राणा हमीर ने कराया था चित्तौड़ को पुन: स्वतंत्र

rana hameer‘‘अंधकार के पश्चात दिन का आता है प्रकाश,
सुख के पश्चात दुख भी एक दिन करता है अवकाश।
हानि-लाभ यश अपयश का चला हुआ है चक्र,
मोक्षाभिलाषी काट फेंकता द्वंद्वों का मोहपाश।।’’

यह सत्य है कि यह संसार द्वंद्वों से भरा हुआ है। दिन के पश्चात रात है, सुख के पश्चात दुख है। साधारण व्यक्ति जीवन की विषमताओं में फंंसकर ये भूल जाता है कि सवेरा भी होगा और आशा का सूर्य पुन: जीवन को प्रकाश से भर देगा। जबकि संसार समर में योद्घा के रूप में जो लोग संघर्ष करते हैं, वह सदा सकारात्मकता से भरे रहते हैं, और सवेरे के सूर्य को निकलने की न केवल प्रतीक्षा करते हैं, अपितु अपेक्षित साधना भी करते हैं, और हम देखते हैं कि ऐसे लोगों के जीवन में सवेरा होता है, सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है दुख के बादल छंटते हैं, और सुख की चिडिय़ा फिर चहचाने लगती है।

चित्तौड़ के लिए 29 अगस्त 1303 ई. का दिन सचमुच दुर्भाग्यशाली था, जब अलाउद्दीन का नियंत्रण इस राज्य पर स्थापित हुआ था। इस दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए राणा भीमसिंह का पुत्र अजयसिंह ही एक मात्र आशा की किरण था। अजय सिंह युद्घ के पश्चात से कैलवाड़ा के पहाड़ी क्षेत्र में रहकर अपना समय व्यतीत कर रहा था। वह संकट में था और कुछ भी उसके पास नही था, परंतु पूर्वजों के सम्मान को पुन: स्थापित कराने के लिए उसके पास चिंताओं का ढेर अवश्य था। उसके पास महाराणा प्रताप की भांति कोई भामाशाह भी नही था, परंतु उसका आत्मबल अवश्य था जो उसे जीवित रख रहा था और सवेरा होने का विश्वास दिलाता था।

अजय सिंह का एक अन्य भाई अरिसिंह था, जिसका हमने पूर्व में उल्लेख किया था। वह युद्घ में वीरगति को प्राप्त कर गया था। राणा भीमसिंह ने अपने जीवन काल में अजय सिंह से कह दिया कि तुम्हारे पश्चात चित्तौड़ के राज्य सिंहासन का उत्तराधिकारी अरिसिंह का पुत्र होगा। परंतु अजय सिंह को अब यह भी पता नही था कि अरिसिंह का पुत्र है कहां?

कर्नल टॉड हमें बताते हैं..

इस अरिसिंह के विषय में बड़ी रोचक जानकारी हमें कर्नल टॉड के ‘राजस्थान का इतिहास’, भाग-1 नामक ग्रंथ से मिलती है, जिसे यहां प्रसंगवश स्पष्ट वर्णित करना आवश्यक है। क्योंकि वह कहानी हमारी इस श्रंखला को और भी अधिक प्रामाणिकता प्रदान करेगी। कर्नल टॉड कहते हैं कि एक बार राणा भीमसिंह का बड़ा लडक़ा अरिसिंह अपने कुछ सरदारों के साथ अन्दवा नामक जंगल में शिकार खेलने गया। जंगल में जाकर एक जंगी सुअर को अरिसिंह ने अपने बाण से मारना चाहा। परंतु संयोग की बात थी कि वह बाण उस सुअर को नही लगा और वह अपनी प्राणरक्षा के लिए भागकर एक ज्वार के खेत में जा छिपा। अरिसिंह और उनके साथियों को ज्वार केे खेत में काम कर रही एक युवती भी देख रही थी। उस युवती ने बड़ी विनम्रता से अपने मचान से ही अरिसिंह और उनके साथियों से कहा कि आप थोड़ा रूकें, मैं आपका शिकार आपको लाकर देती हूं….

यह कहकर वह युवती अपने मचान से उतरी और उसने ज्वार का एक पेड़ उखाडक़र उसे नुकीला बनाया और अपने मचान पर चढक़र उसने अपने धनुष में चढ़ाकर छिपे हुए सुअर को मारा, जिससे वह मर गया। तब युवती अपने मचान से पुन: उतरी और उसे घसीटकर अरिसिंह के पास लाकर पटक दिया। तत्पश्चात वह अपने मचान पर पुन: चली गयी। ऐसी थीं हमारी वीरांगनाएं

ऐसी थीं हमारे देश की नारियां जिनके पौरूष के समक्ष पौरूष वाले भी आश्चर्य चकित खड़े रह जाते थे। अरिसिंह और उनके साथियों ने सारा दृश्य विस्फारित नेत्रों से देखा और कुछ कह नही सके।

कहानी यहीं समाप्त नही होती है। कहानी का रोमांच उस समय और बढ़ जाता है, जब वही युवती मिट्टी के एक ढेले से अरिसिंह के घोड़े को गिरा देती है। हुआ यह कि अरिसिंह और उसके साथियों ने युवती के खेत से आगे बढक़र एक नदी के किनारे बैठकर अपने खाने की सामग्री तैयार की। अरिसिंह ने कुछ दूरी पर ही अपना घोड़ा बांध दिया था। तभी अचानक एक मिट्टी का ढेला उस युवती के खेत की ओर से आया और अरसिंह के घोड़े को जा लगा। जिसे लगते ही वह घोड़ा अचेत होकर गिर गया। अरिसिंह और उनके साथियों ने उस युवती के खेत की ओर देखा था तो वह ढेले फेंक-फेंककर पक्षियों को उड़ा रही थी। सभी समझ गये कि उस युवती के ढेले से ही अरिसिंह के घोड़े को चोट लगी है। युवती को जब अनुभूति हुई कि उससे कहीं कोई चूक हो गयी है तो वह पुन: उन लोगों के पास आयी और बड़ी निर्भीकता व सभ्यता से उससे बातें करके वस्तुस्थिति को समझा और अपनी बात कहकर वह पुन: चली गयी।

राणा मोहित हो उठा

अरिसिंह अपने साथियों के साथ चित्तौड़ चला आया, परंतु उस वीरांगना की वीरता और विनम्रता ने उसे ऐसा मोहित किया कि एक दिन वह उस युवती के घर जाकर उसके पिता से उसका हाथ मांग ही बैठा। युवती के पिता ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।  परंतु उस युवती की माता के हस्तक्षेप से युवती का पिता अपनी पुत्री का हाथ अरिसिंह को देने को उद्यत हो गया। इस युवती से अरिसिंह का विवाह हुआ, जिससे हमीर नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यह हमीर जब बचपन में था तो उसके लक्षणों को राणा भीमसिंह पहचानते थे। कदाचित उसकी माता के संस्कारों को उन्होंने इस बालक में देखा होगा और इसलिए उन्होंने अपने प्रिय पुत्र अजय सिंह से कह दिया होगा कि तुम्हारे पश्चात चित्तौड़ का उत्तराधिकारी अरिसिंह का लडक़ा होगा।

अजय सिंह इसी हमीर की खोज में थे-परंतु वह उन्हें मिल नही रहा था।

अजय सिंह भी संकट में फंस गया

जब दुर्दिन आते हैं तो संकटों को लेकर आते हैं। अजय सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह पर्वतों पर अपना समय व्यतीत कर रहा था। कैलवाड़ा अरावली पर्वत पर बसा हुआ एक नगर है। इस कैलवाड़ा के सरदारों में मुंजाबलैचा नामक एक सरदार से अजय सिंह की ठन गयी। मुंजाबलैचा अजय सिंह को मारने की योजना बनाने लगा। अब तो राणा को और भी अधिक चिंता होने लगी। उसे अपने लोगों के सहयोग की उस समय अत्यधिक आवश्यकता थी, परंतु कहीं दूर दूर तक भी तब कोई अपना साथी दिखाई नही दे रहा था। उसके अपने पुत्र अजीमसिंह की अवस्था 16 वर्ष की तथा छोटे पुत्र सुजान सिंह की अवस्था 15 वर्ष की थी। परंतु इन दोनों भाइयों ने भी अपने पिता का सहयोग देने में असमर्थता व्यक्त की। तब अजय सिंह ने भाई अरिसिंह के पुत्र हमीर की मन लगाकर खोज की। अंत में उसे हमीर मिल ही गया। तब उसने हमीर  से मुंजाबलैचा को समाप्त कराने का प्रस्ताव रखा। माता के गुणों ने प्रभाव दिखाया और हमीर ने चाचा के प्रस्ताव को आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया। वह मुंजाबलैचा पर आक्रमण करने चल दिया। वीर माता केे वीर सुपुत्र ने मुंजाबलैचा को युद्घ में परास्त कर उसका प्राणांत कर दिया और उसके सिर को अपने भाले की नोंक पर लेकर वह अजय सिंह के पास आ गया।

अजय सिंह ने कर दिया राजतिलक

अजय सिंह को अपने शत्रु का अंत देखकर बड़ी ही आत्मिक प्रसन्नता हुई। तब उसे समझ आया कि पिता ने उसके (अजय सिंह के)पश्चात हमीर को चित्तौड़ का उत्तराधिकारी बनाने का आदेश क्यों दिया था? आज की प्रसन्न्ता की इस घड़ी में अजय सिंह ने पिता की इच्छा का पावन स्मरण किया और हमीर को चित्तौड़ का उत्तराधिकारी बनाने के दृष्टिकोण से उसका राजतिलक अपने शत्रु के सिर से टपकते  रक्त की बूंदों से ही कर दिया। कुछ ही क्षणों में बिना किसी भव्य आयोजन के या किसी समारोह के चित्तौड़ का उत्तराधिकारी नियुक्त हो गया। मनुष्यों पर कैसे-कैसे कठिनाओं से भरे समय आये हैं, और उनमें भी उन्होंने बड़े कार्य किये हैं। छोटे लोग कठिनता के दौर में वाणी और व्यवहार से अपनों से दूरी बनाते हैं, और बड़े लोग ऐसे काल में दूरियों को पाटते हैं। अजय सिंह ने दूरियों को पाट दिया और पिता की इच्छा का सम्मान कर चित्तौड़ के साथ न्याय भी कर दिया।

पुत्र हो गये असंतुष्ट

जब अजय सिंह इस महत्वपूर्ण कार्य को कर रहे थे तो उनके दोनों पुत्र भी इसे देख रहे थे। उन्हें अपने पिता का ये कृत्य अच्छा नही लगा। कहते हैं कि अजय सिंह की तो कुछ काल पश्चात मृत्यु हो गयी, परंतु सुजान सिंह रूष्ट होकर दक्षिण की ओर चला गया। कर्नल टॉड कहते हैं कि वहां उसने एक नये वंश की स्थापना की। शिवाजी महाराज इसी वंश में उत्पन्न हुए थे।

कारण कुछ भी रहे, परंतु अजय सिंह ने हमीर को शासन देकर चित्तौड़ के स्वतंत्रता संघर्ष को बल प्रदान कर दिया। तब उसे भी ज्ञात नही होगा कि यदि चित्तौड़ को हमीर प्राप्त करेगा तो भारत को स्वतंत्र कराने के लिए सुजान सिंह के उत्तराधिकारी भी  महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। काल हमारी भूमिका निर्धारित किया करता है, और काल ही भूमिकाओं का हरण भी कर लेता है, काल ही हमें नचाता है और काल ही हमारा नाच बंद भी करा देता है। इसलिए ‘वक्त की हर शै गुलाम’ वाली बात कही जाती है। अजय सिंह से काल ने उसकी भूमिका छीन ली और नई भूमिकाओं के नये पात्र गढक़र भारतमाता को प्रदान कर दिये। सुजान सिंह की वंश  परंपरा में आगे चलकर शिवाजी के होने की पुष्टि में लाला लाजपतराय ने अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ में लिखा है कि-पितृपक्ष से वह उस पवित्र वंश में उत्पन्न हुए थे, जिसमें बड़े-बड़े शूरवीर उत्पन्न हुए थे जो वंश बहुत समय तक स्वतंत्र रहा। जिसकी संतान अपनी जाति और देश के लिए अनेकबार लड़ी और जिसने बहुत सी कठिनाईयों को झेलते हुए भी मुसलमानों से संबंध नही किया, जो आज तक अपनी इस पवित्रता के कारण समस्त राजपूतों में शिरोमणि है, हमारा यह संकेत उदयपुर के राणा वंश से है।

मिस्टर जस्टिस रानाडे ने अपने ‘मरहठा इतिहास’ में भी इसी मत की पुष्टि की है। जबकि मुसलमानी इतिहास लेखक खफी खां भी यही लिखता है कि शिवाजी उदयपुर के राजवंश से थे।

हमीर ने चित्तौड़ लेने के लिए आरंभ की तैयारियां

अपने चाचा अरिसिंह के द्वारा चित्तौड़ का उत्तराधिकार मिलने के पश्चात हमीर को चित्तौड़ लेने की चिंता और भी प्रबलता से सताने लगी। चित्तौड़ का वैभव और गौरव उससे प्रश्न पूछते थे और वह उन दोनों से बात करते-करते अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अत्यंत व्यग्र हो उठता था। इसलिए वह उस योजना की खोज में लग गया जिससे यथाशीघ्र चित्तौड़ को उसकी स्वतंत्रता दिलाई जाए। हमीर जानता था कि अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का कार्य भार जिस मालदेव नामक व्यक्ति को दिया है, वह कितनी बड़ी सुल्तानी सेना के साथ चित्तौड़ में रहता है, और यह भी कि उसके विनाश के लिए उसे कितने बड़े  स्तर पर संघर्ष करना होगा। परंतु उसके सामने बड़ी समस्या थी-धन शक्ति और सैन्यशक्ति का अभाव। इसके लिए हमीर ने छोटे -छोटे दुर्गों को जीतना आरंभ किया और इस प्रकार मिट्टी में मिले हुए अपने राज्य को ढूंढ़ निकालने की योजना को कार्य रूप देना आरंभ किया। कहते हैं कि उसने अपने राज्य मेवाड़ में भी यह घोषणा करा दी थी कि जो लोग हमीर को अपना राजा मानते हैं, वे अरावली पर्वत के पश्चिमी भाग पर आ जाएं। यदि कोई नही आएगा तो उसे शत्रु माना जाएगा।

लोगों ने घोषणा का किया स्वागत

इस घटना का स्वतंत्रता प्रेमी जनता पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अधिकांश लोग अपने घर बार छोडक़र पर्वत पर आ गये। जिससे मेवाड़ के नगर ग्रामों में सन्नाटा पसर गया। अब हमीर ने एक ओर से उन सुनसान नगर ग्रामों को उजाडऩा आरंभ किया, जो भी शत्रु पक्ष का व्यक्ति आता उसी को समाप्त कर दिया जाता था।

….और दिल्ली हिल उठी

हमीर की योजना को चमत्कारिक सफलता मिलती जा रही थी, जिससे दिल्ली का सिंहासन भी हिलने लगा। फलस्वरूप दिल्ली से सेना की सहायता मालदेव के लिए भेजी गयी, परंतु हमीर की योजना के सामने दिल्ली की शाही सेना की कुछ न चली और उसे हिंदूवीर हमीर के द्वारा पराजित किया जाने लगा। लोगों का अपनी स्वतंत्रता के प्रति उत्साह देखते ही बनता था, सबका लक्ष्य एक था-प्राण चाहे भी चले जाएं पर मां भारती की स्वतंत्रता न जानी चाहिए। इसलिए अपने उत्साही और साहसी शासक हमीर के साथ मेवाड़ का बच्चा-बच्चा लग गया। सारी प्रजा ही सेना बन गयी। जिससे हमीर का मार्ग सरल हो गया, उसे देशभक्तों की विशाल सेना जो मिल गयी थी।  कर्नल टॉड कहते हैं कि- ‘‘हमीर की योजना के फलस्वरूप जो भूमि हरे- भरे खेतों से शोभायमान रहा करती थी, वह जंगलों के रूप में परिवर्तित हो गयी। समस्त रास्ते अरक्षित हो गये और वाणिज्य व्यवसाय के स्थान सूने मैदानों के रूप में दिखाई देने लगे।’’

कैलवाड़ा को ही बना लिया  निवास स्थान

हमीर ने अपना निवास स्थान कैलवाड़ा को ही बना लिया था। उसने इस स्थान का दुर्गीकरण किया, जिससे कि शत्रु की सेना यहां तक न पहुंच सकेे, मेवाड़ की अधिकांश जनता भी इसी स्थान पर आकर रहने लगी थी। इसलिए प्रजा की सुविधा के लिए हमीर ने यहां एक विशाल तालाब का निर्माण भी कराया। यह स्थान (कैलवाड़ा) पृथ्वी तल से 800 तथा समुद्री तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। राज्य के  लोगों ने मेवाड़ के प्रति सदा से अपनी  भक्ति का प्रदर्शन किया है। उन्हें सुल्तान ने चित्तौड़ विजय के पश्चात इन वीर लोगों  को अपने कोप का भाजन भी बनाया था। अत: अब ये भील भी अपने शासक हमीर के साथ आ मिले।

मालदेव ने चली नई चाल

इसी समय जब हमीर मालदेव पर भारी पड़ रहा था और उसे अपने नियंत्रण में रखने का कोई उपाय मालदेव को नही सूझ रहा था, तो उसने नई चाल चली  और अपनी विवाह योग्य पुत्री का विवाह हमीर के साथ करने का प्रस्ताव हमीर के पास पहुंचवा दिया। राणा के मंत्रियों ने इस प्रस्ताव पर संदेह किया और इसे अस्वीकार करने का परामर्श हमीर को दिया। परंतु हमीर ने उनके परामर्श को मानकर मालदेव के उस प्रस्ताव को स्वीकार करना ही उचित समझा। उसने अपने मंत्रियों को समझाते हुए कहा कि मैं भी इस बात को समझता हूं कि राजा मालदेव के साथ मेरे संबंध अच्छे नही हैं। वह हमारे शत्रु बादशाह अलाउद्दीन  की ओर से हमारे पूर्वजों के राज्य चित्तौड़ पर शासन कर रहा है। इस दशा में हमारा और मालदेव का एकहोना अथवा संबंधी होना कैसे संभव हो सकता है? इसलिए सहज ही इस बात को समझा जा सकता है, कि राजा मालदेव ने मेरे विरूद्घ विद्रोह के लिए किसी प्रकार का षडय़ंत्र रचा होगा। परंतु उससे सबको घबराने और चिंता करने की आवश्यकता नही है। कभी-कभी भयानक विपदाओं में उज्ज्वल भविष्य का संदेश छिपा होता है। मालदेव का कुछ भी अभिप्राय हो, हमें उससे घबराने की आवश्यकता नही है। घबराना निर्बलों का काम है। कठिनाइयों का स्वागत करना और हंस हंसकर विपदाओं का सामना करना शूरवीरों का कार्य होता है, महान सफलताओं की प्राप्ति भीषण कठिनाईयों को पार करने के पश्चात होती है। इस सत्य के आधार पर राजा मालदेव के प्रस्ताव को स्वीकार करना ही उचित है।

अपने ही महल में वर बनकर हमीर

हमीर को अपने पूर्वजों की राजधानी चित्तौड़ के दर्शन करने की शीघ्रता थी, क्योंकि उसने कभी अब से पूर्व चित्तौड़  के दर्शन नही किये थे। उसके द्वारा विवाह प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने पर मालदेव ने विवाह की तिथि निश्चित करा दी, निश्चित तिथि को हमीर वरयात्रा के साथ चित्तौड़ पहुंचे। यह अदभुत संयोग था कि जिस राज प्रासाद से हमीर की वरयात्रा निकलनी चाहिए थी, उसी में वर बनकर आना पड़ रहा था। संभवत: इतिहास की यह पहली घटना थी। जिसका मुख्य पात्र हमीर बन रहा था।

हमीर नेे चित्तौड़ पहुंचकर उसे गंभीरता से देखा। उसे कहीं कोई विवाह की तैयारियां दिखाई नही दीं। उसकी वरयात्रा का स्वागत करने के लिए मालदेव ने अपने पांच पुत्रों के भेजा और वे वरयात्रा को लेकर राजप्रासाद आ गये। वहां भी कोई तैयारी नही थी। तब उसकी शंकाएं बढऩे लगी। मालदेव ने यहां अपने पुत्र बनवीर के साथ हमीर का स्वागत किया और उसे विवाह मंडप नही था। मालदेव ने अपनी पुत्री को बुलाया और हमीर के सामने खड़ा कर दिया। हमीर ने लडक़ी का हाथ पकड़ा, दोनों की गांठ बांधी गयी और विवाह कार्य संपन्न हो गया। तब लडक़ी और हमीर को परंपरा के अनुसार एकांत में भेज दिया गया।

वास्तविकता तब ज्ञान हुआ

एकांत में मालदेव की पुत्री ने हमीर को बताया कि वह एक विधवा है, परंतु इतनी बाल अवस्था में विधवा हो गयी थी कि उसे अपने विवाह का और पति का स्मरण तक भी नही है। हमीर अब सच को समझ चुका था, परंतु उसने भी समझदारी के साथ लडक़ी से कह दिया कि उसका प्रयोजन चित्तौड़ को लेना है। लडक़ी ने सजल नेत्रों से उस कार्य में सहयोग का आश्वासन दिया। इस प्रकार एक षडय़ंत्र को भी अपने अनुकूल बनाकर हमीर ने मालदेव से विदा मांगी। मालदेव की पुत्री के कहे अनुसार हमीर ने दहेज में जलंधर नामक सरदार को मांग लिया। मालदेव ने इसे स्वीकार किया और हमीर अपनी पत्नी सहित कैलवाड़ा लौट आया।

रानी ने दिया पुत्र रत्न को जन्म

इस रानी से कुछ समय पश्चात हमीर के घर में एक लडक़ा ने जन्म लिया। जिसका नाम क्षेत्रसिंह रखा गया। मालदेव ने भी इस नाती की प्रसन्नता में अपने जामाता हमीर को अपने राज्य का संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र प्रदान कर दिया। हमीर और भी शक्तिशाली हो गया। कुछ काल पश्चात रानी अपने पुत्र सहित चित्तौड़ गयी।

हमीर ने प्राप्त की चित्तौड़

जहां जाकर उसने देखा कि मालदेव उस समय मादरिया के भील लोगों का दमन करने गया हुआ था, और चित्तौड़ में नही था। रानी ने हमीर के पास सूचना भिजवा दी कि अब अवसर है, शीघ्रता करो। रानी के संदेश को पाकर हमीर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। थोड़े से विरोध के साथ हमीर ने अपने पूर्वजों के गौरव को प्राप्त कर लिया। इसी को कहते हैं, कि ‘जहां चाह वहां रहा’। धैर्य, विवेक और साहस ने हमीर का मार्ग सरल कर दिया और वह अपने पूर्वजों के सिंहासन पर जा बैठा। उसने हृदय से प्रभु का धन्यवाद किया और अपने पूर्वजों को विनम्र श्रद्घांजलि भी प्रदान की।

मालदेव भाग गया दिल्ली की ओर

जब मालदेव चित्तौड़ लौटा तो उस समय तक उसके सभी सरदार राणा हमीर के साथ मिल चुके थे। वस्तुस्थिति को समझकर वह दिल्ली की ओर भागा, तब तक अलाउद्दीन संसार से चला गया था, और मौहम्मद खिलजी दिल्ली पर शासन कर रहा था। वह अपनी सेना के साथ चित्तौड़ की ओर चला। राणा हमीर ने भी उस समय तक अपनी पूरी तैयारी कर ली थी। दोनों ओर से भीषण संग्राम हुआ। धरती शवों से पट गयी, मालदेव का लडक़ा हरिसिंह भी युद्घ में मारा गया। राणा के बांकुरों ने पुन: चमत्कार कर दिखाया और मौहम्मद खिलजी की सेना को भागने पर विवश कर दिया।

बादशाह को रखा तीन माह जेल में

इससे पूर्व राणा की सेना ने खिलजी को कैद कर लिया, जिसे राणा ने अपनी जेल में डाल दिया। अपने पूर्वजों के अपमान का उचित प्रतिशोध लेने का उसके लिए यह उत्तम अवसर था। बादशाह खिलजी तीन माह तक राणा की जेल में बंद रहा और अपने भाग्य को कोसता रहा। तीन माह पश्चात उससे अजमेर रणथम्भौर, नागौर शुआ और शिवपुर को मुक्त कराके उन्हें अपने लिए प्राप्त कर और एक सौ हाथी व पचास लाख रूपये लेकर जेल से छोड़ दिया। हिन्दू वीरता के समक्ष अपमानित होकर बादशाह लज्जित भाव से आकर दिल्ली के सिंहासन पर बैठ गया। यदि हिंदू गौरव के प्रतीक हमीर को उस समय अन्य नरेशों का सहयोग मिल गया होता तो तीन माह जिस प्रकार दिल्ली लावारिस रही थी, उसमें दिल्ली पर पुन: हिन्दुओं का नियंत्रण और अधिकार हो सकता था। राणा ने मालदेव के लडक़े बनवीर को नीमच, जीरण, रतनपुर, और केवारा का क्षेत्र दे दिया और कह दिया कि इससे अपने परिवार का पालन पोषण करो। इससे बनवीर राणा का भक्त बन गया। राणा ने अपने जीवन काल में मारवाड़ जयपुर, बूंदी, ग्वालियर, चंदेरी  रायसीन, सीकरी, कालपी तथा आबू के राजाओं को भी अपने अधीन कर पुन: एक शक्तिशाली मेवाड़ की स्थापना की।

इसे कहते हैं गौरव।

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