भारतीय भाषाओं की जर्मन भाषा से अनोखी कुश्ती

                              भाषा के अखाड़े के उस्तादों ने आजकल एक अनोखी कुश्ती शुरु कर रखी है । भारतीय भाषाओं की जर्मन भाषा से कुश्ती । पिछले सात दशकों से भारतीय भाषाओं की अंग्रेज़ी से कुश्ती का खेल चल रहा था । लेकिन शायद एक ही खेला देखते देखते उस्तादों का मन ऊब गया । इसलिये ज़ायक़ा बदलने के लिये जर्मन भाषा का नया पहलवान अखाड़े में उतारा गया है । लेकिन इस बार भारतीय भाषाओं की ओर से संस्कृत को अखाड़े में धकेला गया है । भरी गर्मी में भी कोट पहने और नकटाई लपेटे दादा क़िस्म के उस्ताद ,वो काटा वो काटा के नारे लगा रहे हैं । जब तक ये उस्ताद अखाड़े में संस्कृत को लहू लोहान नहीं देख लेंगे तब तक चुप नहीं बैठेंगे ।

            अब थोड़ा माजरा समझ लिया जाये । लाल बहादुर शास्त्री के वक़्त ,स्कूलों के लिये त्रि भाषा फ़ार्मूला बना था । इस के तहत छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़ना अनिवार्य था । पहले समूह में मातृ भाषा आती है । दूसरे में सम्पर्क भाषा हिन्दी और तीसरे समूह में एक विदेशी भाषा आती है । अंग्रेज़ी की व्याप्तता देखते हुये तीसरे समूह में अंग्रेज़ी भाषा को रखा गया था । अहिन्दीभाषी प्रान्तों में तो यह फ़ार्मूला मज़े से जम गया । उदाहरण के लिये बंगाल प्रान्त ही ले लें । मातृभाषा बंगाली , हिन्दी और अंग्रेज़ी । ये तीन भाषाएँ छात्रों के लिये पढ़ना अनिवार्य है । लेकिन हिन्दी भाषी राज्यों में थोड़ी दिक़्क़त थी । क्योंकि उनकी मातृभाषा भी हिन्दी ही है । वहाँ तीसरी भाषा कौन सी पढ़ाई जाये ? वहाँ विदेशी भाषा समूह में तो अंग्रेज़ी चल गई । हिन्दी अपने कोटे से ही आ गई । मातृभाषा वाले खाते में कौन सी भाषा पढ़ाई जाये ? उसका भी हल निकाल लिया गया । इस खाते में अन्य भारतीय भाषाओं के समूह को रख दिया गया , जिसमें से छात्र एक भाषा का चयन कर सकता है । उदाहरण के लिये तमिल, तेलुगु, पंजाबी, संस्कृत, बंगला और असमिया इत्यादि में से कोई एक भारतीय भाषा पढ़ी जा सकती है । केन्द्रीय विद्यालयों के बच्चों में यह पद्धति और भी जरुरी थी क्योंकि वहाँ बच्चों के माता पिता का स्थानान्तरण होता रहने के बच्चों को साल के बीच में ही कई बार प्रान्त बदलना पढ़ता है ।

               सोनिया गान्धी की सरकार के समय किसी ने सुझाव दे दिया होगा या फिर किसी अति उत्साही बाबू ने ख़ुद ही फ़ैसला ले लिया होगा कि उसे स्वयं ही देश की भाषा नीति निर्धारित करनी है इसलिये उसने भारत जैसे पिछड़े देश को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन पढ़ाने की नीति निर्धारित कर दी । उसका बस चलता तो वह देश के सभी राज्यों में जर्मन की पढ़ाई अनिवार्य कर देता लेकिन उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का यह मामला था इसलिये उसने केन्द्रीय विद्यालयों के गले में ही यह हिटलरी फ़रमान लटकाने का निर्णय लिया । लेकिन इतना बड़ा फ़ैसला आख़िर मंत्री जी की जानकारी के बिना तो नहीं लिया जा सकता होगा । पर मंत्री के लिये इतना ही काफ़ी था कि इस काम के लिये जर्मनी के किसी संस्थान की ओर से ग्रांट मिलने वाली है । अपने मंत्री विदेशी ग्रांट पर लोटपोट होने लगते हैं ।

                   मान लो सोनिया कांग्रेस की सरकार को यह जरुरी लगता था कि देश के बच्चों को जर्मन पढ़ाना आवश्यक है तो उसे त्रि भाषा फ़ार्मूला में इसे विदेशी भाषाओं के समूह में डालना चाहिये था । इस समूह में अभी केवल अंग्रेज़ी ही पढ़ाई जाती है । इसमें जर्मन , फ़्रांसीसी , स्पानी , अरबी , फ़ारसी, रुसी , चीनी इत्यादि अन्य विदेशी भाषाएँ भी जोड़ी जा सकतीं हैं । वैसे यदि सोनिया जी की इच्छा होती तो इसमें इतालवी , लातीनी भी जोड़ी जा सकती थी । लेकिन उस्तादों ने जर्मन भाषा को विदेशी भाषा समूह के साथ न रख कर भारतीय भाषाओं या मातृभाषाओं के समूह में डाल दिया । केन्द्रीय विद्यालयों में देश के हर हिस्से के छात्र होते हैं । उनमें से अनेक भारतीय भाषाओं के समूह में से संस्कृत भाषा का चयन करते हैं । लेकिन सरकार का हिटलरी फ़रमान आ गया । संस्कृत के स्थान पर जर्मन पढ़ो । अखाड़े के उस्तादों ने नारा दिया । जर्मन पढ़ो-आगे बढ़ो । संस्कृत के पीरीयड में जाओगे – जीवन में पिछड़ जाओगे ।

बात भी ठीक थी । लोग इतालवी भाषा को पढ़ कर नहीं केवल सुन कर अरबों का कोयला स्कैंडल कर गये अब जर्मन पढ़ कर कितना आगे बढ़ जायेंगे , इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है ।

               जब सोनिया गान्धी की सरकार , भारत के लोगों ने मतपेटियों को ही हथियार बना कर उखाड़ फेंकी और लंदन के प्रसिद्ध अख़बार दी गार्जियन ने टिप्पणी की कि अब व्यवहारिक रुप से हिन्दुस्तान में से गोरे हुक्मरानों की वापिसी हुई है , तो जरुरी था कि इन हुक्मरानों के कारनामों की जाँच पड़ताल की जाये । उसी जाँच पड़ताल में यह भाषा घोटाला पकड़ा गया , जिसमें संस्कृत को समाप्त कर उसकी जगह जर्मन भाषा को बिठाया जा रहा था । आर्थिक क्षेत्र में कोयला घोटाला और शारदा चिट फ़ंड घोटाले के बाद सांस्कृतिक क्षेत्र में यह सबसे ख़तरनाक भाषायी घोटाला था , जिसकी समय रहते शिनाख्त हो सकी । लेकिन जैसे इस प्रकार के षड्यंत्रों में प्राय होता है , पकड़े जाने पर पूरा समूह एकत्रित होकर चिल्लाता है ताकि लोगों का ध्यान असली मुद्दे से हटाया जा सके । इसे चोर द्वारा शहीद बनने का प्रयास कहा जा सकता है । यही जर्मन भाषा घोटाले को लेकर हो रहा है ।

          ताज्जुब है कि अंग्रेज़ी भाषा का पूरा मीडिया हकलान हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी सरकार जर्मन को हटा कर संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाने जा रही है । जितने मुँह उतनी बातें । और अंग्रेज़ी मीडिया का मुँह बड़ा होता है लेकिन बात छोटी होती है । पहाड़ खोदने पर चुहिया निकलने की बात । लेकिन क्योंकि वह अंग्रेज़ी मुँह से निकलती है इसलिये बड़ी ही मानी जाती है । जर्मन भाषा से किसी को क्या विरोध हो सकता है ? लेकिन विदेशी भाषा को आख़िर बिठाना तो विदेशी भाषाओं की पंक्ति में ही होगा । उसे भारतीय भाषाओं की पंक्ति में तो नहीं बिठाया जा सकता । अंग्रेज़ी पहले ही भारतीय भाषाओं के सिर पर बैठी है । अब जर्मन को भी वहीं बिठा कर भारतीय भाषाओं की हत्या तो नहीं की जा सकती । लेकिन उस्तादों ने तो कनकौये इससे भी आगे उड़ाने  शुरु कर दिये हैं । उनका कहना है कि इससे भारत और जर्मनी के सम्बंधों में भी रुकावटों आ सकती है । कई तो इससे भी आगे भागने लगे । उनका कहना है कि जर्मन में संस्कृत विभाग बन्द कर दिये जायेंगे । अब इन भलेमानुसों से पूछो की जर्मनी में संस्कृत कहाँ पढ़ाई जाती है ? कुछ गिने चुनें विश्वविद्यालयों के भाषा विज्ञान के शोध विभागों में संस्कृत पर काम होता है । उसे संस्कृत पढ़ाना नहीं कहा जा सकता ।

एक चैनल का एंकर तो इसी बात को लेकर रोता रहा कि जर्मन पढ़ाने वाले अध्यापकों का क्या होगा ? उसको शायद यह नहीं पता था कि जर्मन भाषा जानने वालों को इस देश में इतना काम उपलब्ध है कि जर्मन जानने वाले कम हैं और काम ज़्यादा है । नरेन्द्र मोदी की सरकार को इस बात की बधाई देनी होगी कि उसने पूर्ववर्ती सरकार द्वारा भाषायी क्षेत्र में किये गये इस सांस्कृतिक घोटाले को बेनक़ाब किया है ।

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