क्या है साहित्य और समाज का संबंध ?

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डॉ. सौरभ मालवीय

साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है. किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है. साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है. किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है. समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है. दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं. साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है. साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है. साहित्य अजर-अमर है. महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता.
साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव. कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है. साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है. पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं.
प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी. हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं. किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं. विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है. भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है. व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की. भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं. जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा. किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए.
मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है.
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है. मानव समाज का एक अभिन्न अंग है. जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है. साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है.
वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी. मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है. इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है. आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान. साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्‌स में सिमट गया है. समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा. समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें. समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके.
इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं. साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है. साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है. साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

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