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भारत सहित वैश्विक स्तर पर क्यों बढ़ रही है मुद्रा स्फीति की दर

अभी हाल ही में अमेरिका एवं अन्य यूरोपीयन देशों में मुद्रा स्फीति की दर के आंकड़े जारी किये गए हैं। अमेरिका में नवम्बर 2021 माह में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर 6.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो जून 1982 से लेकर आज तक सबसे अधिक मुद्रा स्फीति की दर है। अक्टोबर 2021 माह में भी मुद्रा स्फीति की दर 6.2 प्रतिशत थी एवं सितम्बर 2021 में यह 5.4 प्रतिशत थी। अमेरिका में पिछले लगातार 9 माह से मुद्रा स्फीति की दर सह्यता स्तर अर्थात 2 प्रतिशत से अधिक बनी हुई है। लगभग यही स्थिति यूरोप के अन्य देशों की भी है। अमेरिका की PEW नामक अनुसंधान केंद्र ने विश्व के 46 देशों में मुद्रा स्फीति की दर पर एक सर्वेक्षण किया है एवं इसमें पाया है कि 39 देशों में वर्ष 2021 की तीसरी तिमाही में मुद्रा स्फीति की दर, कोरोना महामारी के पूर्व, वर्ष 2019 की तीसरी तिमाही में मुद्रा स्फीति की दर की तुलना में बहुत अधिक है।

वैश्विक स्तर पर मुद्रा स्फीति की दर के अचानक इतनी तेजी से बढ़ने के कारणों में कुछ विशेष कारण उत्तरदायी पाए गए हैं। मुद्रा स्फीति की दर में यह अचानक आई तेजी किसी सामान्य आर्थिक चक्र के बीच नहीं पाई गई है बल्कि यह असामान्य परिस्थितियों के बीच पाई गई है। अर्थात, कोरोना महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर एक तो सप्लाई चैन में विभिन्न प्रकार के विघ्न पैदा हो गए हैं। दूसरे, कोरोना महामारी के चलते श्रमिकों की उपलब्धि में कमी हुई है। अमेरिका आदि देशों में तो श्रमिक उपलब्ध ही नहीं हो पा रहे हैं, इससे विनिर्माण के क्षेत्र की इकाईयों को पूरी क्षमता के साथ चलाने में समस्याएं आ रही हैं। तीसरे, विभिन्न देशों के बीच उत्पादों के आयात निर्यात में बहुत समस्याएं आ रहीं हैं। पानी के रास्ते जहाजों के माध्यम से भेजी जा रही वस्तुओं को एक देश से दूसरे देश में पहुंचने में (एक बंदरगाह से उत्पादों के पानी के जहाजों पर चढ़ाने से लेकर दूसरे बंदरगाह पर पाने के जहाजों से सामान उतारने के समय को शामिल करते हुए) पहिले जहां केवल 10/12 दिन लगते थे अब इसके लिए 20/25 दिन तक का समय लगने लगा है। कई बार तो पानी का जहाज बंदरगाह के बाहर 7 से 10 दिनों तक खड़ा रहता है क्योंकि श्रमिकों की अनुपलब्धता के कारण सामान उतारने की दृष्टि से उस जहाज का नम्बर ही नहीं आता। चौथे, कोरोना महामारी का प्रभाव कम होते ही विभिन्न उत्पादों की मांग अचानक तेजी से बढ़ी है जबकि इन उत्पादों को एक देश से दूसरे देश में पहुंचाने में ज्यादा समय लगने लगा है। अतः मांग एवं आपूर्ति में उत्पन्न हुई इस असमानता के कारण भी महंगाई की दर में वृद्धि हुई है।

मुद्रा स्फीति का तेजी से बढ़ना, समाज के हर वर्ग, विशेष रूप से समाज के गरीब एवं निचले तबके तथा मध्यम वर्ग के लोगों को आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक विपरीत रूप में प्रभावित करता है। क्योंकि, इस वर्ग की आय, जो कि एक निश्चित सीमा में ही रहती है, का एक बहुत बड़ा भाग उनके खान-पान पर ही खर्च हो जाता है और यदि मुद्रा स्फीति की बढ़ती दर तेज बनी रहे तो इस वर्ग के खान-पान पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। अतः, मुद्रा स्फीति की दर को काबू में रखना किसी भी देश की सरकार का प्रमुख कर्तव्य है। इसीलिए भारत में केंद्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक, मौद्रिक नीति के माध्यम से, इस संदर्भ में समय समय पर कई उपायों की घोषणा करते रहते हैं।

सामान्य बोलचाल की भाषा में, मुद्रा स्फीति से आश्य वस्तुओं की कीमतों में हो रही वृद्धि से है। इसे कई तरह से आंका जाता है जैसे – थोक मूल्य सूचकांक आधारित; उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित; खाद्य पदार्थ आधारित; ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी आधारित; इंधन की कीमत आधारित; आदि। मुद्रा स्फीति का आश्य मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी होने से भी है, जिससे वस्तुओं के दामों में वृद्धि महसूस की जाती है।

मुद्रा स्फीति की तेज बढ़ती दर, दीर्घकाल में देश के आर्थिक विकास की दर को भी धीमा कर देती है। इसी कारण से कई देशों में मौद्रिक नीति का मुख्य ध्येय ही मुद्रा स्फीति लक्ष्य पर आधारित कर दिया गया है।

भारत में नवम्बर 2021 माह में खुदरा (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित) मुद्रा स्फीति की दर 4.91 प्रतिशत रही है जो माह अक्टोबर 2021 की दर 4.48 प्रतिशत से अधिक है। माह नवम्बर 2021 में सब्जियों एवं फलों की कीमतों में हुई वृद्धि के कारण खुदरा मुद्रा स्फीति की दर बढ़ी है। नवम्बर 2021 माह में ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा मुद्रा स्फीति की दर 4.29 प्रतिशत रही जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 5.54 प्रतिशत रही। भारतीय रिजर्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार भारत में खुदरा मुद्रा स्फीति की दर वित्तीय वर्ष 2021-22 की तीसरी तिमाही में 5.1 प्रतिशत एवं चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने की सम्भावना है क्योंकि इस सम्बंध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे घटनाचक्र का असर भारत पर भी पढ़ने की सम्भावना है।

भारतीय रिजर्व बैंक के एक अन्य अनुमान के अनुसार भारत में खुदरा मुद्रा स्फीति की दर वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान 5.3 प्रतिशत रहने वाली है, जो सह्यता स्तर अर्थात 6 प्रतिशत से नीचे है। हां, हाल ही के समय में खुदरा मुद्रा स्फीति की दर एवं थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर पर बहुत भारी दबाव दिखाई दे रहा है किंतु केंद्र सरकार लगातार सतर्कता बनाए हुए है एवं समय समय पर इस सम्बंध में कई निर्णय ले रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ कमी दिखाई देने लगी है एवं केंद्र सरकार ने खाद्य तेल के आयात पर आयात शुल्क में भी कुछ कमी की घोषणा की है तथा केंद्र सरकार ने पेट्रोल एवं डीजल पर इक्साइज ड्यूटी में भी कमी तथा कई राज्य सरकारों ने पेट्रोल एवं डीजल पर वैट की दर में कमी की घोषणा की है। साथ ही, मानसून समाप्त होने के बाद खाद्य पदार्थों यथा सब्जी एवं फलों की उपलब्धता बाजार में बढ़ी है। इस प्रकार केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा सामूहिक रूप से किए जा रहे प्रयासों के चलते खुदरा मुद्रा स्फीति की दर कुछ हद्द तक कम होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। परंतु, देश में मुद्रा स्फीति की दर, यदि सब्जियों, फलों, आयातित तेल, आदि के दामों में बढ़ोतरी के कारण, बढ़ती है तो केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले उपायों से एवं भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के माध्यम से इस पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।

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