Categories
विविधा

बंगाल में दक्षिणपंथ का टकराव दीदी व वामपंथ से

हर्षवर्धन त्रिपाठी

अमित शाह को अभी भी राष्ट्रीय मीडिया भारतीय जनता पार्टी के पुराने राष्ट्रीय अध्यक्षों की तरह सम्मान देने को तैयार नहीं है। दिल्ली में बैठे पत्रकार अभी भी ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को जो अप्रत्याशित सफलता देश के हर हिस्से में मिल रही है, उसमें मोदी लहर के अलावा अमित शाह की शानदार सांगठनिक क्षमता का भी कमाल है। अभी अगर ऐसी सफलता राजनाथ सिंह या किसी हिंदी पट्टी के नेता के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही होती तो यही हिंदी मीडिया उस अध्यक्ष को महानतम साबित कर देता। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि दिल्ली के पत्रकारों से या ये कह लें कि ज्यादातर पत्रकारों से अमित शाह कम ही मिलते-जुलते हैं। इस वजह से निजी तौर पर पत्रकारों के पास अमित शाह को समझने की दृष्टि कम ही बन पाती है। पत्रकार अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद के तौर पर हर बुरे काम से जोड़कर याद करना ज्यादा पसंद करते हैं। उसके पीछे वजह ये कि आसानी से साबित किया जा सकता है। लेकिन, अगर अमित शाह को समझना है और अमित शाह की संगठन चलाने की क्षमता समझना है तो इसके लिए अमित शाह को सुनना होगा। फिर चाहे वो निजी बातचीत में हो या फिर अमित शाह को भाषणों को सुनना हो। मीडिया में उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़े पत्रकार सबसे ज्यादा हैं। इसलिए थोड़ा अंटक-अंटककर  फिर धाराप्रवाह हिंदी न बोलने वाला नेता उन्हें कम ही अपील कर पाता है। क्योंकि, वो हिंदी धाराप्रवाह न बोलने वाले नेता के भाषणा को ज्यादा सुनते भी नहीं हैं। मतलब ये कि अमित शाह खुद पत्रकारों से निजी तौर पर घुलना-मिलना कम ही पसंद करते हैं और अमित शाह की पुरानी छवि और धाराप्रवाह हिंदी न होने के कारण ज्यादातर हिंदी पत्रकार उनके भाषणों को दूसरे नेताओं की तरह ध्यान से सनते ही नहीं है। इससे हो ये रहा है कि अमित शाह को समझने का पत्रकारों का काम अधूरा ही रह जा रहा है और इसी आधार पर वो अपना विश्लेषण दे रहे हैं। जाहिर अधूरी समझ का विश्लेषण भी पूरा भला कैसे हो सकता है। अब ये बात मैं क्यों कह रहा हूं इसकी वजह बताता हूं। अमित शाह को जब उत्तर प्रदेश का  प्रभारी बनाया गया था तो उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक नेता ने कहा अरे ई उत्तर प्रदेश है। अब अमित शाह हमें राजनीति बताएंगे। वो उत्तर प्रदेश के नेता बरसों से पार्टी कार्यालय में जमे हैं। उनकी राजनीतिक समझ इसी तरह से बनती बिगड़ती रही है। लेकिन, अमित शाह उत्तर प्रदेश में राजनीति समझने-समझाने नहीं, दरअसल संगठन बनाने आ रहे थे। और निजी बातचीत में कुछ ही दिन में उत्तर प्रदेश के नेता ये मानने लगे थे कि अमित शाह बोलते कम हैं लेकिन, काम बहुत ज्यादा करते हैं। संगठन की अमित शाह को गजब की समझ है। और इसीलिए जब लोकसभा चुनाव के समय अमित शाह मीडिया से मुखातिब होते थे तो अमित शाह मीडिया के किसी भी निष्कर्ष को एक झटके में खारिज कर देते थे। जाहिर है अमित शाह बेहतर समझ के साथ राजनीति कर रहे थे। इसीलिए मीडिया को हरियाणा और महाराष्ट्र में अक्खड़ अमित शाह तो नजर आया लेकिन, अपनी पार्टी संगठन के लिए दूसरों की योजना को मटियामेट करने वाला अमित शाह नजर नहीं आया।

अब अमित शाह जिस एजेंडे पर हैं वो मीडिया समझ तो रहा है लेकिन, अभी भी उसका सही विश्लेषण शायद नहीं कर पा रहा है। इसकी वजह ये कि कोलकाता में अमित शाह की रैली को विवादों के बाद मंजूरी तो  मीडिया की नजर में आई लेकिन, मीडिया की नजर में बहुत ज्यादा वो तैयारी नहीं आ पाई जो, कोलकाता रैली के लिए अमित शाह ने की थी। कोलकाता में वो एक बेहतर रैली कही जा सकती है। और सबसे बड़ी बात ये कि उस रैली में नौजवानों, महिलाओं की भागीदारी जमकर थी। अमित शाह वहां भी पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी सरकार की बात कर रहे थे। क्योंकि, अमित शाह को ये पता है कि इसी बहुमत न पा सकने वाली पार्टी के तौर पर बीजेपी का चरित्र चित्रण पिछले छे दशकों में ऐसे हो चुका है कि गठजोड़ की बात आते ही बीजेपी दूसरे दर्जे की पार्टी नजर आने लगती है। इसीलिए अमित शाह कहीं भी गठजोड़ की बात नहीं कर रहे हैं। इसीलिए अमित शाह ने स्वाभाविक तौर पर साथी रही शिवसेना से भी किनारा करने में जरा सा भी गुरेज नहीं किया। यही अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत है। अमित शाह को पता है कि उनकी ताकत तभी है जब भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकारें देश में चलाए। अमित शाह कोलकाता की रैली में तृणमूल कांग्रेस को घोटाले और आतंकवाद से जोड़ रहे थे। लेकिन, अमित शाह को पता है कि ये बंगाल है और यहां मुसलमानों का ध्रुवीकरण उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकती है। इसीलिए जब रैली में भाषण करते उनके कानों में नमाज की आवाज सुनाई दी तो वो रुक गए और करीब चार मिनट तक शांत रहे। उन्होंने ये कहा भी कि ममता दीदी को कोई मौका नहीं देना है।

अमित शाह की ये रणनीति बंगाल में ये ममता बनर्जी के लिए तो चिंता की वजह है ही। राजनीतिक वामपंथ के लिए ये ज्यादा बड़ी चिंता की वजह बन सकता है। दरअसल जब बंगाल में ममता बनर्जी राजनीतिक वामपंथ से लड़ रहीं थीं तो चुपचाप उग्र, कट्टर वामपंथ ने धीरे से ममता की तृणमूल कांग्रेस की छांव में आना शुरु कर दिया था। दरअसल ये जो तृणमूल कांग्रेस और राजनीतिक वामपंथियों की लड़ाई बंगाल में पिछले कुछ समय से दिख रही है ये लड़ाई राजनीतिक वामपंथ और उग्र वामपंथ के बीच ही है। हां, उग्र वामपंथ ने तृणमूल कांग्रेस का बैनर जरूर थाम लिया है। लेकिन, अब जो खबरें आ रही हैं वो पहली बार हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठन भी मुकाबले में हैं। बंगाल में अराजकता की राजनीति बहुत ज्यादा रही है। भले वो राष्ट्रीय मीडिया की नजर में इसलिए नहीं आती रही कि वामपंथ से जुड़े पत्रकार इस मसले पर लिखने-बोलने से बचते रहे। इसलिए वहां सड़कों पर खून खराबे से भी किसी राजनीतिक दल की ताकत का अंदाजा लगता है। अब भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठन भी सड़कों पर खून खराबे के मुकाबले में उतर पड़े हैं। इसका मतलब ये कि बंगाल की धरती पर दक्षिणपंथी, राजनीतिक और उग्र वामपंथ दोनों से लड़ने लायक हो गए हैं। और ये छोटी बात नहीं है। यही अमित शाह की सांगठनिक क्षमता का कमाल है। जबकि, पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के संगठन की कमान जिन राहुल सिन्हा के हाथ में है वो कमजोर कड़ी माने जा रहे हैं। इसलिए ये भी चर्चा है कि अमित शाह यहां प्रदेश अध्यक्ष बदलकर किसी और को ला सकते हैं। कोई ऐसा जो पश्चिम बंगाल में बस चुके, कारोबार कर रहे हैं बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को भी साध सके। राहुल सिन्हा की मुश्किल ये है कि देश भर में नरेंद्र मोदी की लहर और अमित शाह की सांगठनिक क्षमता के बावजूद वो बंगाल में संगठन में बेहतर लोगों को लाने में अक्षम साबित हुए हैं। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी को बंगाल के बड़े चेहरों को बीजेपी से जोड़कर अपील तैयार करनी पड़ रही है। बाबुल सुप्रियो, बप्पी लाहिरी के बाद कुमार सानू और अभिनेत्री रितुपर्णोंसेन गुप्ता का भाजपा में आना इसी कवायद का हिस्सा है।

पश्चिम बंगाल अमित शाह की प्राथमिकता में है। इसीलिए अमित शाह ने प्रदेश भाजपा को एक करोड़ की सदस्यता का लक्ष्य दे रखा है। हालांकि, राहुल सिन्हा की अगुवाई वाली बीजेपी फिलहाल इसमें पिछड़ती सी दिख रही है। और दिल्ली में बीजेपी नेता इससे खुश नहीं है। अमित शाह हर मोर्चे पर चाक चौबंद हैं। इसीलिए पश्चिम बंगाल की बुद्धिजीवियों वाली धरती पर जाने माने पत्रकार और अभी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता एम जे अकबर को लगाया गया है। एम जे अकबर की अगुवाई में एक बुद्धिजीवियों की रैली भी कोलकाता में हो चुकी है। इस रैली में एम जे अकबर ने कहाकि बंगाल की जनता को रोजगार देने के बजाय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस राज्य को लूटने में लगी है। अकबर लोगों से अपील कर रहे हैं कि 35 साल लाल सलाम ने बंगाल को बर्बाद किया। अब शारदा सलाम बर्बाद कर रहा है। और इसमें पूरी तरह से ममता बनर्जी का ही हाथ है। और लोकसभा चुनाव के पहले तक सिर्फ 6 प्रतिशत वोट वाली बीजेपी लोकसभा चुनाव में 16 प्रतिशत तक पहुंची तो राज्य में सभी पार्टियों की रणनीति बदलती दिख रही है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का पूरा ध्यान कांग्रेस और लेफ्ट से हटकर अब सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की तरफ है। वो किस तरह हड़बड़ाई हुई हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा के अध्यक्ष और ममता बनर्जी के भांजे अभिषेक बनर्जी ने बीजेपी अध्यक्ष राहुल सिन्हा के भाई सुदीप के तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने को बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। जबकि, सुदीप काफी पहले से तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा से जुड़ा हुआ है। सीपीएम ने भी ममता बनर्जी से सीधे-सीधे मिलने के बजाय बीच में कांग्रेस को माध्यम की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति तैयार की है। खबरें तो ये हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सीपीएम के साथ हाथ मिलाने को मंजूरी दे दी है। लेकिन, मुश्किल ये है कि अगर कांग्रेस सीपीएम, तृणमूल और बीजेपी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होता तो, उसमें भी भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिलती दिख रही है। 27 प्रतिशत मुसलमानों का होना भी इन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। इसीलिए एक ऐसा विकल्प तैयार करने की कोशिश हो रही है कि मुसलमान मतों का विभाजन कम से कम हो। लेकिन, ये सब अमित शाह की उस रणनीति के कारगर होने के संकेत हैं जिसमें वो विपक्षी को पहले ही इतना डरा देते हैं कि वो लड़ाई के मैदान में ज्यादा हिस्सा हथियाने के बजाय अपना हिस्सा बचाने में ही सारी ताकत झोंकने लगता है। इसलिए बंगाल की बेहद दिलचस्प लड़ाई भारतीय राजनीति के इतिहास में अद्भुत तरीके से शामिल होने जा रही है। दक्षिणपंथ और वामपंथ की राजनीति का इतना नजदीकी से मुकाबला शायद अभी तक नहीं हुआ है।

लेखक बतंगड़ ब्‍लॉगर के संचालक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş