एकादश भाव में शत्राुक्षेत्राी हो, अष्टमेश तृतीय भाव में शत्रुक्षेत्री हो, नवमेश शत्रुक्षेत्री हो, षष्ठेश नवम में हो, चतुर्थ में मंगल एवं सप्तम में शनि हो तो जातक को हृदय रोग होता है।

—- लग्नेश निर्बल और पाप ग्रहों से दृष्ट हो तथा चतुर्थ भाव में राहु स्थित हो तो जातक को हृदय पीड़ा होती है।

—— लग्नेश शत्रुक्षेत्री या नीच का हो, मंगल चौथे भाव में शनि से दृष्ट हो तो हृदय शूल होता है।

—- सूर्य-मंगल-चन्द्र की युति छठे भाव में हो और पापग्रहों से पीड़ित हो तो हृदय शूल होता है।

—- मंगल सातवें भाव में निर्बल एवं पापग्रहों से पीड़ित हो तो रक्तचाप का विकार होता है।

—- सूर्य चौथे भाव में शयनावस्था में हो तो हृदय में तीव्र पीड़ा होती है।

— लग्नेश चौथे भाव में निर्बल हो, भाग्येश, पंचमेश निर्बल हो, षष्ठेश तृतीय भाव में हो, चतुर्थ भाव पर केतु का प्रभाव हो तो जातक हृदय रोग से पीड़ित होता है।

वास्तु दोष भी बनता हैं ह्रदय रोग का कारण—

 यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.

 कैसे हो निवारण (यह दोष कैसे दूर किया जाये)—-

—-पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.

—-पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार पर ‘सूर्य यन्त्र’ स्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.

—-पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी.

कुछ सामान्य उपचार ह्रदय रोग निवारण के लिए (उपाय ):——

हृदय रोग संबंधी समस्त योगों को समझ लें और उसका सार तत्त्व ग्रहण कर किसी भी कुण्डली में विचार कर विश्लेषण कर यह निर्णय कर लें कि हृदय रोग होगा या नहीं।तदोपरान्त रोग कारक ग्रहों के कुप्रभाव को दूर करने के उपाय करें। कुण्डली के बली व शुभ ग्रहों को स्थापित करें।

  1. पका हुआ पीला काशीफल लेकर उसके बीच निकाल करके किसी भी मन्दिर के प्रांगण में रखकर ईश्वर से स्वस्थ होने की कामना करते हुए रख दें। उपाय सूर्योदय के उपरान्त एवं सूर्यास्त से पूर्व करें। किसी के लिए वही कर सकता है जिसका रोगी से रक्त का संबंध हो। यह अनुसार अल्पतम तीन दिन करें और अधिक कष्ट है तो अधिक दिन भी कर सकते हैं। यहां आस्था एवं निरन्तरता महत्वपूर्ण है।
  2. गुड़ की चासनी में आटा गूंथकर अधपकी रोटी तन्दूर में लगवा लें। रोटी की संख्या निर्धारित करने के लिए जिस दिन उपाय करना हो उस दिन रोगी के आसपास जितने लोग हों उन्हें गिनकर चार की संख्या अतिरिक्त जोड़ लें तदोपरान्त उतनी रोटी बनवा लें। इन रोटियों को बराबर मात्रा में दो भाग में करके एक भाग कुत्तों को और दूसरा भाग गायों को खिला दें यह सोचकर कि रोगी स्वस्थ हो जाए।
  3. रोगी के सिरहाने एक सिक्का रखकर या श्रद्धानुसार रखकर उसे अगले दिन सूर्योदय के उपरान्त भंगी को दें। यह नित्य करें और 43 दिन तक बिना नागा (अंतर दिए) करें। मन में भाव रोगी के ठीक होने का रखें।

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